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हिंदी दिवस – क्यों घटता जा रहा है हिंदी भाषा का महत्व?

Posted On: 6 Sep, 2012 Others में

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हिंदी का प्रचार-प्रसार और उसका सर्वस्वीकृतिकरण क्या केवल एक भावनात्मक मुद्दा रह गया है? हिंदी के उत्थान की कसमें अंग्रेजी में खाई जाती हैं तो ये काफी हास्यास्पद होने के साथ बहुत ही वेदना उत्पन्न करने वाला सिद्ध होता है। हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में कैसे प्रतिष्ठित कराया जा सकता है? इस पर अब सभी हिंदी प्रेमियों को गहन चिंतन करना ही होगा।


प्रिय पाठकों,

14 सितंबर, 1949 को भारतीय संविधान सभा ने देवनागरी लिपि में लिखी गई हिंदी भाषा को अखण्ड भारत की प्रशासनिक भाषा के ओहदे से नवाजा था। यही वजह है कि हर वर्ष 14 सितंबर को हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है। लेकिन आज देश की यही राज भाषा स्वयं अपने अस्तित्व की तलाश कर रही है। अंग्रेजी के प्रसार-प्रचार ने मानों हिंदी से उसका अधिकार छीन लिया है।


कहने को तो लोग हिंदी को अपनी मातृ भाषा कहते हैं लेकिन युवा, जिन्हें हम देश का भविष्य कहकर भारी-भरकम जिम्मेदारी सौंप देते हैं, खुद हिंदी के महत्व को नकारता जा रहा है। उनके लिए हिंदी में बोलना अपने स्टेटस को कम करने जैसा है। यूं तो हिंदी दिवस के उपलक्ष्य में लगभग सभी स्कूल, कॉलेजों में कोई ना कोई आयोजन किया जाता है, जिनमें भागीदारी निभाने वालों की संख्या नगण्य होती है, पर जब बोलचाल और पढ़ाई की बात आती है तो उनकी प्राथमिकता अंग्रेजी को ही जाती है।


हम चाहे इस बात को कितना ही नजरअंदाज क्यों ना करें लेकिन सच यही है कि हिंदी भाषा के औचित्य पर प्रश्न चिह्न स्वयं हमने ही लगाया है।


कुछ ही दिनों में हिंदी दिवस आने वाला है। इस मौके पर जागरण जंक्शन मंच अपने सभी सम्मानजनक ब्लॉगरों और पाठकों से हिंदी के घटते वर्चस्व और व्यक्तिगत तौर पर उसकी उपयोगिता जैसे विषय पर लिखने का आग्रह करता है। आप जंक्शन के मंच पर अपने स्वतंत्र ब्लॉग के माध्यम से हिंदी से जुड़े सभी पहलुओं पर प्रकाश डाल सकते हैं और अन्य ब्लॉगरों के साथ भी विचार विमर्श कर सकते हैं।


नोट: अपना ब्लॉग लिखते समय इतना अवश्य ध्यान रखें कि आपके शब्द और विचार अभद्र, अश्लील और अशोभनीय ना हों तथा किसी की भावनाओं को चोट ना पहुंचाते हों।


धन्यवाद

जागरण जंक्शन परिवार




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20 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

AMIT SINHA के द्वारा
June 20, 2013

हम आपके बात से सहमत हैं हिंदी दिवस केवल एक दिन का समोराह बन कर रह गया है इसे लोग टाइम पास समझाने लगे हैं मुझे इस बात का बहुत दुःख है की आज भी बहुत सारे अहिन्दी भाषी राज्यों के सरकारी ऑफिस में हिंदी दिवस पर खीझते हैं मेरी राय है की हिंदी को सहज और सरल बनाने के लिए हिंदी के कलिष्ट शब्दों का न प्रयोग कर सव्रप्रथम देवनागरी लिपि का प्रयोग करनी चाहिए जैसे executive को हिंदी भाषा में न रूपांतरित करके उसे एग्जीक्यूटिव लिखना चाहिए ताकि लोगो को धीरे धीरे समझ में आए और इसे लोगो सहजता से अपनाये. धन्यवाद !

Santlal Karun के द्वारा
September 14, 2012

हिन्दी दिवस पर विशेष : यह क्या हो गया है ! यह हमारी ज़बान को क्या हो गया है कि इस पर से सजी-सँवरी धूप का विश्वाश उठ रहा है इससे सोंधी मिट्टी की आशा टूट रही है इस पर नक्षत्र चढ़ते कदम भरोसा नहीं करते इससे नई निगाहों को आगे राह नहीं दिखती | यह हमारी ज़बान को क्या हो गया है कि इसके रहते एक सफ़ेद मुँहचढ़ी ज़बान देश की अलिजिह्वा तक का रंग सफ़ेद डाइ की तरह बदल रही है वह शब्दों के तैलीय तरण-ताल में नहाकर गाँवों तक आधुनिकता की कुलाँचें मार रही है जगह-जगह भूमण्डलीकरण के कैम्प लगाकर सब की नसों में कोकीन डाल रही है और एक अरब लोगों की चेतना कोम्-आ में पहुँचाकर उसके खून-पसीने की सारी रंगत दुह रही है | यह हमारी ज़बान को क्या हो गया है कि इसके ऊपर एक तेज़ी से फैलनेवाली बहुत महीन असाध्य, परजीवी पर्त उग आई है जो दिनोंदिन और ढीठ होती जा रही है | सिर पर मंडरा रही है आँखों में धूल झोंक रही है कानों में कौड़ी डाल रही है होंठों पर थिरक रही है छाती पर मूँग दल रही है जो हाथों को धोखे से बाँध रही है पैरों पर कुल्हाड़ी चला रही है और जो विषकन्या की तरह हमारे देश के साथ अपघात कर रही है | यह हमारी ज़बान को क्या हो गया है कि केवल पन्द्रह वर्षों का झाँसा देनेवाली जैसे अब घर-बैठा बैठने पर तुल गयी है वह आज भी हमारी जीभ पर षड्यन्त्र का कच्चा जमींकंद पीस रही है हमारी सारी सोच-समझ हलक के गर्त में ढकेल खुद बाहर बेलगाम हो रही है जो हमारे मन की नहीं कहती हमारे मुख को नहीं खोलती हमारे चेहरे की नहीं लगती और जो आकाशबेल की तरह हमारे देश के मानसवृक्ष पर फैलती जा रही है | यह हमारी ज़बान को क्या हो गया है कि इसे सभी राजनगर हर साल एक बार अपनी कमर झुकाकर प्रणाम करते हैं स्तुति का आयोजन करते हैं गले में वचन-मालाएँ लाद देते हैं कुछ दिनों के तर्पण से कितना तृप्त करते हैं फिर पूरे साल यह पिछलग्गू बनी दौड़ी फिरती है राजमहिषी का पद छोड़ चाकरी करती है और जो दूसरी सिरचढ़ी है, जिसकी तूती बोलती है देश की बोलती बंद करने का दहशत फैलाती है | यह हमारी ज़बान को क्या हो गया है जो रूपवान-गुणवती भिखारिन की तरह गली–कूचे में धक्के खा रही है हर कहीं बे-आबरू हो रही है हर मोड़ पर आँसू बहा रही है जिसे देख पालतू कुत्ते भौंकते हैं आवारा दौड़ा-दौड़ाकर नोचते हैं आखिर, यह सब क्या हो गया है यह हमारी ज़बान को क्या हो गया है | – “अतलस्पर्श”, संतलाल करुण

Santlal Karun के द्वारा
September 14, 2012

“ हे मेरे देश ! काटकर तुम्हारी ज़बान प्रतिष्ठित कर दी गई है राजमन्दिर में राजपुजारी ज़बरदस्ती पूजा में तुले हैं जबकि राजभवन के पिछवाड़े से लपलपाती एक दूसरी ज़बान तेल लगाकर छोड़ दी गई है समूचे राजनगर को चाटने केलिए ऐसा करके तुम्हें अंतर-राष्ट्रीय ऊँचाई दी जा रही है वे कहते हैं |”               – संतलाल करुण                     “अतलस्पर्श” में संगृहीत ‘खुला अपहार’ से

Santlal Karun के द्वारा
September 14, 2012

हिन्दी दिवस पर विशेष : खुला अपहार हे मेरे देश ! तुम्हारे गर्द-गुबार भरे बिखरे-बिखरे बाल धुँधली, निस्तेज, उदास-उदास आँखें झुर्रीदार, पिचके-पिचके गाल तब्दील किए जा रहे हैं इमामों-मठाधीशों के कढे-सवरें बालों तेली के बैल की बड़ी-ढकी आँखों उधार के भरे-उजले यूरोपियन गालों में ऐसा करके तुम्हारा गौरव बढ़ाया जा रहा है वे कहते है | हे मेरे देश ! तुम्हारी टूक-टूक होती घायल छाती बेहिसाब बोझ से झुकी नंगी पीठ भुनाई जा रही हैं नव नगद न तेरह उधार के रास्ते जिससे धन्नासेठों के आसमान चढ़ते पेट भावी भारत–रत्नों की पीठें उतान-वितान हो रहे हैं ऐसा करके तुम्हारी साख बढ़ाई जा रही है वे कहते हैं | हे मेरे देश ! काटकर तुम्हारी ज़बान प्रतिष्ठित कर दी गई है राजमन्दिर में राजपुजारी ज़बरदस्ती पूजा में तुले हैं जबकि राजभवन के पिछवाड़े से लपलपाती एक दूसरी ज़बान तेल लगाकर छोड़ दी गई है समूचे राजनगर को चाटने केलिए ऐसा करके तुम्हें अंतर-राष्ट्रीय ऊँचाई दी जा रही है वे कहते हैं | हे मेरे अपने देश ! वे कुछ भी कहें, पर खुलेआम –- क्या तुम्हारा चेहरा दागी नहीं किया जा रहा ! क्या तुम्हारा यथार्थ अँधेरे में नहीं घसीटा जा रहा ! क्या तुम्हारे विचारों की बोलती बंद नहीं की जा रही ! — ‘अतलस्पर्श’, से

Santlal Karun के द्वारा
September 14, 2012

हिन्दी दिवस 14 सितम्बर’ 12 पर : तकनीकी माध्यमों में हिंदी अनुप्रयोग की संभावनाएँ वैसे तो स्वतंत्रता-प्राप्ति के 65 वर्षों के उपरान्त आज के अत्याधुनिक तकनीकी माध्यमों में “हिंदी अनुप्रयोग की सामयिक आवश्यकता” की जगह संभावनाओं की तलाश राष्ट्रभाषा के प्रति हमारे दृष्टिकोण का हल्कापन ही प्रकट करता है, पर है यह विषय इतना प्रासंगिक कि राष्ट्रभाषा की घटती व्यावहारिक महत्ता और अंग्रेजी की दिन-पर-दिन बढ़ती सत्ता के तथ्यों को काफी कुछ उजागर करने में हमारी मदद करता है | विभिन्न तकनीकी माध्यमों में हिंदी-अनुप्रयोग की संभावनाओं पर विचार करते समय पहले हमें यह देखना होगा कि इन माध्यमों में कैसी भाषिक चेतना वाले लोगों की (भारतीय अथवा अंग्रेजीदाँ) पूँजी लगती है, कैसी भाषिक चेतना वाले लोगों द्वारा ये संचालित होते हैं और कैसी भाषिक चेतना वाले लोगों के लिए ये माध्यम कार्य करते हैं | दूसरे यह कि भारतीय अर्थ-व्यवस्था, बाजार, शासन-प्रशासन, विज्ञान-प्रौद्योगिकी, कृषि, चिकित्सा, वाणिज्य आदि के क्षेत्रों में दिनोंदिन अंग्रेजी के बढ़ते दबदबे और परिणाम स्वरूप भारतीय जनमानस पर पड़ते उसके मनोवैज्ञानिक प्रभाव के विभिन्न पहलुओं को समझे बिना तकनीकी माध्यमों में हिंदी अनुप्रयोग की संभावनाओं को ठीक-ठीक नहीं समझा जा सकता है | तकनीकी माध्यमों से जुड़े जिस वर्ग-त्रयी का उल्लेख किया गया, उसमें पहला वर्ग पूँजीपतियों का है, जिसका झुकाव अंग्रेजों के शासन-काल से ही अंग्रेजी की ओर है | अपवाद रूप में इस वर्ग के कुछ सच्चे राष्ट्रभक्तों और हिंदी प्रेमियों को छोड़कर बाकियों की अंग्रेजी-मानसिकता के कारण (अन्य अनेक कारण भी हैं) हिन्दी आज तक राष्ट्रभाषा का वास्तविक स्थान नहीं पा सकी | यह वर्ग बोलचाल में हिंदी अथवा अन्य भारतीय भाषाओं का प्रयोग तो करता है, किन्तु लिखने-पढ़ने में इसकी भाषिक क्षमता अंग्रेजी में पाई जाती है, हिंदी में प्राय: नहीं | इस वर्ग की भावी पीढ़ियाँ माँग-पूर्ति के इस व्यावसायिक जगत में हिंदी अथवा अन्य भारतीय भाषा-भाषी जनता की क्रय-शक्ति के चलते बोलचाल में “हिंग्लिस” का प्रयोग तो अभी कुछ दशकों तक करती रहेगीं, किन्तु लिखने-पढ़ने में उनके द्वारा हिंदी के तिरस्कार की प्रबल संभावना है | दूसरा वर्ग, मध्यस्थों का है, जो सीधे तकनीकों से जुड़े होते हैं | इस वर्ग में मीडिया-कर्मी, ज्ञान-विज्ञान, प्रौद्योगिकी, शिक्षा, चिकित्सा, कृषि, सिनेमा आदि क्षेत्रों के तकनीशियन, विशेषज्ञ, भाषाविद, कलाकार, चित्रकार आदि आतें हैं | इनकी वृत्ति ‘सेवा और अर्जन’ पर टिकी होती है | इस वर्ग के अधिकांश लोग मन से न सही, किन्तु रोजी-रोटी के गहराते संकट और बढ़ती आवश्यकताओं के कारण अंग्रेजी से प्रभावित हैं | भारतीयता में अपने पाँव टिकाये रखने के लिए ये लोग द्विभाषिता-बहुभाषिता की क्षमता अपनाकर सक्रिय हैं | उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध तक हमारे देश के अधिकांश क्षेत्रों में अंग्रेजी छठीं कक्षा से पढ़ाई जाती थी, किन्तु आज इनके बच्चे नर्सरी से ही अंग्रेजी माध्यम के पाठ्यक्रमों से शिक्षा पा रहे हैं | ऐसे में इनकी आगामी पीढ़ी से अपवादों को छोड़कर हिंदी अथवा भारतीय भाषाओँ के प्रति आत्मीयता की आशा करना व्यर्थ है | रहा तीसरा वर्ग, जो आम नागरिकों का वर्ग है और जिसमें तरह-तरह के लोग आते हैं – शिक्षित-अशिक्षित, सरकारी-अर्धसरकारी-गैर सरकारी वेतनभोगी, किसान-मजदूर, भिन्न-भिन्न काम-धंधों से जुड़े गाँव और शहर के लोग, उच्च-मध्य-निम्न वर्गीय इत्यादि | यह भाँति-भाँति लोगों का भाँति-भाँति के वातावरण और ज़मीन से जुड़ा वर्ग है और मोबाइल फोन, लैपटॉप, पामटॉप आदि उन की भी पहुँच के दायरे में हैं | सामान्यतया अभी तक यह वर्ग हिंदी अनुप्रयोग के लिए अपने मन-मस्तिष्क का द्वार खोले हुए है, किन्तु इसकी दृष्टि उन्हीं पूँजीपतियों, राजनेताओं, नौकरशाहों, फ़िल्म और खेल जगत के सितारों आदि पर लगी हुई है, जिनकी जीवन-शैली प्राय: पाश्चात्य चकाचौंध और अंग्रेजियत से प्रभावित है | गौर करने लायक तो यह है कि पूर्णतया भारतीय भाषा-भाषी मानस रखते हुए इस वर्ग के लोग भी अपनी संतानों को लेकर अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों की ओर रुख किए हुए हैं और जो किन्हीं कारणों से नहीं किए हुए हैं, वे भी ऐसे स्कूलों के पक्ष में उत्साहित हैं | ग्रामीण क्षेत्र के कृषक-मजदूर या तो उस तरह का विद्यालयीय वातावरण नहीं पाते या फिर उनकी आय अंग्रेजी माध्यम के पब्लिक स्कूलों का खर्च वहन करने में असमर्थ है | किन्तु उनकी समझ में भी यह तथ्य घर करता जा रहा है कि यदि हमें अपने बच्चों का भविष्य सुनहरा बनाना है तो हिंदी माध्यम से काम नहीं चलेगा | इसी प्रकार यदि शासन के आधार पर देखा जाए तो 2 वर्ग सामने आते हैं-– शासक वर्ग और शासित वर्ग | प्राय: शासक वर्ग वरिष्ठ और आदर्श माना जाता है | यही कारण है कि शासित वर्ग शासक वर्ग के पहनावे, रहन-सहन, खान-पान, बोली-भाषा आदि का अनुकरण करना चाहता है | दुर्भाग्य से स्वतंत्रता प्राप्ति के 65 वर्षों के उपरान्त भी शासक वर्ग की भाषिक क्षमता पर अंग्रेजी का नशा (कुछ राज्य सरकारों और अधिकतर उनके निम्न श्रेणी लिपिकीय काम-काज को छोड़कर) चढ़ा हुआ है, जिसे शासित वर्ग ललक भरी निगाह से देखता है और शासक वर्ग की तरह वह भी चाहता है कि अंग्रेजी उसके सर चढ़ कर बोले | यही कारण है कि देश भर में अंग्रेजी माध्यम के पब्लिक स्कूलों की संख्या तेजी से बढ़ रही है| दूसरी ओर ग्रामीण क्षेत्रों में ही नहीं, बड़े-बड़े शहरों में भी हिन्दी माध्यम के प्राथमिक-माध्यमिक विद्यालयों (अधिकतर सरकारी) की देख-रेख, शिक्षा-व्यवस्था, अध्यापकों की उपस्थिति आदि इस तरह अव्यवस्थित होती है कि कोई भी सजग नागरिक अपने बच्चों को या तो वहाँ भेजना नहीं चाहता या विवशता में भेजता है | जहाँ तक उच्च स्तर पर विज्ञान, प्रोद्योगिकी, कृषि, चिकित्सा, वाणिज्य आदि विषयों के माध्यम की बात है, तो अभी तक अंग्रेजी माध्यम में ही श्रेष्ठतर मानी जाती है | साधारण परिवार के हिन्दी भाषी छात्रों की बेहद माँग पर उच्च शिक्षा में हिन्दी माध्यम का क्रियान्वयन अन्तर-राष्ट्रीयता व आधुनिकता के छठें दशक से चालू कृत्रिम-राजनीतिक मिथक के कारण प्रभावशाली नहीं हो पा रहा है | इस देश में जर्मन, फ़्रांसीसी, अरबी जैसी भाषाओँ के अनुप्रयोग की संभावनाओं की तलाश की जाए तो बात समझ आती है, किन्तु 98 प्रतिशत भारतीय भाषा-भाषियों (जिनकी कि एक अत्यन्त लोकप्रिय, सशक्त सम्पर्क भाषा है और वह भाषा हिन्दी ही है) के बीच हिन्दी के अनुप्रयोग की संभावनाएँ तलाशना एक ओछे मज़ाक की तरह हृदय को बेध जाता है, पर इस विडम्बना का सच यहाँ कार्यालयों, संस्थानों, हाट-बाजारों आदि में पूरी तरह व्याप्त है | एक छोटी-सी बानगी एवं बड़ा स्पष्ट उदाहरण कि जब लखनऊ, पटना, जयपुर, दिल्ली-जैसे बड़े शहरों में ही नहीं छोटे-छोटे कसबों में भी हिन्दी में टाइपिंग के लिए भटकना पड़ता है, जबकि अंग्रेजी के टाइपिस्ट आसानी से मिल जाते हैं और इतना ही नहीं, हिन्दी की टाइपिंग अंग्रेजी के मुकाबले काफी मँहगी भी पड़ती है, तब लगता है कि हम हिन्दुस्तान में नहीं, इंग्लैण्ड में जी रहे हैं| याद आतें हैं ऐतिहासिक मानव-रीढ़ के धनी व्यक्तित्व तुर्की के राष्ट्रपति कमालपाशा, जिन्होंने सारे तर्क-वितर्क और राष्ट्रीय बहस के बाद यह निर्णय देने में देर नहीं लगाई कि हमारे देश की राष्ट्रभाषा तुर्की होगी और उसे आज ही आधी रात से लागू किया जाता है, किन्तु हमारे यहाँ पहले तो सदियों से जातीय वर्गवाद के आधार पर निस्सहाय जनता का शोषण किया जाता रहा और अब स्वतंत्रता के बाद से भाषाई वर्गवाद के सहारे बमुश्किल 2 प्रतिशत अंग्रेजीदाँ लोग 98 प्रतिशत भारतीय भाषा-भाषी जनता का शोषण करने पर उतारू हैं | इसलिए सच्चे मन से महात्मा कबीर की इस वाणी पर कान देने की ज़रूरत है कि “मोको कहाँ ढूढे बन्दे, मैं तो तेरे पास में |” वस्तुतः हिन्दी अनुप्रयोग की सारी संभावनाओं का केन्द्रक भारतीय संविधान में निहित है, जहाँ राष्ट्रभाषा-राजभाषा–सम्बन्धी अनुच्छेदों में इस संशोधन की अपेक्षा है कि अब से भारत संघ की राष्ट्रभाषा-राजभाषा हिन्दी होगी (अंग्रेजी को आज से जर्मन, फ्रांसीसी, अरबी आदि की अंतर-राष्ट्रीय विज़न की विदेशी भाषा श्रेणी में रखा जाता है) | राज्यों में उनकी अपनी भाषा जैसे कि तमिलनाडु में तमिल राजभाषा होगी तथा संघ व राज्यों की सम्पर्क भाषा हिन्दी होगी | फिर तकनीकी माध्यम ही नहीं देश भर में रोजी-रोटी से लेकर चोटी तक के सारे-के-सारे माध्यम-अमाध्यम रातोंरात हिन्दी का स्वर अलापने लगेंगे | रही अंतर-राष्ट्रीय सम्पर्क की बात, तो विश्व के अनेक महत्त्वशाली राष्ट्र हैं, उनकी भाषाएँ हैं, हमें उन सब को महत्त्व देना होगा और इसके लिए विद्यालय-विश्वविद्यालय स्तर पर हमारे यहाँ व्यवस्था है और अगर कम है, तो व्यवस्था बढ़ाई जा सकती है | हमारे यहाँ जागरूक शिक्षार्थियों की कमी नहीं है और अगर कमी है, तो जागरूकता भी बढ़ाई जा सकती है | अंतर-राष्ट्रीय स्तर पर रोजी-रोटी कमाने की इच्छा, अधिक अर्जन का दबाव, अनेक भाषाओँ में दिलचस्पी आदि ऐसे तमाम कारण हैं कि हमारे यहाँ अंतर-राष्ट्रीय सम्पर्क के लिए विदेशी भाषाओँ के जानकर नागरिकों की कमी कभी नहीं पड़ेगी | ऐसा होने से इस देश का नागरिक उस भाषा में काम कर सकेगा, जिसमें वह पैदा होता है, पलता-बढ़ता है और मृत्युपर्यंत सचेत-सक्रिय जीना चाहता है | फिर एक अरब से अधिक जनसंख्या वाला यह देश ज्ञान-विज्ञान-परिज्ञान के क्षेत्र में निश्चित ही बड़ी-बड़ी मिसालें कायम करने में सक्षम होगा | और फिर भविष्य में नवीन आविष्कारों-उपलब्धियों के भारतीय भाषाओँ में भी रखे गए तमाम नाम सुनाई देने लगेंगे | किन्तु इस तथ्य को हमारे अंग्रेजीदाँ कूटनीतज्ञ निहित स्वार्थों के कारण समझना नहीं चाहते | वे तो हमारे देश की अधिसंख्य जनता की भाषिक चेतना मारकर उसे निश्चेत और निष्क्रिय जीने को बाध्य करते हैं| जहाँ तक हिन्दी मान्यता की बात है तो वह 10 वीं शताब्दी से लेकर आज तक सर्वाधिक लचीली-सुलभ तथा चतुर्मुखी भाषा है | वह हर दृष्टि से राष्ट्रीय मंच के उपयुक्त है | यहाँ हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि अमेरिका सहित दुनिया के सभी विकसित देश अपनी चेतना को अपनी ही वाणी में रूपाकार देकर उन्नति के शिखर पर पहुँचे हैं | साथ ही यह भी कि चीन, जापान, फ़्रांस, जर्मनी-जैसे विकसित देशों की भाषा कभी भी अंग्रेजी नहीं रही और न ही वे अंग्रेजी के वर्चस्व से भयभीत हुए | उनकी भाषाओँ की अपेक्षा वैज्ञानिक तथा तकनीकी माध्यमों में हिन्दी अनुप्रयोग की तो और अधिक संभावनाएँ हैं | अंतत: वर्तमान और भविष्य दोनों दृष्टियों से “तकनीकी माध्यमों में हिन्दी अनुप्रयोग की संभावनाएँ” एक ऐसा मर्म है, जिसे हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओँ के पद, प्रतिष्ठा, व्यावहारिकता आदि के सन्दर्भ में कुरेदा जाना जितना सामयिक है, उतना ही समय रहते सावधान करने जैसा है | प्राचीन काल में संचार-तंत्र और तकनीकी माध्यम जब इतने सशक्त नहीं थे, तब भाषा की मान्यता का मापदण्ड बोल-चाल, लोकाभिव्यक्ति, साहित्य, शिलालेख, पाण्डुलिपियाँ आदि होती थीं, किन्तु आज आधुनिक संचार-तंत्र एवं तकनीकी माध्यम इतने सशक्त हैं कि उनमें अधिकाधिक अनुप्रयुक्त हुए बिना कोई भाषा मान्यता, लोकाप्रियता तथा राष्ट्रीयता के शिखर पर प्रतिष्ठापित नहीं हो सकती | अन्यथा इस देश की भाषाओँ के समानान्तरीय-द्विमार्गी होने का अभिशप्त खतरा और बढ़ता जाएगा— बोल-चाल में भारतीय भाषाएँ और राज-काज, काम-काज, लेख-बाँच आदि में अंग्रेजी |जिससे राष्ट्र अधभाषी, अधचेता, अर्ध-साक्षर और अर्धांग-अपंग होता जाएगा | दुर्भाग्य ! कि जिस पर मुक़दमा चलेगा या चलाया जाएगा, वह समझ नहीं पायेगा कि हमारे बारे में क्या कहा जा रहा है या क्या बहस हो रही है और जो बहस करेगा या निर्णय सुनाएगा, वह फरियादी के लिए नहीं, अपनी स्वार्थी अंग्रेजीदाँ हठधर्मिता के लिए, एक विकृत राष्ट्रीय कूटनीति के लिए | और इसलिए जब हिन्दी अथवा अन्य भारतीय भाषा-भाषी उपभोक्ता चाहे-अनचाहे अंग्रेजी के प्रभाव से मुक्त नहीं हो पा रहे हैं, उलटे हमारी अभिव्यक्तियाँ अब अंग्रेजी मिश्रित भाषा (हिंगलिश आदि) के अगले पायदानों पर कदम बढ़ा चुकी हैं, तो निश्चित ही तकनीकी माध्यमों में हिन्दी अनुप्रयोग की सारी संभावनाएँ भविष्य में कहीं भ्रूण, कहीं शैशव, कहीं बाल, कहीं यौवन की अवस्था में मृत्यु की घड़ियाँ गिनने को अभिशप्त हैं| इस शताब्दी की शतायु तथा अगली शताब्दियों की दीर्घायु तक कौन कितना बच पाएँगी कहना कठिन है | — संतलाल करुण

Santlal Karun के द्वारा
September 14, 2012

हिन्दी दिवस पर विशेष : मान-अपमान के साथ जीती आ रही हिन्दी हिन्दी राष्ट्र भाषा है , केन्द्र और कई राज्यों की राजभाषा है , समस्त भारत तथा विदेशों में रह रहे भारतीयों की सम्पर्क भाषा है | इसका साहित्य और लोक-साहित्य अत्यंत समृद्ध है |इसका खड़ीबोली रूप और देवनागरी लिपि मानक हैं | आधुनिक भारतीय भाषाओं में सर्वाधिक लोकप्रिय है | व्यवहार की दृष्टि से बहुत लचीली है | लगभग एक हजार वर्षों का इसका अपना इतिहास है | स्वतंत्रता-संग्राम में हिन्दी ही आंदोलन और सम्पर्क की प्रमुख भाषा रही | गांधी-सुभाष जैसे स्वतंत्रता- सेनानी इसे राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में आत्मिक रूप से पसंद करते थे | खुशरो से भारतेंदु और उनके परवर्ती नामचीनों तक इसके साहित्यकारों की अत्यन्त लंबी तथा गौरवशाली परम्परा है | फिर भी हिन्दी आज़ादी मिलते ही बाएँ हाथ की तरह दोयम दर्जे की, किन्हीं मामलों में त्याज्य, किन्ही मामलों में बड़े काम की बनकर रह गयी है | कहाँ इसकी पीठ पर थपथपी देकर गले में “जयमाल” डाला जाना है, कहाँ इसका “इस्तेमाल” किया जाना है और कहाँ इसका “एनकाउंटर” कर देना है — यह हमारे देश की शातिर कूटनीति तय करती रही है | किन्तु तब भी मान-अपमान के साथ हिन्दी आज़ादी के बाद से ही नहीं, अंग्रेजों के शासनकाल से ही बड़े जीवट से जीती आ रही है | — संतलाल करुण

Santlal Karun के द्वारा
September 14, 2012

                    हिन्दी दिवस पर विशेष : मान-अपमान के साथ जीती आ रही हिन्दी हिन्दी राष्ट्र भाषा है , केन्द्र और कई राज्यों की राजभाषा है , समस्त भारत तथा विदेशों में रह रहे भारतीयों की सम्पर्क भाषा है | इसका साहित्य और लोक-साहित्य अत्यंत समृद्ध है |इसका खड़ीबोली रूप और देवनागरी लिपि मानक हैं | आधुनिक भारतीय भाषाओं में सर्वाधिक लोकप्रिय है | व्यवहार की दृष्टि से बहुत लचीली है | लगभग एक हजार वर्षों का इसका अपना इतिहास है | स्वतंत्रता-संग्राम में हिन्दी ही आंदोलन और सम्पर्क की प्रमुख भाषा रही | गांधी-सुभाष जैसे स्वतंत्रता- सेनानी इसे राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में आत्मिक रूप से पसंद करते थे | खुशरो से भारतेंदु और उनके परवर्ती नामचीनों तक इसके साहित्यकारों की अत्यन्त लंबी तथा गौरवशाली परम्परा है | फिर भी हिन्दी आज़ादी मिलते ही बाएँ हाथ की तरह दोयम दर्जे की, किन्हीं मामलों में त्याज्य, किन्ही मामलों में बड़े काम की बनकर रह गयी है | कहाँ इसकी पीठ पर थपथपी देकर गले में “जयमाल” डाला जाना है, कहाँ इसका “इस्तेमाल” किया जाना है और कहाँ इसका “एनकाउंटर” कर देना है — यह हमारे देश की शातिर कूटनीति तय करती रही है | किन्तु तब भी मान-अपमान के साथ हिन्दी आज़ादी के बाद से ही नहीं, अंग्रेजों के शासनकाल से ही बड़े जीवट से जीती आ रही है | — संतलाल करुण

Pushpesh Pandey के द्वारा
September 13, 2012

आदरणीय जागरण जी, मुझे बचपन की कविता याद आती है कि उठो लाल अब आँखें खोलो* हिंदी देश की राष्ट्रभाषा, पर अपनी अस्मिता के लिए दिवस का सहारा ले रही है यह विडम्बना ही है कि हम इस एक दिन ही हिंदी दिवस मनाकर अपने कर्त्तव्य की इतिश्री कर लेते है. शायद हिंदी को भी इसी एक दिन अपने अस्तित्व का पता चलता होगा. शेष भगवती कृपा ..?

Vandana Baranwal के द्वारा
September 12, 2012

14 सितम्बर – हिंदी का सम्मान या श्रद्धांजलि अंग्रेजी शासनव्यवस्था में शारीरिक और मानसिक हर तरह से हमने जो गुलामी सही है आज भले ही वह दृष्टिगत नहीं हो परन्तु भाषाई गुलामी आज भी यथावत बरकरार है. कुछ समय पूर्व मैंने कैरियर बनाने के ऊपर हिंदी भाषा की एक पत्रिका में एक लेख पढ़ा था जिसका शीर्षक था “अंग्रेजी भाषा, तरक्की की परिभाषा”. यद्यपि वर्तमान परिदृश्य में लेख को लिखने वाला गलत नहीं था फिर भी मैं हिंदी भाषा की पत्रिका में अंग्रेजी की ऐसी तारीफ़ बर्दाश्त नहीं कर सकती थी. अतः मुझसे रहा नहीं गया और मैंने पत्रिका के संपादक के नाम एक पत्र भेजा. मुझे मालूम था कि कोई जवाब नहीं आएगा फिर भी मैं कुछ प्रतिशत ही सही संतुष्ट थी. क्यों? क्योंकि हर साल दशहरा मनाते वक्त सांकेतिक रावण जलाकर भी तो हम खुश होते हैं, उससे कौन सा भ्रष्टाचार और अधर्म मिट जाता है लेकिन फिर भी हम मनाते हैं. वैसे जब आज़ादी की पूर्व संध्या पर नेहरू एक तरफ पावर ऑफ अग्रीमेंट पर हस्ताक्षर कर रहे होंगे तो उस समय भी आजादी के मतवालों की आत्मा अवश्य संकल्पित रही होगी कि समय आने पर देश को भाषाई आजादी भी दिलानी है परन्तु राज बदलते ही वह संकल्पना केवल कल्पनाओं में ही सिमट कर रह गयी क्योंकि नीतियों का निर्धारण करने की शक्ति रखने वाले, उनको अमली जामा पहनाने के लिए जिम्मेदार लोग अंग्रेजी का मतलब जानते थे. उनको पता था कि इस भाषा में इतनी प्रबलता है कि राज करने के लिए इससे बेहतर कोई दूसरी शब्दावली हो ही नहीं सकती. बड़ी से बड़ी गलती करके SORRY बोल दो और बड़े से बड़ा काम करवाकर THANK YOU बोल दो. बाद में सब भूल जाओ. शायद इसीलिए अंग्रेज स्वयं तो चले गए और विरासत में अंग्रेजी को हमारा ध्यान रखने के लिए छोड़ गए. परिणामस्वरूप जब अंग्रेजों की सत्ता बदली और भारतीय राज शुरू हुआ तब भी व्यवस्थाएं नहीं बदलीं जा सकीं जो कुछ जैसा था जैसा चल रहा था सब उसी प्रकार चलता रहा. नयी-नयी सत्ता का स्वाद चखने वाले लोगों में से भी कुछ लोगों ने भी इसीलिए आजाद भारत के जन्म के साथ ही जिस भाषा को सीखा उसे ही अपनी मातृभाषा की तरह सिर्फ मान ही नहीं लिया बल्कि उसे राजनीतिक प्यार, आदर और सम्मान भी दिया और आम आदमी को भी यह मनवा दिया गया कि अब अंग्रेजी ही उसकी सामाजिक और भाषाई पहचान होगी. यहाँ तक कि न्याय भी उसको अंग्रेजी में ही मिला करेगी. हो सकता है वह समय की मांग रही हो या उस समय के नेताओं की जान बूझकर की गयी भूल रही हो या फिर अचानक बड़े परिवर्तन के लिए देश की मानसिकता ही तैयार नहीं रही हो परन्तु धीरे-धीरे वह सब कुछ हमारे अंदर इतना घुल मिल गया कि हम उन्हीं अंग्रेजी व्यवस्थाओं को अपनी व्यवस्थाएं मान बैठे और उसी में अपना भविष्य ढूंढते रहे.. शिक्षा व्यवस्था, चिकित्सा व्यवस्था, क़ानून व्यवस्था, अर्थ व्यवस्था और कृषि व्यवस्था सब कुछ अंग्रेजी तौर-तरीकों, नियमों एवं कानूनों के साथ आज़ादी के बाद जस के तस स्वीकार कर लिया हमने. परिकल्पना रही होगी कि आज़ादी के बाद एक बार पुनः भारत अपना तंत्र बनाएगा और अपने बनाये तंत्र यानि स्व तंत्र पर चल सकेगा साथ ही आजाद भारत के हमारे नेता देश में सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक शिक्षण आदि क्षेत्रों में भारत के मूलभूत चिंतन के आधार पर भारत का पुनर्निर्माण कर विकास का एक अनूठा नमूना पूरे विश्व के सामने पेश कर सकेंगे. उस समय इस दिशा में कुछ प्रयास दिखे भी मसलन तत्कालीन गृह मंत्री सरदार बल्लभ भाई पटेल ने रातों रात वो कर दिखाया जो आज के हमारे नेता सोच भी नहीं सकते क्योंकि उनके लिए तो आजतक कश्मीर मुद्दा ही चुनौती बना हुआ है जिसे शायद कभी हल नहीं कर पाएंगे. इतिहास के पन्नों में मैंने पढ़ा है कि मैकाले ने वर्ष 1835 में ही कहा था- “we must do our best to form a class who may be interpreters between us and the millions whom we given; a class of persons, Indian in blood and colour, but English in taste, in opinions, in words and in intellect” अर्थात, मैकाले मानता था की “भारत में लागू की गयी अंग्रेजी शिक्षा पद्धति से पढकर निकलने बाले विद्यार्थी रूप, रंग, खून व शरीर से भारतीय और विचार, आचरण, मान्यताओं व आत्मा से अंग्रेज होंगे. 1835 में मैकाले ने अपनी शिक्षा नीति की घोषणा की थी जिसे भारत के तत्कालीन गर्वनर जनरल विलियम बैंटिक ने लागू किया था और तभी से अंग्रेजी ने हिंदी को भी गुलामी के जीवन में धकेल दिया. मैकाले ने बहुत ही सूझ-बूझ के बाद यह निर्णय लिया था और उसे पता था कि अंग्रेजी भाषा अपनाकर हम भारतीय अपने गौरव को आसानी से भूल पाएंगे. दाद देनी पड़ेगी उसके दूर दृष्टि की, आज भी जिस तरह से हम अंग्रेजी ज़माने में बने स्मारकों और स्थलों को सहेजे हुए है और उन्हें नुक्सान पहुँचाने का अर्थ है जेल की हवा और अर्थ दंड की सज़ा उसी प्रकार अंग्रेजी नहीं आने का अर्थ है सामाजिक बहिष्कार की सज़ा और साथ ही मानसिक प्रताडना. देश के किसी भी ऊँचे पद पर बैठने के लिए अंग्रेजी का ज्ञान आवश्यक हो गया है. सामान्यतया आज हिंदी या फिर अपनी मातृभाषा में पढ़ा एक बच्चा रोजी-रोटी का जुगाड तो कर सकता है लेकिन किसी उच्च पद पर आसीन नहीं हो सकता है. यद्यपि अक्सर श्री ए.पी.जे. अब्दुल कलाम का कथन कि उनकी पढ़ाई मातृभाषा में हुई थी इसीलिए वे इतने महान वैज्ञानिक बन सके’ कई स्थानों पर दोहराया जाता है पर कितनों को यह सौभाग्य प्राप्त है.. एक उदाहरण आजकल चीन के बारे में दिया जा रहा है कि चीन में भी हर जगह लोग अंग्रेजी बोलना सीख रहे हैं लेकिन यहां पर कोई हमें यह नहीं बताता कि चीन ने समान स्कूल व्यवस्था भी लागू कर ली है और वहां कुछ विशिष्ट स्कूलों में प्रवेश के लिए जद्दो-जहद नहीं करनी पड़ती है यही नहीं चीन में प्रारंभिक शिक्षा मातृभाषा में ही दी जाती है और ऐसा नहीं करने वालों पर बच्चों के साथ मानसिक क्रूरता का अपराध भी लगाया जाता है. शारीरिक गुलामी से निजात दिलाने के लिए तो बहुतों ने बलिदान दिया था पर भाषाई गुलामी का नुक्सान हम समझ ही नहीं पाए, सरकारी तंत्र भी चौदह सितम्बर को कोरम पूरा करने के लिए एक दिवसीय प्रयास करते हैं पर इस दिन हिंदी को श्रद्धांजलि दी जाती है या फिर सम्मान, मेरी समझ से परे है. वंदना बरनवाल

Santlal Karun के द्वारा
September 11, 2012

हिन्दी दिवस 14 सितम्बर’ 12 पर :                                          तकनीकी माध्यमों में हिंदी अनुप्रयोग की संभावनाएँ                      – संतलाल करुण वैसे तो स्वतंत्रता-प्राप्ति के 65 वर्षों के उपरान्त आज के अत्याधुनिक तकनीकी माध्यमों में “हिंदी अनुप्रयोग की सामयिक आवश्यकता” की जगह संभावनाओं की तलाश राष्ट्रभाषा के प्रति हमारे दृष्टिकोण का हल्कापन ही प्रकट करता है, पर है यह विषय इतना प्रासंगिक कि राष्ट्रभाषा की घटती व्यावहारिक महत्ता और अंग्रेजी की दिन-पर-दिन बढ़ती सत्ता के तथ्यों को काफी कुछ उजागर करने में हमारी मदद करता है | विभिन्न तकनीकी माध्यमों में हिंदी-अनुप्रयोग की संभावनाओं पर विचार करते समय पहले हमें यह देखना होगा कि इन माध्यमों में कैसी भाषिक चेतना वाले लोगों की (भारतीय अथवा अंग्रेजीदाँ) पूँजी लगती है, कैसी भाषिक चेतना वाले लोगों द्वारा ये संचालित होते हैं और कैसी भाषिक चेतना वाले लोगों के लिए ये माध्यम कार्य करते हैं | दूसरे यह कि भारतीय अर्थ-व्यवस्था, बाजार, शासन-प्रशासन, विज्ञान-प्रौद्योगिकी, कृषि, चिकित्सा, वाणिज्य आदि के क्षेत्रों में दिनोंदिन अंग्रेजी के बढ़ते दबदबे और परिणाम स्वरूप भारतीय जनमानस पर पड़ते उसके मनोवैज्ञानिक प्रभाव के विभिन्न पहलुओं को समझे बिना तकनीकी माध्यमों में हिंदी अनुप्रयोग की संभावनाओं को ठीक-ठीक नहीं समझा जा सकता है | तकनीकी माध्यमों से जुड़े जिस वर्ग-त्रयी का उल्लेख किया गया, उसमें पहला वर्ग पूँजीपतियों का है, जिसका झुकाव अंग्रेजों के शासन-काल से ही अंग्रेजी की ओर है | अपवाद रूप में इस वर्ग के कुछ सच्चे राष्ट्रभक्तों और हिंदी प्रेमियों को छोड़कर बाकियों की अंग्रेजी-मानसिकता के कारण (अन्य अनेक कारण भी हैं) हिन्दी आज तक राष्ट्रभाषा का वास्तविक स्थान नहीं पा सकी | यह वर्ग बोलचाल में हिंदी अथवा अन्य भारतीय भाषाओं का प्रयोग तो करता है, किन्तु लिखने-पढ़ने में इसकी भाषिक क्षमता अंग्रेजी में पाई जाती है, हिंदी में प्राय: नहीं | इस वर्ग की भावी पीढ़ियाँ माँग-पूर्ति के इस व्यावसायिक जगत में हिंदी अथवा अन्य भारतीय भाषा-भाषी जनता की क्रय-शक्ति के चलते बोलचाल में “हिंग्लिस” का प्रयोग तो अभी कुछ दशकों तक करती रहेगीं, किन्तु लिखने-पढ़ने में उनके द्वारा हिंदी के तिरस्कार की प्रबल संभावना है | दूसरा वर्ग, मध्यस्थों का है, जो सीधे तकनीकों से जुड़े होते हैं | इस वर्ग में मीडिया-कर्मी, ज्ञान-विज्ञान, प्रौद्योगिकी, शिक्षा, चिकित्सा, कृषि, सिनेमा आदि क्षेत्रों के तकनीशियन, विशेषज्ञ, भाषाविद, कलाकार, चित्रकार आदि आतें हैं | इनकी वृत्ति ‘सेवा और अर्जन’ पर टिकी होती है | इस वर्ग के अधिकांश लोग मन से न सही, किन्तु रोजी-रोटी के गहराते संकट और बढ़ती आवश्यकताओं के कारण अंग्रेजी से प्रभावित हैं | भारतीयता में अपने पाँव टिकाये रखने के लिए ये लोग द्विभाषिता-बहुभाषिता की क्षमता अपनाकर सक्रिय हैं | उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध तक हमारे देश के अधिकांश क्षेत्रों में अंग्रेजी छठीं कक्षा से पढ़ाई जाती थी, किन्तु आज इनके बच्चे नर्सरी से ही अंग्रेजी माध्यम के पाठ्यक्रमों से शिक्षा पा रहे हैं | ऐसे में इनकी आगामी पीढ़ी से अपवादों को छोड़कर हिंदी अथवा भारतीय भाषाओँ के प्रति आत्मीयता की आशा करना व्यर्थ है | रहा तीसरा वर्ग, जो आम नागरिकों का वर्ग है और जिसमें तरह-तरह के लोग आते हैं – शिक्षित-अशिक्षित, सरकारी-अर्धसरकारी-गैर सरकारी वेतनभोगी, किसान-मजदूर, भिन्न-भिन्न काम-धंधों से जुड़े गाँव और शहर के लोग, उच्च-मध्य-निम्न वर्गीय इत्यादि | यह भाँति-भाँति लोगों का भाँति-भाँति के वातावरण और ज़मीन से जुड़ा वर्ग है और मोबाइल फोन, लैपटॉप, पामटॉप आदि उन की भी पहुँच के दायरे में हैं | सामान्यतया अभी तक यह वर्ग हिंदी अनुप्रयोग के लिए अपने मन-मस्तिष्क का द्वार खोले हुए है, किन्तु इसकी दृष्टि उन्हीं पूँजीपतियों, राजनेताओं, नौकरशाहों, फ़िल्म और खेल जगत के सितारों आदि पर लगी हुई है, जिनकी जीवन-शैली प्राय: पाश्चात्य चकाचौंध और अंग्रेजियत से प्रभावित है | गौर करने लायक तो यह है कि पूर्णतया भारतीय भाषा-भाषी मानस रखते हुए इस वर्ग के लोग भी अपनी संतानों को लेकर अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों की ओर रुख किए हुए हैं और जो किन्हीं कारणों से नहीं किए हुए हैं, वे भी ऐसे स्कूलों के पक्ष में उत्साहित हैं | ग्रामीण क्षेत्र के कृषक-मजदूर या तो उस तरह का विद्यालयीय वातावरण नहीं पाते या फिर उनकी आय अंग्रेजी माध्यम के पब्लिक स्कूलों का खर्च वहन करने में असमर्थ है | किन्तु उनकी समझ में भी यह तथ्य घर करता जा रहा है कि यदि हमें अपने बच्चों का भविष्य सुनहरा बनाना है तो हिंदी माध्यम से काम नहीं चलेगा | इसी प्रकार यदि शासन के आधार पर देखा जाए तो 2 वर्ग सामने आते हैं-– शासक वर्ग और शासित वर्ग | प्राय: शासक वर्ग वरिष्ठ और आदर्श माना जाता है | यही कारण है कि शासित वर्ग शासक वर्ग के पहनावे, रहन-सहन, खान-पान, बोली-भाषा आदि का अनुकरण करना चाहता है | दुर्भाग्य से स्वतंत्रता प्राप्ति के 65 वर्षों के उपरान्त भी शासक वर्ग की भाषिक क्षमता पर अंग्रेजी का नशा (कुछ राज्य सरकारों और अधिकतर उनके निम्न श्रेणी लिपिकीय काम-काज को छोड़कर) चढ़ा हुआ है, जिसे शासित वर्ग ललक भरी निगाह से देखता है और शासक वर्ग की तरह वह भी चाहता है कि अंग्रेजी उसके सर चढ़ कर बोले | यही कारण है कि देश भर में अंग्रेजी माध्यम के पब्लिक स्कूलों की संख्या तेजी से बढ़ रही है| दूसरी ओर ग्रामीण क्षेत्रों में ही नहीं, बड़े-बड़े शहरों में भी हिन्दी माध्यम के प्राथमिक-माध्यमिक विद्यालयों (अधिकतर सरकारी) की देख-रेख, शिक्षा-व्यवस्था, अध्यापकों की उपस्थिति आदि इस तरह अव्यवस्थित होती है कि कोई भी सजग नागरिक अपने बच्चों को या तो वहाँ भेजना नहीं चाहता या विवशता में भेजता है | जहाँ तक उच्च स्तर पर विज्ञान, प्रोद्योगिकी, कृषि, चिकित्सा, वाणिज्य आदि विषयों के माध्यम की बात है, तो अभी तक अंग्रेजी माध्यम में ही श्रेष्ठतर मानी जाती है | साधारण परिवार के हिन्दी भाषी छात्रों की बेहद माँग पर उच्च शिक्षा में हिन्दी माध्यम का क्रियान्वयन अन्तर-राष्ट्रीयता व आधुनिकता के छठें दशक से चालू कृत्रिम-राजनीतिक मिथक के कारण प्रभावशाली नहीं हो पा रहा है | इस देश में जर्मन, फ़्रांसीसी, अरबी जैसी भाषाओँ के अनुप्रयोग की संभावनाओं की तलाश की जाए तो बात समझ आती है, किन्तु 98 प्रतिशत भारतीय भाषा-भाषियों (जिनकी कि एक अत्यन्त लोकप्रिय, सशक्त सम्पर्क भाषा है और वह भाषा हिन्दी ही है) के बीच हिन्दी के अनुप्रयोग की संभावनाएँ तलाशना एक ओछे मज़ाक की तरह हृदय को बेध जाता है, पर इस विडम्बना का सच यहाँ कार्यालयों, संस्थानों, हाट-बाजारों आदि में पूरी तरह व्याप्त है | एक छोटी-सी बानगी एवं बड़ा स्पष्ट उदाहरण कि जब लखनऊ, पटना, जयपुर, दिल्ली-जैसे बड़े शहरों में ही नहीं छोटे-छोटे कसबों में भी हिन्दी में टाइपिंग के लिए भटकना पड़ता है, जबकि अंग्रेजी के टाइपिस्ट आसानी से मिल जाते हैं और इतना ही नहीं, हिन्दी की टाइपिंग अंग्रेजी के मुकाबले काफी मँहगी भी पड़ती है, तब लगता है कि हम हिन्दुस्तान में नहीं, इंग्लैण्ड में जी रहे हैं| याद आतें हैं ऐतिहासिक मानव-रीढ़ के धनी व्यक्तित्व तुर्की के राष्ट्रपति कमालपाशा, जिन्होंने सारे तर्क-वितर्क और राष्ट्रीय बहस के बाद यह निर्णय देने में देर नहीं लगाई कि हमारे देश की राष्ट्रभाषा तुर्की होगी और उसे आज ही आधी रात से लागू किया जाता है, किन्तु हमारे यहाँ पहले तो सदियों से जातीय वर्गवाद के आधार पर निस्सहाय जनता का शोषण किया जाता रहा और अब स्वतंत्रता के बाद से भाषाई वर्गवाद के सहारे बमुश्किल 2 प्रतिशत अंग्रेजीदाँ लोग 98 प्रतिशत भारतीय भाषा-भाषी जनता का शोषण करने पर उतारू हैं | इसलिए सच्चे मन से महात्मा कबीर की इस वाणी पर कान देने की ज़रूरत है कि “मोको कहाँ ढूढे बन्दे, मैं तो तेरे पास में |” वस्तुतः हिन्दी अनुप्रयोग की सारी संभावनाओं का केन्द्रक भारतीय संविधान में निहित है, जहाँ राष्ट्रभाषा-राजभाषा–सम्बन्धी अनुच्छेदों में इस संशोधन की अपेक्षा है कि अब से भारत संघ की राष्ट्रभाषा-राजभाषा हिन्दी होगी (अंग्रेजी को आज से जर्मन, फ्रांसीसी, अरबी आदि की अंतर-राष्ट्रीय विज़न की विदेशी भाषा श्रेणी में रखा जाता है) | राज्यों में उनकी अपनी भाषा जैसे कि तमिलनाडु में तमिल राजभाषा होगी तथा संघ व राज्यों की सम्पर्क भाषा हिन्दी होगी | फिर तकनीकी माध्यम ही नहीं देश भर में रोजी-रोटी से लेकर चोटी तक के सारे-के-सारे माध्यम-अमाध्यम रातोंरात हिन्दी का स्वर अलापने लगेंगे | रही अंतर-राष्ट्रीय सम्पर्क की बात, तो विश्व के अनेक महत्त्वशाली राष्ट्र हैं, उनकी भाषाएँ हैं, हमें उन सब को महत्त्व देना होगा और इसके लिए विद्यालय-विश्वविद्यालय स्तर पर हमारे यहाँ व्यवस्था है और अगर कम है, तो व्यवस्था बढ़ाई जा सकती है | हमारे यहाँ जागरूक शिक्षार्थियों की कमी नहीं है और अगर कमी है, तो जागरूकता भी बढ़ाई जा सकती है | अंतर-राष्ट्रीय स्तर पर रोजी-रोटी कमाने की इच्छा, अधिक अर्जन का दबाव, अनेक भाषाओँ में दिलचस्पी आदि ऐसे तमाम कारण हैं कि हमारे यहाँ अंतर-राष्ट्रीय सम्पर्क के लिए विदेशी भाषाओँ के जानकर नागरिकों की कमी कभी नहीं पड़ेगी | ऐसा होने से इस देश का नागरिक उस भाषा में काम कर सकेगा, जिसमें वह पैदा होता है, पलता-बढ़ता है और मृत्युपर्यंत सचेत-सक्रिय जीना चाहता है | फिर एक अरब से अधिक जनसंख्या वाला यह देश ज्ञान-विज्ञान-परिज्ञान के क्षेत्र में निश्चित ही बड़ी-बड़ी मिसालें कायम करने में सक्षम होगा | और फिर भविष्य में नवीन आविष्कारों-उपलब्धियों के भारतीय भाषाओँ में भी रखे गए तमाम नाम सुनाई देने लगेंगे | किन्तु इस तथ्य को हमारे अंग्रेजीदाँ कूटनीतज्ञ निहित स्वार्थों के कारण समझना नहीं चाहते | वे तो हमारे देश की अधिसंख्य जनता की भाषिक चेतना मारकर उसे निश्चेत और निष्क्रिय जीने को बाध्य करते हैं | जहाँ तक हिन्दी मान्यता की बात है तो वह 10 वीं शताब्दी से लेकर आज तक सर्वाधिक लचीली-सुलभ तथा चतुर्मुखी भाषा है | वह हर दृष्टि से राष्ट्रीय मंच के उपयुक्त है | यहाँ हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि अमेरिका सहित दुनिया के सभी विकसित देश अपनी चेतना को अपनी ही वाणी में रूपाकार देकर उन्नति के शिखर पर पहुँचे हैं | साथ ही यह भी कि चीन, जापान, फ़्रांस, जर्मनी-जैसे विकसित देशों की भाषा कभी भी अंग्रेजी नहीं रही और न ही वे अंग्रेजी के वर्चस्व से भयभीत हुए | उनकी भाषाओँ की अपेक्षा वैज्ञानिक तथा तकनीकी माध्यमों में हिन्दी अनुप्रयोग की तो और अधिक संभावनाएँ हैं | अंतत: वर्तमान और भविष्य दोनों दृष्टियों से “तकनीकी माध्यमों में हिन्दी अनुप्रयोग की संभावनाएँ” एक ऐसा मर्म है, जिसे हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओँ के पद, प्रतिष्ठा, व्यावहारिकता आदि के सन्दर्भ में कुरेदा जाना जितना सामयिक है, उतना ही समय रहते सावधान करने जैसा है | प्राचीन काल में संचार-तंत्र और तकनीकी माध्यम जब इतने सशक्त नहीं थे, तब भाषा की मान्यता का मापदण्ड बोल-चाल, लोकाभिव्यक्ति, साहित्य, शिलालेख, पाण्डुलिपियाँ आदि होती थीं, किन्तु आज आधुनिक संचार-तंत्र एवं तकनीकी माध्यम इतने सशक्त हैं कि उनमें अधिकाधिक अनुप्रयुक्त हुए बिना कोई भाषा मान्यता, लोकाप्रियता तथा राष्ट्रीयता के शिखर पर प्रतिष्ठापित नहीं हो सकती | अन्यथा इस देश की भाषाओँ के समानान्तरीय-द्विमार्गी होने का अभिशप्त खतरा और बढ़ता जाएगा— बोल-चाल में भारतीय भाषाएँ और राज-काज, काम-काज, लेख-बाँच आदि में अंग्रेजी |जिससे राष्ट्र अधभाषी, अधचेता, अर्ध-साक्षर और अर्धांग-अपंग होता जाएगा | दुर्भाग्य ! कि जिस पर मुक़दमा चलेगा या चलाया जाएगा, वह समझ नहीं पायेगा कि हमारे बारे में क्या कहा जा रहा है या क्या बहस हो रही है और जो बहस करेगा या निर्णय सुनाएगा, वह फरियादी के लिए नहीं, अपनी स्वार्थी अंग्रेजीदाँ हठधर्मिता के लिए, एक विकृत राष्ट्रीय कूटनीति के लिए | और इसलिए जब हिन्दी अथवा अन्य भारतीय भाषा-भाषी उपभोक्ता चाहे-अनचाहे अंग्रेजी के प्रभाव से मुक्त नहीं हो पा रहे हैं, उलटे हमारी अभिव्यक्तियाँ अब अंग्रेजी मिश्रित भाषा (हिंगलिश आदि) के अगले पायदानों पर कदम बढ़ा चुकी हैं, तो निश्चित ही तकनीकी माध्यमों में हिन्दी अनुप्रयोग की सारी संभावनाएँ भविष्य में कहीं भ्रूण, कहीं शैशव, कहीं बाल, कहीं यौवन की अवस्था में मृत्यु की घड़ियाँ गिनने को अभिशप्त हैं| इस शताब्दी की शतायु तथा अगली शताब्दियों की दीर्घायु तक कौन कितना बच पाएँगी कहना कठिन है |

वेदविभु के द्वारा
September 10, 2012

14 सितंबर, 1949 को भारतीय संविधान सभा ने देवनागरी लिपि में लिखी गई हिंदी भाषा को अखण्ड भारत की प्रशासनिक भाषा के ओहदे से नवाजा था कहना ठीक नहीं है। इस दिन यह निश्चय किया गया था कि राज की भाषा अंग्रेजी के स्थान पर हिंदी बनाई जाएगी। इस निश्चय को जब लागू करने की बारी आई तो अंग्रेजीदा नेहरु की टोली ने वही किया जो कॉमन लॉ के नाम पर भारत में सामाजिक सुधार की बात कही गई थी लेकिन एक आध मुसलिम व ईसाई के विरोध को देखकर हिंदू कॉमन लॉ छोड़कर सब पर लागू कर किया था। अंग्रेजी जब तक जारी रहेगी जब तक सब राज्यों की विधानसभाएं इस संबंध में प्रस्ताव पास कर नहीं देंगी। जब कि यह शर्त किसी भी अन्य कानून के लागू न की गई थी। न 9 मन तेल होगा न राधा नाचेगी। अतः यह हिंदी दिवस न होकर राजभाषा दिवस ही है तथा राजभाषा विभागों को सरकारी आदेश पूरे करने के लिए यह दिन मनाना पड़ता है जैसे सद्भावना दिवस तथा अंबेडकर पुण्य तिथि मनानी होती है। विदेशी विशेष कर अंग्रेजी के शब्दों का मानकीकृत अनुवाद न होने से तथा उनका प्रचार तंत्र द्वारा प्रयोग न होने से अंग्रेजी के शब्द धीरे-धीरे हिंदी में समा गए हैं जिनके लिए छोटी-छोटी भाषाओं ने अपने शब्द प्रयोग में लिए हैं। राष्ट्र मंडल जैसा प्रचलित व सहज शब्द भी अंग्रेजीदा हिंदी टीवी मीडिया को पसंद नहीं आता तथा कॉमनवेल्थ गेम सी डब्ल्यू जी की रट लगा बैठा। इस तरह अंग्रेजी दा या 50 वर्ष पुराने फारसी अरबी के शब्दों के प्रयोग को सामान्य आदमी के नाम से प्रचारित करने का षड्यंत्र सरकारी तथा सांप्रदायिक वहाबी शक्तियां कर रही हैं। सरकार की स्थिति तो यह है कि यह नियम कश्मीर तथा तमिलनाडू में इन उपबंधों के साथ लागू न होंगे कहकर राजभाषा हिंदी का स्थान आज भी अंग्रेजी को दिया हुआ है। शासन तथा समाज में प्रभावशाली वर्ग आज भी अंग्रेजी को अंतर्राष्ट्रीयता के नाम से प्रचारित कर देशवासियों को गुमराह करता है तथा हिंदी की बात पर प्रदेशों की भाषा को लाने की बात कहकर संविधान तथा संसद के संकल्प की धज्जियां उड़ाता है। समाज में इन स्थितियों को देखते हुए तथा बढ़ते अंतर्राष्ट्रीय बहुदेशीय कंपनी प्रभाव के कारण कुकरमुत्तों की तरह “इंगलिश मीडियम स्कूल” खुल गए हैं जहां से न तो सही अंग्रेजी सीखने को मिलती है और न ही विद्यार्थी हिंदी का पर्याप्त ज्ञान ले पा रहे हैं। इस क्रियोलीकरण खेल में तकनीक पर हिंदी का बहुत देर से आना और भी रंग चोखा कर देता है। कंप्यूटर हो या मोबाइल, टेबलट या लैपटॉप हिंदी के विषय में कंपनियां की वितृष्णा साफ दिखाई देती है। आज तक माइक्रोसॉफ्ट ने हिंदी का मूल कीबोर्ड तक नहीं निकाला है जबकि विश्व की 56 भाषाओं में विंडोज एक्स पी के आने से पहले से यह उपलब्ध कराया गया है विंडोज 7 में पहली बार हिंदी के फोंट स्वतः यूनीकोड के पूर्व सक्षम बनाए गए थे। लाइनक्स में भी स्थिति कोई विशेष बेहतर नहीं है इंडियन में क्ष त्र ज्ञ सीधे टाइप नहीं होते इन दिनों आईबस में यह सुविधा दी गई है। भारत सरकार टाइप प्रशिक्षण रेमिंगटन टाइपराइटर आधारित देती है तथा इनस्क्रिप्ट को यूनीकोड में मान्य की बोर्ड बनाती है। चलन में सर्वाधिक प्रयोग गूगल तथा माइक्रोसॉफ्ट इंडिक टूल जो a से अ b से ब बनाते हैं का हो रहा है तथा कृतिदेव देव चाणक्य आज भी डॉक फाइलों के लिए चल रहे हैं जो यूनिकोड फोंट नहीं हैं। इसी प्रकार संसद में विधि विभाग में हिंदी अनुवादकों के विभिन्न स्तरों के पद खाली हैं तथा उच्च स्तरीय अनुवाद तथा मानकीकरण की व्यवस्था सरकार ने भी नहीं की है। इससे राज्यों तथा केंद्र सरकार के विभिन्न कार्यालयों में एक अंग्रेजी शब्द के विभिन्न रूप प्रचलन में आ गए हैं। हिंदी के उच्च स्तरीय साहित्य के तो हाल इस दशक में इतने बुरे हो गए हैं कि नए लेखकों के नाम पर 15 वर्ष पुराने लेखक को याद दिलाया जाता है। इसी तरह प्रकाशक भी आपूर्ति की पुस्तकें छाप कर या विदेशी चर्चित पुस्तकें हिंदी में अनुवाद कर अपने कर्त्तव्य की इतिश्री समझ लेता है। जहां पर हिंदी दिखाई देती है वहां पर सांस्कृतिक तत्व के स्थान पर स्थानीय मान्यताओं को हिंदू धर्म कहकर इस्लाम व ईसाईयत का प्रचार करने वाले कॉपी पेस्ट कर मुफ्त की साइटों पर हिंदी के नाम से भयंकर कचरा एकत्र कर चुके हैं जो खोज में सबसे पहले सामने आता है तथा आम जन की हिंदी के प्रति वितृष्णा को बढ़ाता है। हिंदी का प्रयोग जिस रूप में बढ़ा है वह हिंदी सिनेमा कहा जाता है जहां ध्यान रहे कि सर्वाधिक उच्च स्तरीय पत्रिकाएं व पुरस्कार अंग्रेजी वालों के दिए जाते हैं तथा अभिनेता-अभिनेत्रियां भी अंग्रेजी में साक्षात्कार देते व चमक दमक की तस्वीरें खिंचवाते दिखाई देते हैं। इस तरह दोयम स्तर की हिंदी का प्रचार आज हो रहा है तथा सरकार व तथाकथित हिंदी प्रेमी इसे उपलब्धि बनाते नजर आते हैं। भारत सरकार की हिंदी के प्रति यह नीति न तो अंग्रेजी को राजभाषा से कभी हटाएगी न हिंदी के सर्वांगीण विकास का सार्थक प्रयास होगा। सरकार से लाभान्वित एनजीओ इस कार्य में सरकार की सहायता करेंगे तथा क्षत्रप नेतृत्व राष्ट्रीयता का समावेश तथा व्यापक संपर्क भाषा को इस तरह विवादित कर देगा कि स्थानीय सत्ता स्तर पर भी यह निम्न कोटि की रहेगी। यदि हिंदी का विकास होगा तो वह किसी अन्य देश में होगा जहां संस्कृत की भी रक्षा होगी। यह विश्व की श्रेष्ठ भाषिक अभिव्यक्तियां हैं जो मनुष्य के भाव को बदलने में सक्षम हैं।

Santlal Karun के द्वारा
September 9, 2012

“ हे मेरे देश ! काटकर तुम्हारी ज़बान प्रतिष्ठित कर दी गई है राजमन्दिर में राजपुजारी ज़बरदस्ती पूजा में तुले हैं जबकि राजभवन के पिछवाड़े से लपलपाती एक दूसरी ज़बान तेल लगाकर छोड़ दी गई है समूचे राजनगर को चाटने केलिए             ऐसा करके तुम्हें अंतर-राष्ट्रीय ऊँचाई दी जा रही है             वे कहते हैं |”                      – संतलाल करुण                       “अतलस्पर्श” में संगृहीत ‘खुला अपहार’ से

Santlal Karun के द्वारा
September 8, 2012

यह क्या हो गया है ! यह हमारी ज़बान को क्या हो गया है कि इस पर से सजी-सँवरी धूप का विश्वाश उठ रहा है इससे सोंधी मिट्टी की आशा टूट रही है इस पर नक्षत्र चढ़ते कदम भरोसा नहीं करते इससे नई निगाहों को आगे राह नहीं दिखती | यह हमारी ज़बान को क्या हो गया है कि इसके रहते एक सफ़ेद मुँहचढ़ी ज़बान देश की अलिजिह्वा तक का रंग सफ़ेद डाइ की तरह बदल रही है वह शब्दों के तैलीय तरण-ताल में नहाकर गाँवों तक आधुनिकता की कुलाँचें मार रही है जगह-जगह भूमण्डलीकरण के कैम्प लगाकर सब की नसों में कोकीन डाल रही है और एक अरब लोगों की चेतना कोम्-आ में पहुँचाकर उसके खून-पसीने की सारी रंगत दुह रही है | यह हमारी ज़बान को क्या हो गया है कि इसके ऊपर एक तेज़ी से फैलनेवाली बहुत महीन असाध्य, परजीवी पर्त उग आई है जो दिनोंदिन और ढीठ होती जा रही है | सिर पर मंडरा रही है आँखों में धूल झोंक रही है कानों में कौड़ी डाल रही है होंठों पर थिरक रही है छाती पर मूँग दल रही है जो हाथों को धोखे से बाँध रही है पैरों पर कुल्हाड़ी चला रही है और जो विषकन्या की तरह हमारे देश के साथ अपघात कर रही है | यह हमारी ज़बान को क्या हो गया है कि केवल पन्द्रह वर्षों का झाँसा देनेवाली जैसे अब घर-बैठा बैठने पर तुल गयी है वह आज भी हमारी जीभ पर षड्यन्त्र का कच्चा जमींकंद पीस रही है हमारी सारी सोच-समझ हलक के गर्त में ढकेल खुद बाहर बेलगाम हो रही है जो हमारे मन की नहीं कहती हमारे मुख को नहीं खोलती हमारे चेहरे की नहीं लगती और जो आकाशबेल की तरह हमारे देश के मानसवृक्ष पर फैलती जा रही है | यह हमारी ज़बान को क्या हो गया है कि इसे सभी राजनगर हर साल एक बार अपनी कमर झुकाकर प्रणाम करते हैं स्तुति का आयोजन करते हैं गले में वचन-मालाएँ लाद देते हैं कुछ दिनों के तर्पण से कितना तृप्त करते हैं फिर पूरे साल यह पिछलग्गू बनी दौड़ी फिरती है राजमहिषी का पद छोड़ चाकरी करती है और जो दूसरी सिरचढ़ी है, जिसकी तूती बोलती है देश की बोलती बंद करने का दहशत फैलाती है | यह हमारी ज़बान को क्या हो गया है जो रूपवान-गुणवती भिखारिन की तरह गली–कूचे में धक्के खा रही है हर कहीं बे-आबरू हो रही है हर मोड़ पर आँसू बहा रही है जिसे देख पालतू कुत्ते भौंकते हैं आवारा दौड़ा-दौड़ाकर नोचते हैं आखिर, यह सब क्या हो गया है यह हमारी ज़बान को क्या हो गया है | – “अतलस्पर्श”, संतलाल करुण

Santlal Karun के द्वारा
September 8, 2012

यह क्या हो गया है ! यह हमारी ज़बान को क्या हो गया है कि इस पर से सजी-सँवरी धूप का विश्वाश उठ रहा है इससे सोंधी मिट्टी की आशा टूट रही है इस पर नक्षत्र चढ़ते कदम भरोसा नहीं करते इससे नई निगाहों को आगे राह नहीं दिखती | यह हमारी ज़बान को क्या हो गया है कि इसके रहते एक सफ़ेद मुँहचढ़ी ज़बान देश की अलिजिह्वा तक का रंग सफ़ेद डाइ की तरह बदल रही है वह शब्दों के तैलीय तरण-ताल में नहाकर गाँवों तक आधुनिकता की कुलाँचें मार रही है जगह-जगह भूमण्डलीकरण के कैम्प लगाकर सब की नसों में कोकीन डाल रही है और एक अरब लोगों की चेतना कोम्-आ में पहुँचाकर उसके खून-पसीने की सारी रंगत दुह रही है | यह हमारी ज़बान को क्या हो गया है कि इसके ऊपर एक तेज़ी से फैलनेवाली बहुत महीन असाध्य, परजीवी पर्त उग आई है जो दिनोंदिन और ढीठ होती जा रही है | सिर पर मंडरा रही है आँखों में धूल झोंक रही है कानों में कौड़ी डाल रही है होंठों पर थिरक रही है छाती पर मूँग दल रही है जो हाथों को धोखे से बाँध रही है पैरों पर कुल्हाड़ी चला रही है और जो विषकन्या की तरह हमारे देश के साथ अपघात कर रही है | यह हमारी ज़बान को क्या हो गया है कि केवल पन्द्रह वर्षों का झाँसा देनेवाली जैसे अब घर-बैठा बैठने पर तुल गयी है वह आज भी हमारी जीभ पर षड्यन्त्र का कच्चा जमींकंद पीस रही है हमारी सारी सोच-समझ हलक के गर्त में ढकेल खुद बाहर बेलगाम हो रही है जो हमारे मन की नहीं कहती हमारे मुख को नहीं खोलती हमारे चेहरे की नहीं लगती और जो आकाशबेल की तरह हमारे देश के मानसवृक्ष पर फैलती जा रही है | यह हमारी ज़बान को क्या हो गया है कि इसे सभी राजनगर हर साल एक बार अपनी कमर झुकाकर प्रणाम करते हैं स्तुति का आयोजन करते हैं गले में वचन-मालाएँ लाद देते हैं कुछ दिनों के तर्पण से कितना तृप्त करते हैं फिर पूरे साल यह पिछलग्गू बनी दौड़ी फिरती है राजमहिषी का पद छोड़ चाकरी करती है और जो दूसरी सिरचढ़ी है, जिसकी तूती बोलती है देश की बोलती बंद करने का दहशत फैलाती है | यह हमारी ज़बान को क्या हो गया है जो रूपवान-गुणवती भिखारिन की तरह गली–कूचे में धक्के खा रही है हर कहीं बे-आबरू हो रही है हर मोड़ पर आँसू बहा रही है जिसे देख पालतू कुत्ते भौंकते हैं आवारा दौड़ा-दौड़ाकर नोचते हैं आखिर, यह सब क्या हो गया है यह हमारी ज़बान को क्या हो गया है | – “अतलस्पर्श”, संतलाल करुण

R C Nigam के द्वारा
September 7, 2012

Fact is not the language HINDI but the sentimental attachment with it. Hindi can not get its due place unless we inculcate a strong bond with HINDU; and Hindi both.When thousands of Hindu girls are tortured,raped and converted to Islam, there is not a ripple in the society. Even Jagran publishes the news in a remote corner,then how Hindi can get due recognition. It appears, Your theme is for increasing TRP only. Shame for all Hindus, who boast of JAUHAR by Rajput ladies and never think of as to how can its repetition be stopped.

omprakash prajapati के द्वारा
September 7, 2012

हम भारतीय संस्कृति व् सभ्यता में विश्वास करते हैं परन्तू दिल्ही के पब्लिक स्कूलों, माध्यमिक स्कूलों में केवल हिंदी व् संस्कृत भारतीय भाषाए ही नहीं समाप्त नहीं हो रही, बल्कि बच्चो को अपनी संस्कृति का ज्ञान भी नहीं हो पा रहा है. राष्ट्र भाषाओ में हिंदी उन संस्कृतिक मूल्यों की प्रवाहिका है जो देश के व्यक्ति , परिवार, समाज और राष्ट्र को मजबूत बनाती है साथ ही ज्ञान और विज्ञानं से परिचित कराती है! उत्कृष्ट साहित्य, रामायण, महाभारत, नीति शास्त्रों को आधार बनाकर हिंदी में अनेक ग्रन्थ लिखे गए है, बावजूद इसके मात्र हिंदी दिवस पर ही, हिंदी के बारे में बातचीत की जाती है उसके बाद सभी अपनी राष्ट्रभाषा हिंदी को भूल जाते है! ओमप्रकाश प्रजापति इ-४/३२३ नन्द नगरी दिल्ली-९३ मो 09910749424

Rajeeva Ranjan के द्वारा
September 7, 2012

Actually this is a problem created by the so called modern generation who feel proud in speaking English in place of Hindi.It should be promoted by all level including government officials.We must feel proud on our national language Hindi and use it maximum in daily life.

    shivani के द्वारा
    August 30, 2016

    तो आप हिंदी क्यों नहीं बोल रहे है

rajhans के द्वारा
September 6, 2012

मातृभाषा, राष्ट्रभाषा, संपर्कभाषा और व्यावसाईक भाषा में जो अंतर है, उसकी समझ में ही हिंदी की शक्ति और स्वीकार्यता बसती है|


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