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शिक्षक दिवस(5 सितंबर) – गुरु के प्रति व्यक्त करें अपनी भावनाएं

Posted On: 24 Aug, 2012 Others में

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प्रिय पाठकों,

गुरु गोविन्द दोउ खड़े काके लागु पांव, बलिहारी गुरु आपने गोविन्द दियो बताय। कबीर दास द्वारा लिखी गई यह पंक्तियां जीवन में गुरु के महत्व को वर्णित करने के लिए काफी हैं। जीवन में माता-पिता का स्थान कभी कोई नहीं ले सकता क्योंकि वे ही हमें इस रंगीन खूबसूरत दुनिया में लाते हैं। उनका ऋण हम किसी भी रूप में उतार नहीं सकते लेकिन जिस समाज में हमें रहना है, उसके योग्य हमें केवल शिक्षक ही बनाते हैं। यद्यपि परिवार को बच्चे के प्रारंभिक विद्यालय का दर्जा दिया जाता है लेकिन जीने का असली सलीका उसे शिक्षक ही सिखाता है। समाज के शिल्पकार कहे जाने वाले शिक्षकों का महत्व यहीं समाप्त नहीं होता क्योंकि वह ना सिर्फ आपको सही मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करते हैं बल्कि आपके सफल जीवन की नींव भी उन्हीं के हाथों द्वारा रखी जाती है।


इसीलिए गुरु की महत्ता को समझते हुए हर वर्ष भारत में पूर्व राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिवस यानि 5 सितंबर को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है।


कच्चे घड़े की भांति स्कूल में पढ़ने वाले विद्यार्थियों को जिस रूप में ढालो, वे ढल जाते हैं। वे स्कूल में जो सीखते हैं या जैसा उन्हें सिखाया जाता है वे वैसा ही व्यवहार करते हैं। उनकी मानसिकता भी कुछ वैसी ही बन जाती है जैसा वह अपने आसपास होता देखते हैं। सफल जीवन के लिए शिक्षा बहुत उपयोगी है जो हमें गुरु द्वारा प्रदान की जाती है। गुरु का संबंध केवल शिक्षा से ही नहीं होता बल्कि वह तो हर मोड़ पर आपका हाथ थामने के लिए तैयार रहता है। आपको सही सुझाव देता है और जीवन में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता है।


गुरु-शिष्य परंपरा भारत की संस्कृति का एक अहम और पवित्र हिस्सा है, जिसके कई स्वर्णिम उदाहरण हमारे इतिहास में दर्ज हैं। लेकिन वर्तमान समय में कई ऐसे लोग भी हैं जो अपने अनैतिक कारनामों और लालची स्वभाव के कारण इस परंपरा पर गहरा आघात कर रहे हैं। ‘शिक्षा’ जिसे अब एक व्यापार समझकर बेचा जाने लगा है, किसी भी बच्चे का एक मौलिक अधिकार है लेकिन अपने लालच को शांत करने के लिए आज तमाम शिक्षक अपने ज्ञान की बोली लगाने लगे हैं। इतना ही नहीं वर्तमान हालात तो इससे भी बदतर हो गए हैं क्योंकि शिक्षा की आड़ में कई शिक्षक अपने छात्रों का शारीरिक और मानसिक शोषण करने को अपना अधिकार ही मान बैठे हैं।


किंतु हम बात कर रहे हैं ऐसे गुरुओं की जिन्होंने हमेशा समाज के सामने एक अनुकरणीय उदाहरण पेश किया। प्राय: सख्त और अक्खड़ स्वभाव वाले यह शिक्षक अंदर से बेहद कोमल और उदार होते हैं। हो सकता है आपके जीवन में भी कभी ना कभी एक ऐसा गुरु या शिक्षक का आगमन हुआ हो जिसने आपके जीवन की दिशा बदल दी या फिर आपको जीवन जीने का सही ढंग सिखाया हो।


जागरण जंक्शन मंच आपको अपने ‘गुरु’ से जुड़ी इन्हीं खट्टी-मीठी यादों को अन्य पाठकों के साथ बांटने का एक सुनहरा अवसर प्रदान कर रहा है। आप अपना एक ब्लॉग लिखकर अपने अनुभवों को शब्दों में बयां कर सकते हैं। आप चाहे तो अपने किसी दोस्त या परिचित के अनुभव भी लिख सकते हैं।


नोट: अपना ब्लॉग लिखते समय इतना अवश्य ध्यान रखें कि आपके शब्द और विचार अभद्र, अश्लील और अशोभनीय ना हों तथा किसी की भावनाओं को चोट ना पहुंचाते हों।


धन्यवाद

जागरण जंक्शन परिवार



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14 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

gabbr के द्वारा
September 4, 2016

बेरोजगार है

rajesh mohan upreti के द्वारा
September 16, 2014

दैनिक जागरण ब्लोगर्स के लेख संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित करते हैं यह प्रयास बहुत ही सराहनीय और प्रेरणाप्रद है,

NITIN KUMAR के द्वारा
September 11, 2014

गुरु को शत-शत नमन

kavita rawat के द्वारा
September 5, 2012

बहुत बढ़िया सामयिक प्रस्तुति शिक्षक दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ!

snsharmaji के द्वारा
September 2, 2012

जब ये मापदण्ड स्थापित किए गए थे उस समय गुरू गरीब अमीर को बिना भेदभाव  के शिक्षा देते थे आज हालात बदल हुए है  पैसा प्रधान है  व्यापारिक दृष्टी कोण है इसलिए वह आदर नही मिल सकता 

kajal के द्वारा
August 31, 2012

आज के बदलते परिवेश में जहाँ हर कुछ बदल गया है. हमारी परम्पराएँ बदली हैं ,सोच बदल गए हैं. शिक्षा जिस पर हर बच्चे का अधिकार है और शिक्षक जिसे भगवान से भी बढ़कर माना जाता है, परन्तु न तो आज के शिक्षकों में वह बात रही न ही आज के छात्र ही वैसे रहे, आज शिक्षक को न ही वह आदर प्राप्त है जैसा पहले के शिक्षकों को प्राप्त था इसका कारन भी है कि धीरे -धीरे गुरु शिष्य परंपरा खत्म होने की कगार पर है, आज शिक्षा का बाजारीकरण और शिक्षा केवल धन कमाने का जरिया बनकर रह गया है, शिक्षक जिस पर आने वाले भविष्य को सँवारने की जिम्मेवारी होती है, वह पैसों के लालच में अपनी जिम्मेवारी को भूल बैठा है ,शिक्षक जो देश का समाज का निर्माता होता है, जो चाह ले तो चंद्रगुप्त जैसे शिष्य को विश्वविजयी बना सकता है और नन्द वंश का नाश कर सकता है, हाँ परन्तु शिक्षक भी चाणक्य जैसा होना चाहिए, परन्तु आज के आर्थिक युग में न कोई शिक्षक चाणक्य बन सकता है और न ही चंद्रगुप्त जैसा शिष्य गढ़ सकता है. दुःख होता है जानकर कि शिक्षक जो भविष्य का निर्माता है , उसके द्वारा मानसिक शारीरिक शोषण को अंजाम दिया जाता है, हमारा नैतिक स्तर कितना गिर चूका है जो मानवता के लिए अभिशाप है.

Ajay Singh के द्वारा
August 30, 2012

( शिक्षक दिवस के अवसर पर गुरू की बात कहां आ गयी) जी हाँ, गुरू भगवान के समकक्ष आदर्णीय हैं और होने भी चाहिये। किन्तु आज के समय गुरू भगवान के समान ही आदृश्य हो गये हैं। गुरु दर्शन तो दें कि हम लोग उनकी आरती उतार सकें। अपने पूरे विद्यार्थी जीवन में शिक्षकों से तो साक्षात्कार हुआ किन्तु गुरू के दर्शन न हो सके। कदाचित मै ही आभागा था। शिक्षण कार्य करने वाले कर्मचारियों और गुरूओं के बीच स्पष्ट भेद करना होगा तभी गुरू शब्द की गरिमा सुरक्षित रहेगी। ट्यूशन के लिये विवश करने के लिये विद्यालय में ठीक से कक्षा में पढ़ाया जाना तो एक पाप है और कोई अपने ही विद्यालय के अध्यापक के यहां ट्यूशन न करके यदि कहीं और से पढ़ कर परीक्षा देता है तो उसे गृह परीक्षा में ही फेल कर दिया जाता है,उसका जीवन तबाह कर दिया जाता है ये पाप तो हत्या से कम नहीं है। शिक्षक हों या जन साधारण ,आप किसी को किसी का पैर छूने का प्रशिक्षण तो दे सकते हैं किन्तु आदरभाव स्वयं उनके क्रियाकलापों पर ही निर्भर होता है। आज शिक्षकों को यथोचित सम्मान नहीं मिलने का कारण स्वयं कुछ शिक्षक ही हैं। क्षमा करें, मेरा अनुभव बहुत बुरा है। रोते हुए बच्चे किसी के हृदय को द्रवित कर देते हैं,किन्तु कुछ कसाई इन बच्चों को रूलानें में संकोच नहीं करते। कुछ बच्चे आत्महत्या तक कर लेते हैं और कुछ जीवन भर के लिये अवसादग्रस्त। क्षमा करें जिन्हे मेरी बातें बुरी लगी हो किन्तु मेरा अनुभव एक या दो शिक्षकों के साथ का नहीं है या मात्र एक शहर या एक विद्यालय का भी नहीं।मैने कहा ना शायद मै ही अभागा था। मां का दुलार और पिता द्वारा पूर्व में ही मेरे भीतर भरे गये साहस ने ही मुझे सम्बल दिया और जीवित रखा वर्ना यारों ने तो कोई कसर न छोड़ी थी।

सुधीर अवस्थी 'परदेशी' के द्वारा
August 30, 2012

गुरू शब्‍द इतना व्‍यापक है, जिसकी व्‍याख्‍या करना इतना आसान नहीं, भाई मेरा तो अनुभव यह है कि उनका सम्‍मान करना चाहिए उनके बताए मार्ग पर चलना चाहिए, उनकी कमियों को नजरंदाजकर उनकी अच्‍छाइयों को देखना चाहिए, हर किसी में कोई न कोई अच्‍छाई होती है तो अपने आपको चाहिए कि उसकी अच्‍छाई लेनी चाहिए, हम अपने ब्‍लाग ग्रामीण पञकार पर इस विषय पर जरूर कुछ लिखने का प्रयास करगें,

VIVEK MISHRA के द्वारा
August 29, 2012

अब केवल पुस्तकों में ही गुरु की महिमा और बखान अछे लगते है………………… आज का स्टुडेंट अपने आप को गुरु से सबसे उचा मानता है,,……..गुरु का ज्ञान उसके लिए कोरे कागज़ के समान है…….. आज का स्टुडेंट कल के गुजरे हुए स्टुडेंट से अपनी तुलना कल ले स्टुडेंट से नहीं कर सकता …. पुराने समय के स्टुडेंट गुरुओं का सम्मान करते थे आदर करते थे गुरु की की कही हुई हर बात को पत्थर की लकीर समझते थे गुरुओं से नजर से नजर मिलाने की हिम्मत न पड़ती थी.. और गुजरे हुए jmane के माता – पिता भी गुरुओं का सम्मान करते थे……… आज का समय बहुत बदल गया है….आज का समय ऐसा है की आज गुरु के ज्ञान को स्टुडेंट अपने ज्ञान के आगे कुछ भी नहीं समझते……आज गुरुओं पर स्टुडेंट्स और उनके माता – पिता का अधिकार हो गया गुरुओं का कोई भी सम्मान नहीं रह गया……..बस आज कल गुरुओं का सम्मान और महिमा किताबों में केवल होती है………. आज के स्टुडेंट्स और माता – पिता गुरुओं को नौकर समझते है…………..जहा गुरु का सम्मान नहीं वह ज्ञान कहा…………. कहा जाता है की बिना गुरु के ज्ञान न मिली है …………ये बात १०००% सही है…………इसे कोई मिथ्या साबित कर ही नहीं सकता………..आज के स्टुडेंट गुरुओं का अनादर करने में जरा भी नहीं डरते ………यहाँ तक की मारने को भी तैयार हो जाते है….. मैंने कई बार अक्सर ऐसा होते देखा है………….. अब ज्यादा क्या कहूँ bus इतना कहूँगा……… गुरु के बिना कभी ज्ञान नहीं मिल सकता. हमारे पुरानो और वेदों में भी गुरु को इश्वर से भी ऊँचा स्थान दिया गया है. माता – पिता केवल जन्म देते है लेकिन गुरु भविष्य का संचालक और मार्गदर्शक और पथ प्रदर्शक होता है. वह शिष्य को समाज में रहने के लिए शिक्षित करता है…. गुरु सभी चीजों का ज्ञान कराता……. गुरु ज्ञान के माध्यम से ही शिष्य को भवसागर पर कराता है…………….. बस इतना ही.ज्यादा क्या कहू………….

RAMESH CHANDRA के द्वारा
August 29, 2012

आज शिछ्क दिवस पर हम सभी शिछ्कों का अभिनन्दन करतें हैं. मेरा उनको शत शत प्रणाम . हम पूरी जिंदगी अपने गुरु के ऋणी रहेंगे .

pitamberthakwani के द्वारा
August 25, 2012

सम्पादक महोदय से माफी मंगाते हुए की उन्होंने अभद्र शब्द के प्रयोग की मनाही के बावजूद भीमैने “गुरु घंटाल” शब्द का प्रयोग कर दिया है इस आशय के लिए और शब्द मेरे कोष में नहीं मिला ,इसलिए विवशता थी

pitamberthakwani के द्वारा
August 25, 2012

आप के द्वारा की गयी गुरु की व्याख्या पुराणी है अब समय बदल गया है,गुरु,”गुरु घंटाल” हो गया है,बिना स्वार्थ के कुछ भी नहीं करहा है, पैसे लेकर ट्यूशन के लिए दबाव बनाकर वह पुराने समय वाली गुरु की पदवी चाहता है तो यह संभव कैसे होगा ? वह लड़कीयों को भगाने की ही फ्राक में रहता है जब ज़माना यह आ गया है तब मैं नहीं समझता की गुरु महिमा को गया जाये!अब न तो इसकी जरूरत है और न ही शिक्षक दिवस मनाने की आवश्यकता है!

    अमित वर्मा के द्वारा
    August 30, 2012

    मैं आपसे पूरी तरह सहमत हूँ !!!


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