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‘मानव अधिकार’ के बिना अर्थहीन है सभी अधिकार

Posted On: 7 Dec, 2016 Junction Forum में

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पहले उसका धर्म देखा गया फिर उसकी जाति इसके बाद उस मजदूर की जिंदगी एक सेठ ने अपने हाथों में ले ली. रोज मरने लगा वो तिल-तिलकर, लेकिन उसके मन में अभी भी एक सवाल था ‘क्या धर्म, जाति, वर्ग और व्यवसाय से हटकर सिर्फ एक इंसान होने के नाते उसे जीवन जीने का अधिकार नहीं है’?


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इस छोटे-से उदाहरण में बहुत बड़ी बात छुपी हुई है. वो है ‘जीने का अधिकार’. जोकि सबसे बड़ा मानवाधिकार भी है.

मानव होने के नाते आपको जो अधिकार प्राकृतिक रूप से मिलते हैं, उन्हें मानवाधिकार के नाम से जाना जाता है, यानि किसी भी इंसान की जिंदगी, आजादी, बराबरी और सम्मान का अधिकार ‘मानवाधिकार’ है.


भारतीय संविधान इस अधिकार की न सिर्फ गारंटी देता है, बल्कि इसे तोड़ने वाले को कानून के दायरे में भी लाया जाता है. भारत में 28 सितंबर 1993 से मानव अधिकार कानून अमल में लाया गया. 12 अक्‍टूबर, 1993 में सरकार ने राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग का गठन किया.


दूसरी तरफ इंसानी अधिकारों को पहचान देने और उसे अस्तित्व में लाने के लिए हर साल 10 दिसंबर को ‘अंतरराष्‍ट्रीय मानवाधिकार दिवस’ मनाया जाता है. मानवाधिकारों के संरक्षण के लिए एमनेस्टी इंटरनेशनल, ह्यूमन राइट वॉच जैसी संस्थाएं काफी सालों से काम कर रही हैं.


इस तरह से होता आ रहा है मानवाधिकारों का उल्लंघन

युद्ध को हमेशा से ही मानवजाति ही नहीं बल्कि पूरी प्रकृति के लिए विनाशक मानक जाता है. किसी दो देशों के बीच युद्ध होने पर चाहे गलती किसी की भी हो, लेकिन दोनों तरफ से लोगों की क्षति होती है. बस, इसी तरह होता है उनके मानवाधिकारों का हनन. जब उनकी इच्छा के विरूद्ध उनकी जिंदगी छीन ली जाती है और युद्ध से उन्हें भी अप्रत्यक्ष रूप से जोड़ लिया जाता है. जैसे, प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध की विभीषिका में मानवाधिकारों का व्यापक रूप से हनन हुआ था. आज भी दंगे, नरसंहार जैसे मुद्दे इसी दायरे में आते हैं.


वर्तमान हालातों पर एक नजर

हाल के कुछ सालों पर नजर डाली जाए तो वैश्विक स्तर पर हालात बिगड़ते ही जा रहे हैं. सीरिया गृहयुद्ध के साथ कई ऐसे देश हैं जो युद्ध की विभीषिका आज भी झेल रहे हैं. युद्ध की मार झेल रहे इन देशों से आए दिन लोग अपनी जिंदगी बचाकर दूसरे देशों की ओर रूख कर रहे हैं. जिसकी वजह से शरणार्थियों की चुनौतियां भी सामने आ रही है.


वहीं बात करें भारत की तो, देश के ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं, कामगारों, निचले वर्ग आदि समुदायों की स्थिति बेहद चिंताजनक है. जीने के लिए मूलभूत सुविधाओं का न मिल पाना भी मानवाधिकारों का हनन है, साथ ही महिलाओं, नवजातों को डायन, भूत-प्रेत आदि बताकर उनपर बढ़ती अत्याचार की घटनाएं भी मानवाधिकारों का हनन है.


एक मानव होने के नाते आप ‘मानव अधिकारों’ के बारे में क्या सोचते हैं? आपको क्या लगता है कि हमारे देश या विश्व में किस प्रकार से मानवाधिकारों का हनन हो रहा है? मानवधिकारों की दिशा में क्या काम किए जाने की जरूरत है? आप अपने विचार जागरण जंक्शन मंच के साथ साझा कर सकते हैं.




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