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क्या आपने भी कभी भेदभाव का सामना किया है?...तो चुप मत रहिए, अपनी दबी हुई कहानी को इस मंच पर दें आवाज

Posted On: 6 Mar, 2017 Junction Forum में

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कॉलेज के दिनों से मुझे थियेटर-ड्रामा का बहुत शौक था. उन दिनों हमारे कॉलेज में ‘नौजवानों की संसद’ नाम से एक ग्रुप था, जो हर महीने के आखिर में पूरे कॉलेज के सामने एक नाटक (प्ले) प्रस्तुत करता था.


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प्ले में हम 2 लड़कियां थी और 12 लड़के थे. प्ले की थीम राजनीति पर आधारित थी, इसलिए हम दोनों को कमतर मानते हुए अक्सर हमें साइड रोल दिया जाता. जिसमें मुझे कोई फरियादी महिला या सरकारी दफ्तर में काम करने वाली महिला का रोल दिया जाता, जबकि मेरी दूसरी सहेली को पूरे नाटक में एक पोस्टर पकड़ाकर बैठा दिया जाता था.


मुझे भी बड़ी इच्छा होती थी कि मैं वो रोल करूं, जिससे मेरी प्रतिभा निखरकर आए लेकिन अक्सर मुझे ऐसे कामचलाऊं या साइड रोल ही दिए जाते थे.


एक दिन मैंने प्ले के डायरेक्टर के सामने ये बात रखी, जिसे सुनकर वो मुस्कुराते हुए बोले ‘लड़कियों को राजनीति, देश-दुनिया की खबर कम ही रहती है. इन लड़कों की तुलना में तुम्हें राजनीति की समझ नहीं हो सकती. हम तो तुम्हारी मदद ही कर रहे हैं. बेकार में तुम्हारी समझ का नमूना सबके सामने दिखे, इससे तो अच्छा है तुम ऐसे ही रोल करो. कम से कम तुम्हारा शौक तो पूरा हो रहा है न!’


उनकी ये बातें सुनकर मैं हैरान रह गई. मन में रह-रहकर एक ही ख्याल आ रहा था ‘कि ये लोग देश की राजनीति की समस्याओं के प्रति युवाओं को जागरूक करने के लिए नाटक पेश करते हैं, जबकि लिंगभेद भी समाज और देश की सबसे बड़ी समस्या है, ये लोग देश को क्या बदलेंगे. इन्हें पहले खुद को बदलना चाहिए.’


वैसे तो बचपन में कई बार लड़की होने की वजह से ऐसे लैंगिक भेदभाव की घटनाएं मेरे साथ हुई थी, लेकिन तब मुझे लगता था कि शायद आस-पड़ोस में कम पढ़े-लिखे लोग हैं इसलिए इनकी मानसिकता इतनी दबी-कुचली हुई है. कॉलेज की इस घटना ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया कि असल में लिंग भेदभाव एक संर्कीण सोच है, जिससे समाज का कोई भी वर्ग ग्रस्त हो सकता है. पढ़े-लिखे लोग भी जाने-अनजाने ऐसी घटनाओं में खूब सहयोग देते हैं.


लिंग भेदभाव की शिकार हुई रोशनी की ये कहानी उन अनगिनत कहानियों में से एक है, जो वक्त के साथ हमारे भीतर ही कहीं दब-सी गई है.

समाज में रोग की तरह फैले लिंग भेदभाव का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आप किसी भी लड़की से उनका अनुभव पूछ लीजिए, उन अनुभवों से एक-दो अनुभव ऐसे जरूर होंगे जब उन्हें लड़की होने की वजह से कमतर आंका गया होगा. घर, समाज, ऑफिस, किसी प्रतियोगिता, खेल, मंच आदि जगहों पर कभी न कभी उन्हें ऐसे कड़वे अनुभवों से वो जरूर गुजरी होंगी.


जब पूरी दुनिया में हर प्रकार के भेदभाव को खत्म करके ‘समानता’ की बात हो रही है, तो ऐसे में ये और भी जरूरी हो जाता है कि समाज के दोहरे चेहरे को दुनिया के सामने लाया जाए.


इस मुहिम को आगे बढ़ाने के लिए टाटा-टी ‘जागो रे’ आपका सहयोग कर रहा है.

अगर आपकी जिंदगी भी ऐसे ही किसी अनुभव से होकर गुजरी है या आप पुरुष हैं लेकिन किसी महिला के साथ हुए भेदभाव के साक्षी बने हैं, तो आप भी ऐसे अनुभवों को हमारे साथ साझा कर सकते हैं. महिला और पुरुष दोनों ही इस मुहिम का हिस्सा बनें.


आवश्यक सूचना

आपकी सच्ची रचनाओं का ‘जागरण जंक्शन’ मंच को बेसब्री से इंतजार है. उनमें से चुनिंदा 3 रचनाओं को ईनाम देकर प्रोत्साहित किया जाएगा.


  • पहला ईनाम 5000 रुपए कीमत का गिफ्ट वाउचर.
  • दूसरा ईनाम 3000 रुपए कीमत का गिफ्ट वाउचर
  • तीसरा ईनाम 2000 रुपए कीमत का गिफ्ट वाउचर.


तीन रचनाओं का चुनाव हमारा विशेष संपादकीय समूह करेगा. आप अपनी रचनाएं 6 से 31 मार्च 2017 तक शेयर कर सकते हैं. विजेताओं के नामों की सूचना उन्हें ई-मेल के माध्यम से भेजी जाएगी. साथ ही विजेताओं के नाम उनकी फोटो के साथ ‘जागरण जंक्शन’ मंच पर भी प्रकाशित किए जाएंगे. प्रतियोगिता के नतीजे 6 अप्रैल को घोषित किए जाएंगे.


नियम और शर्ते


  1. प्रतियोगिता की अवधि में किसी भी श्रेणी के अंतर्गत रचनाएं देने के लिए यूजर स्वतंत्र हैं. एक से अधिक श्रेणियों में, एक से अधिक कितनी भी रचनाएं शामिल कर सकते हैं.
  2. प्रतियोगिता अवधि के दरमियान कम से कम दो ब्लॉग पोस्ट शामिल करना अनिवार्य है.
  3. केवल प्रतियोगिता की अवधि के दौरान प्रकाशित रचनाएं/प्रविष्टियां ही मान्य होंगी. यदि कोई प्रतियोगी किसी पूर्व प्रकाशित रचना को प्रतियोगिता में शामिल करना चाहता है तो इसके लिए यूजर को पूर्व में प्रकाशित उस रचना का लिंक ज्यों-की-त्यों पेस्ट करने की बजाय उसे दुबारा प्रकाशित कर उसके लिंक को शामिल करना होगा. अन्यथा रचनाएं स्वयं ही प्रतियोगिता से बाहर समझी जाएंगी.
  4. प्रत्येक रचनाएं 200-600 शब्दों की होनी अनिवार्य है. इससे कम या अधिक शब्दों वाले लेख को प्रतियोगिता में शामिल नहीं माना जाएगा.
  5. जागरण जंक्शन रीडर सेक्शन के सभी वर्तमान सदस्य इस प्रतियोगिता के लिए पात्र हैं. प्रतियोगिता की अवधि के दौरान पंजीकृत नए यूजर भी इसमें शामिल हो सकते हैं.
  6. इस प्रतियोगिता में भागीदारी के लिए आप जो भी ब्लॉग प्रकाशित करें उसके शीर्षक में अपने ब्लॉग टाइटल के अलावा केवल अंग्रेजी में “Contest” अवश्य लिखें या फिर कैटेगरी के रूप में ‘contest’ का चयन करें.
  7. प्रतियोगिता के लिए प्रकाशित ब्लॉग (प्रविष्टि) पोस्ट का लिंक इस आमंत्रण ब्लॉग के रिप्लाई कॉलम में जाकर अवश्य पोस्ट कर दें.
  8. अभद्र, अश्लील, सामुदायिक, धार्मिक भावना को आहत करने वाले तथा व्यक्तिगत टिप्पणी या लांक्षन वाले ब्लॉग पोस्टों को प्रतियोगिता के लिए अयोग्य समझा जाएगा.

प्रतियोगिता के विषय में किसी भी तरह की समस्या/स्पष्टीकरण के लिए आप feedback@jagranjunction.com पर मेल कर सकते हैं.

नोट: Contest को लेकर किसी भी तरह के विवाद में जागरण जंक्शन की कोई जिम्मेदारी नहीं है.


(Tata Tea Jaago Re initiative in association with Jagran)


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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

deepak pande के द्वारा
March 18, 2017

http://deepakbijnory.jagranjunction.com/2017/03/18/%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A5%80-%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%81/ आज जब इस शीर्षक पर कुछ कहानी लिखने को आमंत्रित किया गया तो मैंने बड़ी गहनता से विभिन्न स्त्रियों के बारे में सोचा जिन्होंने देश और समाज के लिए अनवरत संघर्ष किया मगर अंत में इसी निर्णय में पहुँचा कि मेरी नज़रों में सबसे महत्वपूर्ण नारी मेरी माँ है जिसने हमारे पालनपोषण में अपना सर्वस्व अर्पण कर दिया और सही ही तो है देश और समाज के लिए सबसे महत्वपूर्ण स्त्री माँ ही तो है चाहे वह किसी भी इंसान क़ी माँ हो ये माँ शब्द ही पूरे समाज और देश की नींव है यहां पर मैं अपनी माँ के संघर्ष को एक कविता के रूप में बयान करना चाहूंगा मेरी माँ (कविता) आज जब बेटा मेरा पाठशाला से आया माँ को तुरंत माँ दिवस पे प्रपत्र थमाया ये देख अपनी माँ का मुझे ख्याल है आया सारी उम्र जो संघर्ष करती ही रही दुश्वारियों से सदा जो लड़ती ही रही अब तक अपनी माँ को समझ पाया ही नहीं ज़हन में ये ख्याल कभी आया ही नहीं ……………………………………………. लेने सब्ज़ी जब भी अम्मा जाती थी बाजार आँखों में उन चार बच्चों के होता था इंतज़ार वो चार आने की नमकीन भी होता था त्यौहार माँ की थकान से किसी को भी न था सरोकार माँ तुमने अपने आप कुछ भी खाया या नहीं ज़हन में ये ख्याल कभी आया ही नहीं ……………………………………………. जब सुबह के वक़्त बनते थे परांठे दो ही महज़ हर एक के हिस्से में आते तीसरा परांठा उन्हें क्यूँ नहीं मिला शिकवा यही रहा सदा रहा यही गिला माँ तूने एक भी परांठा खाया या नहीं ज़हन में ये ख्याल कभी आया ही नहीं ……………………………………………. समय गुज़रा धीरे धीरे बच्चे बड़े हुए शिक्षा के भी कुछ नए स्तम्भ खड़े हुए चक्र चला विकास का ज्यों ज्यों समय कटा त्यों त्यों माँ के शरीर से गहना भी घटा अपने श्रृंगार को माँ तूने कुछ बचाया या नहीं ज़हन में ये ख्याल कभी आया ही नहीं ……………………………………………. खुश हो जाती माँ जब भी राखी के दिन आते उन दिनों वो बच्चे कुछ ज्यादा ही पाते अपनी खातिर माँ ने कभी किया नहीं चर्चा भाई से मिले धन को भी बच्चों पर ही खर्चा अपने लिए माँ तूने कुछ बचाया या नहीं ज़हन में ये ख्याल कभी आया ही नहीं ……………………………………………. राशन की दूकान से वो गेंहूँ का लाना काँधे पे रख लेजा उसे चक्की पे पिसाना मुनिस्पलिटी के नल से वो पानी का लाना जरूरत से ज्यादा वो अपने तन को जलाना बच्चों को मदद को कभी बुलाया या नहीं ज़हन में ये ख्याल कभी आया ही नहीं ……………………………………………. माँ तकदीर तेरी तुझसे सदा रुष्ट ही रही फिर भी न जाने क्यूँ, तू संतुष्ट ही रही धीरे धीरे जब ग़मों की धुंध छंट गयी बदल गया समय मुफलिसी भी हट गयी न जाने अपने ही आप में गुमशुदा तू हो गयी समय से पहले ही इस जहां से विदा तू हो गयी तुझको न दे सका कोई , कुछ तूने पाया ही नहीं ज़हन में ये ख्याल कभी आया ही नहीं ……………………………………………. अपने में रही गुमसुम कुछ भी न कहा एक रोज़ गरम मोज़े बेटे को लाने को कहा सोचा था बड़े होकर वो सब कुछ दिलाएगा माँ ही चले गयी अब ये किसको बताएगा सुख सारे तुझको देने का उसको जूनून था बस मोज़े ही दे पाया ये ही सुकून था कोई तेरे लिए कुछ भी कर पाया ही नहीं ज़हन में ये ख्याल कभी आया ही नहीं ……………………………………………. दीपक पाण्डेय जवाहर नवोदय विद्यालय नैनीताल


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