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Jagran Junction Blog

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JJ Blog


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परिणाम – सशक्त नारी को नमन

Posted On: 10 Mar, 2014  
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जनरल डब्बा सोशल इश्यू में

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Valentine Week Result – जिंदगी का दूसरा नाम हो तुम

Posted On: 14 Feb, 2014  
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जनरल डब्बा में

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कैसे करें लिंक पेस्ट

Posted On: 5 Feb, 2014  
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टेक्नोलोजी टी टी में

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तिमिर पर कभी तो मिलेगा किनारा

Posted On: 23 Jan, 2014  
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जनरल डब्बा सोशल इश्यू में

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इनका संकल्प बनेगा विकल्प

Posted On: 2 Jan, 2014  
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जनरल डब्बा में

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अटल संकल्प ब्लॉग आमंत्रण

Posted On: 26 Dec, 2013  
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जनरल डब्बा में

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श्रेष्ठता का चुनाव आपके हाथ

Posted On: 26 Oct, 2013  
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जनरल डब्बा में

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राष्ट्र निर्माण में महिलाओं का योगदान . जब भारतीय ऋषियों ने अथर्ववेद में ‘माता भूमिः पुत्रो अहं पृथिव्याः’ (अर्थात भूमि मेरी माता है और हम इस धरा के पुत्र हैं।) की प्रतिष्ठा की तभी सम्पूर्ण विश्व में नारी-महिमा का उद्घोष हो गया था। नेपोलियन बोनापार्ट ने नारी की महत्ता को बताते हुए कहा था कि -‘‘ मुझे एक योग्य माता दे दो, मैं तुमको एक योग्य राष्ट्र दूँगा।’’ भारतीय जन-जीवन की मूल धुरी नारी (माता) है। यदि यह कहा जाय कि संस्कृति, परम्परा या धरोहर नारी के कारण ही पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तान्तरित होती रही है, तो यह अतिशयोक्ति नहीं होगी। जब-जब समाज में जड़ता आयी है नारी शक्ति ने ही उसे जगाने के लिए, उससे जूझने के लिए अपनी सन्तति को तैयार करके, आगे बढ़ने का संकल्प दिया है। कौन भूल सकता है माता जीजाबाई को, जिसकी शिक्षा-दीक्षा ने शिवाजी को महान देशभक्त और कुशल योद्धा बनाया। कौन भूल सकता है पन्ना धाय के बलिदान को पन्नाधाय का उत्कृष्ट त्याग एवं आदर्श इतिहास के स्वर्ण अक्षरों में अंकित है। वह उच्च कोटि की कत्र्तव्य परायणता थी। अपने बच्चे का बलिदान देकर राजकुमार का जीवन बचाना सामान्य कार्य नहीं। हाड़ी रानी के त्याग एवं बलिदान की कहानी तो भारत के घर-घर में गायी जाती है। रानी लक्ष्मीबाई, रजिया सुल्ताना, पद्मिनी और मीरा के शौर्य एवं जौहर एवं भक्ति ने मध्यकाल की विकट परिस्थितियों में भी अपनी सुकीर्ति का झण्डा फहराया। कैसे कोई स्मरण न करे उस विद्यावती का जिसका पुत्र फाँसी के तख्ते पर खड़ा था और माँ की आँखों में आँसू देखकर पत्रकारों ने पूछा कि एक शहीद की माँ होकर आप रो रही हैं तो विद्यावती का उत्तर था कि ‘‘ मैं अपने पुत्र की शहीदी पर नहीं रो रही, कदाचित् अपनी कोख पर रो रही हूँ कि काश मेरी कोख ने एक और भगत सिंह पैदा किया होता, तो मैं उसे भी देश की स्वतंत्रता के लिए समर्पित कर देती।’’ ऐसा था भारतीय माताओं का आदर्श। ऐसी थी उनकी राष्ट्र के प्रति निष्ठा। परिवार के केन्द्र में नारी है। परिवार के सारे घटक उसी के चतुर्दिक घूमते हैं, वहीं पोषण पाते हैं और विश्राम। वही सबको एक माला में पिरोये रखने का प्रयास करती है। किसी भी समाज का स्वरूप वहाँ की नारी की स्थिति पर निर्भर करता है। यदि उसकी स्थिति सुदृढ़ एवं सम्मानजनक है तो समाज भी सुदृढ़ एवं मजबूत होगा। भारतीय महिला सृष्टि के आरंभ से अनन्त गुणों की आगार रही है। पृथ्वी की सी सहनशीलता, सूर्य जैसा तेज, समुद्र की गम्भीरता, पुष्पों जैसा मोहक सौन्दर्य, कोमलता और चन्द्रमा जैसी शीतलता महिला में विद्यमान है। वह दया, करूणा, ममता, सहिष्णुता और प्रेम की पवित्र मूर्ति है। नारी का त्याग और बलिदान भारतीय संस्कृति की अमूल्य निधि है। बाल्यावस्था से लेकर मृत्युपर्यन्त वह हमारी संरक्षिका बनी रहती है । सीता, सावित्री, गार्गी, मैत्रेयी जैसी महान् नारियों ने इस देश को अलंकृत किया है। निश्चित ही महिला इस सृष्टि की सबसे सुन्दर कृति तो है ही, साथ ही एक समर्थ अस्तित्व भी है। वह जननी है, अतः मातृत्व महिमा से मंडित है। वह सहचरी है, इसलिए अद्र्धांगिनी के सौभाग्य से शृंगारित है। वह गृहस्वामिनी है, इसलिए अन्नपूर्णा के ऐश्वर्य से अलंकृत है। वह शिशु की प्रथम शिक्षिका है, इसलिए गुरु की गरिमा से गौरवान्वित है। महिला घर, समाज और राष्ट्र का आदर्श है। कोई पुण्य कार्य, यज्ञ, अनुष्ठान, निर्माण आदि महिला के बिना पूर्ण नहीं होता है। सशक्त महिला सशक्त समाज की आधारशिला है। महिला सृष्टि का उत्सव, मानव की जननी, बालक की पहली गुरु तथा पुरूष की प्रेरणा है। यदि महिला को श्रद्धा की भावना अर्पित की जाए तो वह विश्व के कण-कण को स्वर्गिक भावनाओं से ओतप्रोत कर सकती है। महिला एक सनातन शक्ति है। वह आदिकाल से उन सामाजिक दायित्वों को अपने कन्धों पर उठाए आ रही है, जिन्हंे अगर पुरुषों के कन्धे पर डाल दिया गया होता, तो वह कब का लड़खड़ा गया होता। पुरातन कालीन भारत में महिलाओं को उच्च स्थान प्राप्त था। पुरूषों के समान ही उन्हें सामाजिक, राजनैतिक एवं धार्मिक कृत्यों में भाग लेने का अधिकार था। वे रणक्षेत्र में भी पति को सहयोग देती थी। देवासुर संग्राम में कैकेयी ने अपने अद्वितीय रणकौशल से महाराज दशरथ को चकित कर दिया था। याज्ञवल्क्य की सहधर्मिणी गार्गी ने आध्यात्मिक धन के समक्ष सांसारिक धन तुच्छ है, सिद्ध करके समाज में अपना आदरणीय स्थान प्राप्त किया था। विद्योत्तमा की भूमिका सराहनीय है, जिसने कालिदास को संस्कृत का प्रकाण्ड पंडित बनाने में सफलता प्राप्त की। तुलसीदास जी के जीवन को आध्यात्मिक चेतना देने में उनकी पत्नी का ही बुद्धि चातुर्य था। मिथिला के महापंडित मंडनमिश्र की धर्मपत्नी विदुषी भारती ने शंकराचार्य जैसे महाज्ञानी व्यक्तित्व को भी शास्त्रार्थ में पराजित किया था। लेकिन चूँकि भारत के अस्सी प्रतिशत से अधिक तथाकथित विद्वान गौतमबुद्धोत्तरकालीन भारत को ही जानते पहचानते हैं और उनमें भी प्रतिष्ठा की धुरी पर बैठे लोग, पाश्चात्य विद्वानों द्वारा अंग्रेजी में लिखे गं्रथों से ही, भारत का अनुभव एवं मूल्यांकन करते हैं, अतः नारी विषयक आर्ष-अवधारणा तक वे पहुँच ही नहीं पाते। उन्हें केवल वह नारी दिखाई पड़ती है जिसे देवदासी बनने को बाध्य किया जाता था, जो नगरवधू बनती थी अथवा विषकन्या के रूप में प्रयुक्त की जाती थी। महिमामयी नारी के इन संकीर्ण रूपों से इंकार तो नहीं किया जा सकता। परंतु हमें यह समझना चाहिए कि वे नारी के संकटकालीन रूप थे, शाश्वत नहीं । हमें यह भी स्वीकार करना चाहिए कि रोमन साम्राज्य (इसाई जगत, इस्लाम जगत) तथा अन्यान्य प्राचीन संस्कृतियों में नारी की जो अवमानना, दुर्दशा एवं लांछना हुई है- जिसके प्रामाणिक दस्तावेज उपलब्ध हैं, वैसा भारतवर्ष मंे कम से कम, मालवेश्वर भोजदेव के शासन काल तक कभी नहीं हुआ। इस्लामिक आक्रमणों के अनन्तर भारत का सारा परिदृश्य ही बदल गया। मलिक काफूर, अलाउद्दीन तथा औरंगजेब-सरीखे आततायियों ने तो मनुष्यता की परिभाषा को ही झुठला दिया। सल्तनत-काल के इसी नैतिकता-विहीन वातावरण में नारियों के साथ भी अपरिमित अत्याचार हुए। उसके पास विजेता की भोग्या बन जाने अथवा आत्मघात कर लेने के अतिरिक्त और उपाय ही क्या था? फलतः असहाय नारियाँ आक्रांताओं की भोग्या बनती रही। लेकिन यह ध्यान रहे कि यह भारत की पराधीनता के काल थे, स्वाधीनता के नहीं। अब हम स्वतंत्रता आंदोलन के कालखंड को देखें तो हम देखते हैं कि भारत के स्वतंत्रता-संग्राम में महिलाओं ने जितनी बड़ी संख्या में भाग लिया, उससे सिद्ध होता है कि समय आने पर महिलाएँ प्रेम की पुकार को विद्रोह की हुंकार में तब्दील कर राष्ट्रीय अखण्डता को अक्षुण्ण बनाने में अपना सर्वस्व समर्पित कर सकती हैं। रानी लक्ष्मीबाई, सरोजनी नायडू, मादाम भिखाजी कामा, अरुणा आसफ अली, एनी-बेसेन्ट, भगिनी निवेदिता, सुचेता कृपलानी, कैप्टन लक्ष्मी सहगल, दुर्गा भाभी एवं क्रांतिकारियों को सहयोग देने वाली अनेक महिलाएँ भारत में अवतरित हुईं, जिन्होंने राष्ट्र निर्माण के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया। इतिहास साक्षी है जब-जब समाज या राष्ट्र ने नारी को अवसर तथा अधिकार दिया है, तब-तब नारी ने विश्व के समक्ष श्रेष्ठ उदाहरण ही प्रस्तुत किया है। मैत्रेयी, गार्गी, विश्ववारा, घोषा, अपाला, विदुषी भारती आदि विदुषी स्त्रियाँ शिक्षा के क्षेत्र में अपने बहुमूल्य योगदान के लिए आज भी पूजनीय हैं। आधुनिक काल में महादेवी वर्मा, सुभद्रा कुमारी चैहान, महाश्वेता देवी, अमृता प्रीतम आदि स्त्रियों ने साहित्य तथा राष्ट्र की प्रगति में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। कला के क्षेत्र में लता मंगेश्कर, देविका रानी, वैजयन्ती माला, सोनाल मानसिंह आदि का योगदान वास्तव मे प्रशंसनीय है। वर्तमान में महिलाएँ समाज सेवा, राष्ट्र निर्माण और राष्ट्र-उत्थान के अनेक कार्यों में लगी हैं। महिलाओं ने अपनी कर्तव्य परायणता से यह सिद्ध किया है कि वे किसी भी स्तर पर पुरूषों से कम नहीं हैं। बल्कि उन्होंने तो राष्ट्र निर्माण में अपनी श्रेष्ठता ही प्रदर्शित की है। शारीरिक एवं मानसिक कोमलता के कारण महिलाओं को रक्षा सम्बन्धी सेवाओं के उपयुक्त नहीं माना जाता था, किंतु भारत की पहली महिला ‘आई0पी0एस0’ श्रीमती किरण बेदी ने ही अपनी कर्तव्यनिष्ठा से इस मिथक को पूरी तरह तोड़ दिया। अत्यंत ही हर्ष का विषय है, कि अब महिला जगत का बहुत बड़ा भाग अपनी संवादहीनता, भीरूता एवं संकोचशीलता से मुक्त होकर सुदृढ़ समाज के सृजन में अपनी भागीदारी के लिए प्रस्तुत है। समस्त सामाजिक संदर्भों से जुड़ी महिलाओं की सक्रियता को अब न केवल पुरूष वरन् परिवार, समाज एवं राष्ट्र ने भी सगर्व स्वीकारा है। वर्तमान में नारी शक्ति का फैलाव इतना घनीभूत हो गया है कि कोई भी क्षेत्र इनके सम्पर्क से अछूता नहीं है। आज नारी पुरूषों के समान ही सुशिक्षित, सक्षम एवं सफल है। चाहे वह शिक्षा का क्षेत्र हो, साहित्य, चिकित्सा, सेना, पुलिस, प्रशासन, व्यापार, समाज सुधार, पत्रकारिता, मीडिया एवं कला का क्षेत्र हो, नारी की उपस्थिति, योग्यता एवं उपलब्धियाँ स्वयं अपना प्रत्यक्ष परिचय प्रस्तुत कर रही है। घर परिवार से लेकर अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक उसकी कृति पताका लहरा रही है। दोहरे दायित्वों से लदी महिलाओं ने अपनी दोगुनी शक्ति का प्रदर्शन कर सिद्ध कर दिया है कि समाज की उन्नति आज केवल पुरूषों के कन्धे पर नहीं, अपितु उनके हाथों का सहारा लेकर भी ऊँचाईयों की ओर अग्रसर होती है। उन्नत राष्ट्र की कल्पना तभी यथार्थ का रूप धारण कर सकती है, जब महिला सशक्त होकर राष्ट्र को सशक्त करें। महिला स्वयं सिद्धा है, वह गुणों की सम्पदा हैं। आवश्यकता है इन शक्तियों को महज प्रोत्साहन देने की। यही समय की माँग है। नाम -गुंजेश गौतम झा राजनीति विज्ञान विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी- 221005, उ0 प्र0 सम्पर्क:- 09026028080

के द्वारा:

के द्वारा: DR. SHIKHA KAUSHIK DR. SHIKHA KAUSHIK

कहा खो गया वो वक्त.....13911 कहा खो गया वो वक्त... जब खुषियों की कीमत मा के चेहरे से लग जाती थी आसू उसकी आख से टपकता था औ फफोले औलाद के दिल के फूट पडते थे कहा खो गया वो वक्त... जब जरूरत से ज्यादा मा का लाड अहसास करा जाता था औलाद को कि...कहीं कोर्इ गम है जो वो छिपा रही है प्यार की आड में कहा खो गया....... जब जरूरते एक दूसरे की समझ ली जाती थी खामोष रहकर भी संसकारो और समझ का दूध जब रगों में दौडता था लहू बनकर कहा खो गया वो वक्त..... अब औलाद को मा नजर नही आती नजर आता है बस एक जरिया अपनी ख्वाहिषों को पूरा करने का अपने चेहरे की हसी बनाये रखने का फिर चाहे उसके लिये— मा का चेहरा आसूओं से तर ही क्येां न हो जाये। वक्त इतना कैसे बदल गया...... क्या दूध ने रगो में जाकर खून बनाना छोड दिया क्या ममत्व की परिभाशा में दर्द का समावेष धट गया क्या ख्वाहिषों के कद रिष्तों से उचे हो गये क्या आधुनिकता ने मा के अधिकारों का दायरा धटा दिया। कहा खों गया वो वक्त..... क्यों नही लौट आते वो भटके हुए बच्चे अपनी मा की गोद तक क्येां नहीं संसार को एक बार उसकी नजरो से देखते क्येां जिंदगी को समझते नही वो मा बाप की दी सौगात क्यों इक बार वो उसे पूजते नही भगवान मान कर.... कहा खो गया वो वक्त..... वंदना गोयल,फरीदाबाद।

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कभी थकते नही देखा.............4711 मैंने उसे.... मूह अंधेरे उठ गृहस्थ की चक्की में खुद को रात ढले तक पीसते देखा है। पर......... कभी थकते नहीं देखा थकान चाहे तन की हो या मन की... आचल से पसीने की तरह पौंछ उतार फेेंकती वो..... मुस्कराहटों में छिपा लेती अपना हर दर्द पर....... खुद को कभी थकने नहीं देती चूल्हे की आग हमेषा गर्म ही रखती वो,ये सोच कि कहीं.... भूख से बिलबिलाते बच्चे तडप न उठे ठंडा चूल्हा देख। वो......जानती है कैसे बहलाया जाता है उन दूधमूहे बच्चों को खाली बोतल दे....जबकि खुद के जिस्म में खू दूध न बनाता हों। वो.....मा है ....जो सिर्फ और सिर्फ करना जानती है न रूकना जानती है न थकना जानती है। वंदना गोयल, फरीदाबाद ये सच

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कहा खो गयी औरत......22113 मेरा मुझमें कुछ भी नहीं मैं खुद में कुछ भी नहीं मैं कल भी नहीं थी मैं आज भी नहीं हू मैं कल भी कठपुतली थी मैं आज भी कठपुतली हू कल मा बाबा के इषारे पर नाचती थी आज पति और बच्चों के इषारों पर..... कुछ भी ,कभी भी कोषिष भी नहीं हुर्इ कुछ बदलने की...कुछ सोचने की सब जस का तस है.... परिवर्तन संसार का नियम हेै..सुना था पर देखा नहीं...... विज्ञान ने तरक्की की....चाद पर पहूच गया इंसान पर समाज कहा बदला..... सोच कहा बदली...? औरत .....कल भी औरत थी औरत ....आज भी औरत है दबी हुर्इ,सहमी हुर्इ, सुकचायी सी, लजायी सी। उसकी पंसद कुछ भी नही..... पति की पंसद ...उसकी पंसद बच्चों की हसी...उसकी हसी सास ससुर के षब्द उसका धर्म। उसमें अपना कुछ भी नहीं.... वो जीये तो परिवार के लिये.... वो सोचे तो अपने संसार के लिये... वो हसे...ताकि धर में खुषी रह सके वो रो नहीं सकती..... क्यों...? उसका रोना परिवार में अषांति लाता है उसका रोना...बच्चो को थोडा सा भावुक कर जाता है उसका रोना..पति को कभी कभी सोचने पर मजबूर कर देता है उसका रोना...कहीं न कहीें सवाल पैदा करता है इसलिये... वो रो भी नही सकती वो खुलकर हस भी नहीं सकती...... कि..... उसका जरूरत से ज्यादा खिखिलाना, मुस्क्राना सबके दिलों में भ्रम पैदा करता है ऐसा क्या पा लिया उसने.....कि.....वो.... औरत होके खिखिला रही है हजार गम है उसके पास फिर भी मुस्क्रा रही है वो ऐसी क्यों होती जा रही है। वो सच में कहीं बदल तो नहीं रही... सवालों के ये जाल उसपर हमेषा डलते रहे है। वो चाहे तो भी उससे निकल नहीं सकती वो औरत होने के अर्थ को जानती है वो औरत होने के अर्थ को जी रही है वो पी रही है उस दर्द को जो मिला है उसे, उस जन्म में औरत होने के साथ— पर.... वो धीरे धीरे बदल भी रही है एक हल्की सी करवट... एक हल्की सी चरमराहट....... एक हल्की सी दस्तक..... एक हल्की सी सुगबुगाहट.... डसके अंर्तमन में कहीं हो तो रही है.... वे औरत अब बदल भी रही है... बदल भी रही है...... व्ांदना मोदी गोयल

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का भूले जाते हो - Pasted from एक अहसास -पहले प्यार के नाम -- इक रूमानियत सी जहन पे तारी है ,सपनों की दुनिया में जी रही हूँ मैं  सीने में इक हूक सी उठती है कभी- तो लगता है कि जैसे तेरा खयाल आ गया ; इक उलझन सी है खायालों में ,इक ख़लिश सी जगी है सीने में ; इस उलझन ,इस ख़लिश को नाम दूँ तो क्या -? निगाह तेरी खयालात भी तेरे हैं ---- चाहती हूँ कि न देखूँ तेरी जानिब ,मगर मुश्किल है -- जब भी कुछ सरगोशी सी होती है ,तो लगता है कि तू आ गया  नही होता है जब तू मेरे आसपास ,निगाहों को तलाश रहती है तेरी  और जब होता है मेरे सामने ,निगाहें क्यों झुकी सी जाती हैं -? पलकों में तेरे सपने और दिल को तेरी चाहत है ज़रूर, ज़िंदगी भर हमसफर बन के चलने का खयाल भी है साथ-साथ ; कितना मुश्किल है ;उफ --ये दिल को समझा पाना कि ;सब्र कर -- इस वक़्त तो ;सिर्फ = रूमानियत सी ज़हन पे तारी है और सपनों कि दुनिया में जी रही हूँ मैं ।

के द्वारा: kavita1980 kavita1980

हुआ था प्यार मुझको भी एक तितली से एक बार उसके रंग बिरंगे आयामो से उसके घूमते फिरते रूपो से चाहत थी उसे दिल के गुलदस्ते में सजाने की चाहत थी उसे अपना वैलेंटाइन बनाने की पर तितली को तो उड़ना ही मंजूर था एक डाल से दूसरी डाल पर फूलो से फूलो तक भंवरो के साथ इठलाने को सो हमको छोड़ दिया उसने पतझड़न मे मुरझाने को कुछ कहना था सायद उससे कुछ सुनना था सायद उससे पर वो वहाँ नही थी कहने सुनाने को उड़कर एक डाली से दूसरी पर बैठ गयी वो इतराकर हॅस कर देखा मेरी तरफ एक बार पंखो को फड़फड़ाकर झर रहे थे मोती वंहा पर उसके चारो तरफ इतराकर हाल मेरा था जुदा कुछ इश्क़ में उसके खुद को दफना कर हुआ था प्यार मुझको भी मेरी अंजुमन के आसियंा पर

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          -दो पल-- राह में दो पल साथ तुम्हारे, बीते उनको ढूढ रहा हूँ | पल में सारा जीवन जीकर, फिर वो जीवन ढूंढ रहा हूँ | उन दो पल के साथ ने मेरा, सारा जीवन बदल दिया था | नाम पता कुछ पास नहीं पर, हर पल तुमको ढूंढ रहा हूँ | तेरी चपल सुहानी बातें, मेरे मन की रीति बन गयीं | तेरे सुमधुर स्वर की सरगम, जीवन का संगीत बन गयीं | तुम दो पल जो साथ चल लिए, जीवन की इस कठिन डगर में । मूक साक्षी बनीं जो राहें , उन राहों को ढूंढ रहा हूँ | पल दो पल में जाने कितनी, जीवन-जग की बात होगई | हम तो चुप-चुप ही बैठे थे, बात बात में बात होगई | कैसे पहचानूंगा तुमको, मुलाक़ात यदि कभी होगई | तिरछी चितवन और तेरा, मुस्काता आनन् ढूंढ रहा हूँ | मेरे गीतों को सुनकर, वो तेरा वंदन ढूंढ रहा हूँ | चलते -चलते तेरा वो, प्यारा अभिनन्दन ढूंढ रहा हूँ |                                     ----- डा श्याम गुप्त ..

के द्वारा: drshyamgupta drshyamgupta

पुलकित मन का कोना कोना, दिल की क्यारी पुष्पित है. अधर मौन हैं लेकिन फिर भी प्रेम तुम्हारा मुखरित है. मिलन तुम्हारा सुखद मनोरम लगता मुझे कुदरती है, धड़कन भी तुम पर न्योछावर हरपल मिटती मरती है, गति तुमसे ही है साँसों की, जीवन तुम्हें समर्पित है, अधर मौन हैं लेकिन फिर भी प्रेम तुम्हारा मुखरित है. चहक उठा है सूना आँगन, महक उठी हैं दीवारें, खुशियों की भर भर भेजी हैं, बसंत ऋतु ने उपहारें, बाकी जीवन पूर्णरूप से केवल तुमको अर्पित है, अधर मौन हैं लेकिन फिर भी प्रेम तुम्हारा मुखरित है. मधुरिम प्रातः सुन्दर संध्या और सलोनी रातें हैं, भीतर मन में मिश्री घोलें मीठी मीठी बातें हैं, प्रेम तुम्हारा निर्मल पावन पाकर तनमन हर्षित है, अधर मौन हैं लेकिन फिर भी प्रेम तुम्हारा मुखरित है. (अरुन शर्मा 'अनन्त')

के द्वारा: अरुन शर्मा 'अनन्त' अरुन शर्मा 'अनन्त'

बात उन लम्हों की... जब पहली बार मिली पिया से नज़र उनका अनमोल प्यार मेरे दिल में बसा एक अजब सी कशिश है उनसे नजदीकियों में, छा गया मेरे मन पे उनके प्यार का कहकशां, जैसे ही उन्होंने मेरी तरफ हाथ बढ़ाया लगा कि सागर नदी की लहरों में ही जा बसा। जैसे ही उन्होंने मेरे तन को छुआ मन पर छा गया उनके प्यार का नशा जैसे ही हुआ मेरा आलिंगन मेरे पिया से मदहोश हो गयी पवन और रिमझिम सावन बरसा मेरा और उनका प्रेम हमेशा बना रहे है रब से दुआ कि खुशियों से भरा रहे हमारा संसार ये पवित्र बंधन हमेसा फलता रहे जो है प्यार के मोती में गुथा हुआ सा मैं तो रंगी हूँ आपके प्यार के रंग में और रहूंगी मैं यूं ही आपके साथ सदा।

के द्वारा: Manish Pandey Manish Pandey

के द्वारा: अरुन शर्मा 'अनन्त' अरुन शर्मा 'अनन्त'

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ज्जाने कब कौन जिंदगी का हिस्सा बन जाये..... 'टूटती बिखरती संवरती कुम्हार की माटी सी,? जलती ,पिधलती संवरती मोम की बाती सी खोल पलको के किवाड वो... च्ुापके से आ जाती है वो ख्बाबों में मेरे। कभी सोचा ही नहीं था कि दिल के दरवाजों को खोल कर उन्हें इतनी आजादी दूगी कि वो अपनी भावनाओं को अभिवयक्त कर सके, पर सोचने से ही अगर सब कुछ हो जाता तो जीवन में कुछ भी अंसम्भव नही होता...न चाहते हुए भी वो दिल के जाने कौनसे दरिचों से एक मधुर संगीत की तरह एक ठंडे हवा के झोंके के तरह मेरे मन मस्तिश्क में अपना धर कर गयें। मैं उस प्यार को समझ पाती, जान पाती या उस अहसास को कोर्इ नाम दे पाती इससे पहले ही मैं उसकी गिरफत में थी, जाने क्यों वो कैद अच्छी लग रही थी, मन के किसी कोने से ये आवाज आ रही थी कि काष ये कैद उम्रभर के लिये हो, वो दर्द भी उस वक्त अजीज लग रहा था जिसे मैं महसूस कर रही थी, मेरी निगाहों मे ंएक खुमार था पर पता नही वो कया था, पर देखने वालो ने मुझे बताया वो प्यार था, ववो प्यार था.....अगर वो सच में प्यार था तो मुझे ये अहसास इतना बाद में क्यों हुआ सच! प्यार कब हो जाता है कोर्इ नही जानता लेकिन जब हो जाता है तो खुद के सिवा सारे जमाने को पता चल जाता है। प्यार है ही एक ऐसा एहसास जो तब होता है जब हम खुद में नही होते?काष—प्यार सबके जीवन में होता।

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राइट टू रिजेक्ट ही मतदान की अनिवार्यता का जन-जन को अहसास करायेगा: शास्त्री पीएम उम्मीदवारों के नाम ‘‘सत्यमेव जयते‘‘ का एजेण्डा जारी --------------------------------------------- इटावा, 24 जनवरी। राष्ट्रीय मतदाता दिवस पर हम सभी भारतीयों को संसदीय जनतंत्र को सुदृृढ़ बनाने के लिए अपने मतदान का प्रयोग अवश्यमेव करने का संकल्प लेना होगा। राष्ट्रीय मतदाता दिवस की पूर्व संध्या पर सत्यनिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों की अगुआई वाले संगठन ‘‘सत्यमेव जयते’’ के राष्ट्रीय प्रवक्ता देवेश शास्त्री ने वक्तव्य जारी करते हुए कहा कि मतदान के प्रति उदासीनता स्वाभाविक है, क्योंकि जनसामान्य ‘‘राजनीति के अपराधीकरण और विश्वासघाती कार्यशैली’’ से आहत है, लिहाजा वोट न देकर ही सन्तोष कर लेता है, जबकि लोकतंत्र का आधार मतदान है, वह जीवन की अहम् आवश्यकताओं में भी सर्वोपरि है। ऐसी स्थिति में ईवीएम में विकल्पों को नकारने यानी ‘‘रिजेक्ट’’ का बटन होना आवश्यक है। श्री शास्त्री का मानना है कि राइट टू रिजेक्ट ही मतदान की अनिवार्यता का जन-जन को अहसास करा देगा और राजनैतिक दल भी साफ छवि के उम्मीदवारों को ही चुनाव मैदान में उतारने को विवश होंगे। इसी के साथ राष्ट्रीय मतदाता दिवस की सार्थकता सिद्ध हो जायेगी। श्री शास्त्री ने कहा कि जनतंत्र का अर्थ ही है- ‘‘जनता द्वारा जनता के लिए, जन-व्यवस्था।’’ लिहाजा सूचना प्रोद्योगिकी के इस क्रांति दौर में देशवासी ‘‘भारतवर्ष’’ को ऐसे विकसित गणराज्य के रूप में देखना चाहते हैं, जो दुनिया में ‘‘प्रभुता सम्पन्न यानी विष्वगुरु’’ का दर्जा प्राप्त हो। इसके लिए भारत को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट मिले। देशवासियों को चीन और पाकिस्तान द्वारा कब्जाई गई हमारी जमीन वापस चाहिए। सत्यमेव जयते की ओर से आसन्न लोकसभा चुनाव में विभिन्न राजनैतिक दलों तथा गठबंधनों द्वारा घोषित प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवारों तथा पार्टी अध्यक्षों के नाम भारतवर्ष के लोगों की भावना को व्यक्त करने वाला 25 सूत्रीय एजेंड़ा जारी करते हुए श्री शास्त्री ने कहा कि प्रशासनिक अधिकारियों का जन सामान्य से सीधा सम्पर्क रहता है, लिहाजा जन सामान्य की नब्ज टटोलते हुए ये एजेंडा तैयार किया गया है। देश के प्रत्येक जिले से राज्य की राजधानी को जोड़ने वाली 4/6 लेन सड़कें, तथा प्रत्येक गांव से तहसील-ब्लाक तक जाने के लिए हाट मिक्स सड़कें चाहिए। देश को उच्च गुणवत्ता की सार्वजनिक परिवहन की जरूरत है, जिसमें पर्याप्त सीटें हों, जैसी चीन आदि देषों में हैं तथा डबल ट्रैक, विद्युतीकृत रेल, बुलेट ट्रेन एवं ऐसी हवाई सेवाएं चाहिए, जिसमें साधारण श्रमिक को भी को त्वरित गति से आने जाने की सुविधा हो। उन्होंने भ्रष्टाचार-मुक्त, आतंक-मुक्त और गुंडा-मुक्त राष्ट्र की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि सरकारी सेवा में जन सुविधा को पारदर्शी बनाने हेतु सभी कार्यालयों में सीसीटीवी कैमरों की जरूरत है, ताकि भ्रष्टाचार मिट सके। आॅनलाइन षिकायत करने और निस्तारण की सूचना घर बैठे मिलने और आॅनलाइन एफआईआर करने और सिटीजन चार्टर के अनुरूप निर्धारित समयावधि में मामलों को निपटाने की जरूरत है। इस तरह निर्वाचित जनसेवकों और प्रषासनिक लोकसेवकों के अनावष्यक भ्रमण एवं दौरों के लिए सार्वजनिक धन के अपव्यय को रोका जा सकता है। इसके साथ ही सचल (मोबाइल) तहसील प्रणाली की जरूरत है। सार्वजनिक वितरण प्रणाली से मिलने वाले राशन और ईंधन (कुकिंग गैस) सब्सिडी सीधे बैंक खाते में पहुंचे। श्री शास्त्री ने कहा कि आतंक, गुंडई और आपराधिक वातावरण का मुख्य कारण है ‘‘बेकारी।‘‘ हमने बचपन में पढ़ा था कि जनसंख्या देष पर बोझ है, इस लिहाज से हम सभी बोझ हुए, ऐसा नहीं प्रत्येक व्यक्ति देष के लिए यथा-सामथ्र्य योगदान देने को तत्पर हैं। हमारे मानव संसाधन (मानवीय ऊर्जा) का सदुपयोग हो। समाज के सभी वर्गों के उत्थान की जरूरत है। सभी को अपने ही ब्लाक-जिले में क्षमता के अनुसार गुणवत्ता परक रोजगार की जरूरत है। शिक्षा व्यवस्था सुधारने के लिए सभी गांव व शहर में जो मौजूदा पब्लिक स्कूलों को उच्च तकनीकी सुविधाओं वाले राजकीय विद्यालय मंे परिवर्तित करने किया जाये। स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाते हुए हर 5 किलोमीटर की परिधि में उच्च तकनीक अस्पताल की जरूरत है। कृषि प्रधान देश भारतवर्ष में हर खेत को सिंचाई हेतु पर्याप्त पानी मिले, नहरों व माइनरों का अनावश्यक कटाव रोका जाये। पूरे देश को 24 घंटे बिजली और पीने के पानी के लिए सभी गाँव - मोहल्लों में पानी की टंकी की हो। यदि दृढ़ इच्छाशक्ति का परिचय देते हुए इस एजेंडे को स्वीकार किया जाये तो निश्चित रूप भारतवर्ष प्रभुता सम्पन्न देश हो जायेगा।

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नव वर्ष 2014 की शुभकामनाएं (कुछ संकलित शुभकामना सन्देश) दुआओं की सौगात लिए; दिल की गहराइयों से; चाँद की रौशनी से; फूलों के काग़ज़ पर; आपके लिए सिर्फ तीन लफ्ज़; नया साल मुबारक! आपकी आँखों में सजे हैं जो भी सपने; और दिल में छुपी हैं जो भी अभिलाषाएं; यह नया वर्ष उन्हें सच कर जाए; आपके लिए यही है हमारी शुभकामनाएं! नव वर्ष की शुभकामनाएं! एक दुआ मांगते हैं हम अपने भगवान से; चाहते हैं आपकी ख़ुशी पूरे ईमान से; सब हसरतें पूरी हों आपकी; और आप मुस्कुराएं दिल-ओ-जान से। नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं! दुआ मिले बंदो से, साथ मिले अपनों से; रहमत मिले रब से, प्यार मिले सब से; यही दुआ है मेरी रब से कि, आप खुश रहें सबसे। नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं! ख़ुदा करे कि इस नए साल; जिसे आप चाहते हो वो आपके पास आ जाए; आप सारा साल कंवारे ना रहे; आपका रिश्ता लेकर आपकी सास आ जाए। नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं! नव वर्ष की पावन बेला में है यही शुभ संदेश; हर दिन आए आप के जीवन में लेकर ख़ुशियाँ विशेष। नव वर्ष की शुभकामनाएं! सबको नववर्ष की हार्दिक शुभकामनायें.परमात्मा इस नये वर्ष में आपके जीवन में बहुत सी नई खुशिया लाएं.नया वर्ष ढेर सारी सफलता और आशीषों से भरा हुआ हो. संकलनकर्ता-सद्गुरुजी.

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http://amankumaradvo.jagranjunction.com/?p=६७९१२६ नव वर्ष के लिए कुछ सोचा है …. पोस्टेड ओन: 31 Dec, 2013 Celebrity Writer, Contest, Entertainment में Rss Feed SocialTwist Tell-a-Friend आगामी वर्ष मे मे बहुत कुछ करना चाह रहा हु सबसे पहेले तो मेरे स्वभाव के अनुसार मुझे अति सर्वत्र वर्जयेत(सब जगह अति करने से बचना है ) अति का भला न बोलना, अतिकी भली न चूप । अतिका भला न बरसना अतिकि भली न धूप । जो अपने लिये प्रतिकूल हो, वैसा आचरण या व्यवहार दूसरों के साथ नहीं करना करूंगा । (श्रूयताम धर्मसर्वस्वं श्रुत्वा चैवानुवर्यताम । आत्मनः प्रतिकूलानि, परेषाम न समाचरेत ।।) परन्तु दुष्ट के साथ दुष्टता का ही व्यवहार करना चाहिये। ( शठे शाठ्यम समाचरेत् ) जीवन मे चाणक्य के सूत्र लागु करने का प्रयास रहेंगा ………. जैसे की सबसे बडा मंत्र है कि अपने मन की बात और भेद दूसरे को न बताओ। अन्यथा विनाशकारी परिणाम होंगे।लोग उसका फायदा लेने की तक मे रहेते है | व्यक्ति को जरूरत से ज्यादा ईमानदार नहीं होना चाहिये। सीधे तने के पेड सबसे पहिले काटे जाते हैं। ईमानदार आदमी को मुश्किलों में फ़ंसाया जाता है।थोडी सी सोच तो ज़माने के साथ की हो जो उसे समझ सके | जैसे अगर कोई सांप जहरीला नहीं हो तो भी उसे फ़ूफ़कारते रहना चाहिये। आदमी कमजोर हो तो भी उसे अपनी कमजोरी का प्रदर्शन नहीं करना चाहिये | मित्रता में भी कुछ न कुछ स्वार्थ तो होता ही है। स्वार्थ रहित मित्रता असंभव है।पर मित्रता भी जरूरी है |मेरे लिए | कोइ भी काम शुरु करने से पहिले अपने आप से तीन प्रश्न के जबाब लूँगा । मैं यह काम क्यों कर रहा हूं? इस कार्य का क्या परिणाम होगा? और क्या मुझे इसमें सफ़लता हासिल होगी? संसार मे सर्वाधिक शक्ति युवावस्था और नारी के सौंदर्य में होती है।जिसके प्रति सतर्क भाव रखूंगा | क्रोध यमराज के समान है,उसके कारण मनुष्य मृत्यु की गौद में चला जाता है। तृष्णा वैतरणी नदी के समान है जिसके कारण मनुष्य को सदैव कष्ट झेलने पडते हैं।अपने अप्रत्यषित क्रोध पर नियंत्रण रखना है मुझे | विद्या कामधुनु के समान है।अपने ज्ञान को समर्द्ध करने का प्रयास रहेंगा क्युकी व्यक्ति विद्या हासिल कर उसका फ़ल कहीं भी प्राप्त कर सकता है। संत्तोष नंदन वन के समान है। मनुष्य इसे अपने में स्थापित करले तो उसे वही शांति मिलेगी जो नंदन वन में रहने से मिलती है।संतोष जरूरी है झूठ बोलना,उतावलापन दिखाना,दुस्सहस करना,छलकपट करना,मूर्खता पूर्ण कार्य करना,लोभ करना,अपवित्रता और निर्दयता ये सभी स्त्रियों के स्वाभाविक दोष हैं।जिससे बचना मेरी प्रथमिकता है | भोजन के लिये अच्छे पदार्थ उपलब्ध होना ,उन्हें पचाने की शक्ति होना,प्रचुर धन के साथ दान देने की इच्छा होना, ये सभी सुख मनुष्य को बडी कठिनाई से प्राप्त होते हैं।जिनका सरक्षण करूंगा जो मित्र आपके सामने चिकनी-चुपडी बातें करता हो और पीठ पीछे आपके काम बिगाड देता हो उसे त्यागने में ही भलाई है।वह उस बर्तन के समान है जिसके बाहरी हिस्से पर दूध लगा हो लेकिन अंदर विष भरा हो।ये मित्र दूर रहे मुझस वे माता-पिता अपने बच्चों के लिये शत्रु के समान हैं,जिन्होने बच्चों को अच्छी शिक्छा नहीं दी। क्योंकि अनपढ बालक का विद्वानों के समूह में उसी प्रकार अपमान होता है जैसे हंसों के समूह में बगुले की स्थिति होती है। शिक्षा विहीन मनुष्य बिना पूंछ के जानवर जानवर जैसा होता है मित्रता बराबरी वाले व्यक्तियों में करना ठीक होता है। सरकारी नौकरी सर्वोत्तम होती है।अच्छे व्यापार के लिये व्यवहार कुशलता आवश्यक है।और सुशील स्त्री शोभा देती है। जिस प्रकार पत्नि के वियोग का दु:ख,अपने भाई बंधुओं से प्राप्त अपमान का दुख असहनीय होता है,उसी प्रकार कर्ज से दबा व्यक्ति भी सदैव दुखी रहता है।दुष्ट राजा की सेवा मेम रहने वाला नौकर भी दुखी रहता है।कर्ज़ से तोबा ! तोबा ! मूर्खता के समान योवन भी दुखदायी होता है क्योंकि जवानी में व्यक्ति गलत मार्ग पर चल देता है।इसका ख्याल सबके लिए जरूरी है जो व्यक्ति अच्छा मित्र न हो उस पर विश्वास मत करो लेकिन अच्छे मित्र पर भी पूरा भरोसा नहीं करना चाहिये क्योंकि कभी वह नाराज हो गया तो आपके सारे भेद खोल सकता है ।इसलिये हर हालत में सावधानी बरतना आवश्यक है। साथ ही धुम्रपान – मधपान से दूरी मैरा स्वं ,परिबार, समाज ,आवास, कार्यलय ,नगर ,देश हित मे जीवन आदर्शो की स्थापना और उनका विकास सभी तरहा से हो यही मेरा प्रयास और लक्ष्य रहेंगा | मेरे पास विधि ज्ञान भी है जिसका उपयोग मे समाजहित मे करता रहूँगा …… देश निर्माण मे हर संभव प्रयास करूंगा और जनसमहू को प्रेरित करूंगा ………….. एक प्रयास " निशुल्क विधिक सहयता केंद्र , एक प्रयास \ इसको अन्य नगरो मे ले जाना है ………. तथा अस्तु ………आमीन …गॉड! ब्लिस तो आल ! सबको शुभ कामनाये!

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सरकार एवं कुछ सरकारी लोग जनता के लिए बड़ी समस्या बनते जा रहे हैं आखिर क्यों ? काम चोर घूसखोर सरकारी मशीनरी की सैलरी का बोझ अब देश की गरीब जनता पर नहीं पड़ने देने का संकल्प लेना चाहिए।यह सबसे बड़ा पुण्य एवं पवित्र कार्य होगा ! ऐसी बातों से कम से कम सबको पता तो लग जाता है कि आम आदमी के विषय में इन की सोच क्या है! सच्चाई ये है कि ईमानदारी का अभाव एवं भ्रष्टाचार की अधिकता तथा जनता के प्रति संवेदन हीनता ने ऐसी सरकारों तथा ऐसे सरकारी कर्मचारियों को न केवल अविश्वसनीय बना दिया है अपितु ये देश के लिए एक बहुत बड़ी समस्या बनते जा रहे हैं आखिर टैक्स रूप में दिए गए धन से जनता ऐसे लोगों का एवं उनके बीबी बच्चों का भार क्यों उठावे!जब कुछ कर पाना तो इनके बश का है ही नहीं किन्तु क्या इनकी बातों में भी संवेदन शीलता नहीं होनी चाहिए? सरकारी लोग जनता के दस लाख रूपए खर्च करके भी उतना काम नहीं कर पाते हैं जितना क्या और उससे अच्छा एवं अधिक काम प्राइवेट लोग एक लाख रूपए में करके दिखा देते हैं। इसी प्रकार सरकारी स्कूल लाखों रूपए खर्च करके भी उतना अच्छा प्रतिफल नहीं दे पाता है प्राइवेट स्कूल जितना उनसे बहुत कम धन खर्च करके दे देता है!यही स्थिति सरकारी अस्पतालों see more...http://bharatjagrana.blogspot.in/2013/12/blog-post_27.html

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आदरणीय संजय जी,शुभप्रभात.यहाँ आया तो इस सप्ताह के बेस्ट ब्लॉगर ऑफ़ दी वीक पर आप की प्रतिक्रिया देखी.आप बहुत बुद्धिमान और सुलझे हुए व्यक्तित्व वाले ब्लॉगर है.नए ब्लॉगरों में आप ने अपनी अच्छी पहचान बना ली है.परन्तु आप की प्रतिक्रिया देखकर मुझे हैरानी हो रही है.बेस्ट ब्लॉगर के चयन का पूरा अधिकार संपादक महोदय अथवा जागरण परिवार को है और हमें उनके चुनाव को स्वीकार करना चाहिए.बेस्ट ब्लॉगर के चुनाव पर इस तरह से सवाल उठाना संपादक महोदय,जागरण परिवार के साथ साथ उस ब्लॉगर का भी अपमान है,जिसे इस सम्मान के लिए चुना गया है.बेस्ट ब्लॉगर के चयन की आलोचना करने की जो नई पम्परा इस मंच पर शुरू हुई है,वो बहुत गलत है.आप बहुत संवेदनशील व्यक्ति हैं,जरुर आपके मन को कोई ठेस लगी है,लेकिन मुझे पूरी उम्मीद है की आप मेरी बात पर भी विचार करेंगे.

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आदरणीय जागरण जंक्शन परिवार,महोदय सादर हरि स्मरण ! आप लोगों ने इस मंच पर मुझे जो भी सम्मान दिया है,उसके लिए ह्रदय से धन्यवाद.मै आप लोगों से एक आग्रह करना चाहता हूँ कि इस मंच के ब्लॉगर आदरणीय अनिल कुमार "अलीन" जी के साफ्टवेयर को ठीक कर उन्हें बिना किसी बढ़ा के पुन:लिखने कि अनुमति दी जाये.बीच में जब उनका ब्लॉग पेज खुल रहा था,तब मैंने उनके लेख पढ़े थे.उनके लेख उच्च स्तर के हैं और पाठकों के लिए उपयोगी और शिक्षाप्रद हैं.इस समय पाठक उनके नए लेखों से वंचित हो रहे हैं.जीवन का कोई भरोसा नहीं है कि कौन कब तक जियेगा ? इसीलिए सच कहने वाले ऐसे विद्वान जब तक इस संसार में हैं,तब तक उनके विचार और अनुभव लोगों के बीच प्रसारित होना चाहिए और ये लोगों पर छोड़ दिया जाये की क्या वो पसंद करते हैं और क्या नहीं ? उनके किसी लेख में कोई आपत्तिजनक बात होगी तो जरुर आप से शिकायत करेंगे और आप कार्यवाही भी कीजियेगा,परन्तु फ़िलहाल अभी उन्हें ब्लॉग लिखने व् पोस्ट करने की अनुमति दी जाये.मै पहले की बातें नहीं जानता,परन्तु सच कहने वाले ऐसे विद्वान व्यक्ति से यदि जाने अनजाने कुछ गलतियां भी हुईं हैं तो उसे क्षमा करते हुए उन्हें पुन:ब्लॉग लिखने और पोस्ट करने की अनुमति प्रदान की जाये.इससे अनगिनत पाठकों को लाभ होगा.मेरी जानकारी के अनुसार उनके ब्लॉग के पाठक सबसे ज्यादा हैं.यदि आप लोग तत्काल अनिल कुमार अलीन जी के सॉफ्टवेयर को ठीक कर उन्हें लिखने और पोस्ट करने की सुविधा पुन:प्रदान करते हैं तो मुझे ही नहीं बल्कि इस मंच के सभी ब्लॉगरों को बहुत ख़ुशी होगी.सादर धन्यवाद और शुभकामनाओं सहित.

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आदरणीय सद्गुरु जी, आपका प्रयास वास्तव में सराहनीय है. ऑनलाइन मीडिया में किसी भी लेख का लिंक जानने के कई तरीके हैं. आपने जिस प्रकार लिंक चुना है वह भी एक तरीका हो सकता है. किन्तु एक आसान तरीका अगर आप अपनाना चाहें तो अपना सकते हैं. इसके लिए आपको अलग से कुछ नहीं करना है. बस खुले हुए लेख के ऊपर जो लिंक दिख रहा होगा, उसके ऊपर कर्सर (जो तीर का निशान दिखता है) ले जाकर बस एक बार क्लिक करें या उसे सलेक्ट कर राइट क्लिक कर कॉपी कर लें. इसे आप जहां वर्ड फाइल में जहां पेस्ट करना चाहते हैं, ctrl + v दबाकर या राइट क्लिक कर पेस्ट का ऑप्शन सेलेक्ट कर पेस्ट कर लें. उदाहरण के लिए अगर आपने निशा मित्तल जी का 'आत्मग्लानि (एक लघु कथा)' खोला गूगल क्रोम ब्राउजर में रिफ्रेश शाइन के बगल में आपको इसका लिंक 'nishamittal.jagranjunction.com/2013/10/03/आत्मग्लानी/' नजर आएगा. इसे कॉपी कर जब आप वर्ड फाइल या जंक्शन डैशबोर्ड में 'एड न्यू' पोस्ट में जाकर भी पेस्ट करेंगे या कहीं और भी, तो यह इस तरह पेस्ट होगा: 'http://nishamittal.jagranjunction.com/2013/10/03/%E0%A4%86%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%80/'. आप चाहें तो इसे ऐसे भी रख सकते हैं या छोटा भी कर सकते हैं. यूआरएल (link) छोटा कैसे करें? सबसे पहले गूगल पर जाकर 'bitly ' (https://bitly.com/) खोल लें. सबसे ऊपर आपको shorten key और box (paste a link to shorten it) नजर आएगा. जिस भी लेख का लिंक कॉपी किया हो और शॉर्ट करना हो, बॉक्स में पेस्ट कर shorten पर क्लिक करें. लिंक शॉर्ट होकर आ जाएगा और shorten key की जगह आपको copy बटन नजर आएगा. copy पर क्लिक करते ही वह कॉपी हो जाएगा और ऊपर बताई दोनों विधियों (ctrl+v या right click) के द्वारा इसे पेस्ट कर लें. इसके अलावे एक और विधि आप सीधे अपने add new post में भी उपयोग कर सकते हैं. Add New Post विधि: जिस भी लेख का लिंक पोस्ट में शामिल करना चाहते हों, उदाहरणार्थ अगर निशा जी का 'आत्मग्लानी (एक लघु कथा)' का लिंक डालना हो, उसे 'आत्मग्लानी (एक लघु कथा)' शीर्षक पेस्ट करें. उसे सेलेक्ट करें और ऊपर insert/edit link पर क्लिक करें (align right के बगल में आपको यह ऑप्शन मिलेगा). एक बॉक्स खुलेगा जिसमें सबसे ऊपर Link URL में लेख का लिंक पेस्ट करें. उसके नीचे Anchors में कुछ न करें. Target में नीचे की तरफ जाते ब्लैक ऐरो को क्लिक करने पर चार ऑप्शन खुलेंगे. दूसरा ऑप्शन 'open in new window (_blank)' सेलेक्ट कर नीचे Insert बटन पर क्लिक करें. इस तरह नीले रंग में दिख रहे शीर्षक में उसका लिंक भी अटैच हो गया होगा और पोस्ट पब्लिश करने के बाद लेख के शीर्षक पर क्लिक कर सीधे लेख के लिंक पर जाया जा सकता है. जंक्शन पोस्ट में किसी भी लेख में लिंक लगाने के लिए आप इस विधि का प्रयोग कर सकते हैं. धन्यवाद! जागरण जंक्शन परिवार

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आदरणीय जागरण जंक्शन परिवार,सादर हरि स्मरण ! ब्लॉगिंग शिखर सम्मान प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए मैंने अपनी पसंद के १० लेखकों को चुना है और उन लेखकों का एक-एक लेख चुनकर प्रत्येक लेख के बारे में अपने कुछ विचार व्यक्त करने के साथ उनके लेख के साथ लिंक का विवरण भी दिया है.लिंक का विवरण देने के लिए लेख के नीचे दायीं तरफ tell & share में जाकर gmail दबाकर लिंक का विवरण ले लिया है.मै जानना चाहता हूँ कि प्रतियोगिता में भाग लेने का क्या ये सही तरीका है.इसमें कोई त्रुटि हो तो बताइये.आप के जबाब से बहुत से ब्लॉगरों को लाभ होगा जो प्रतियोगिता में भाग तो लेना चाहते है,परन्तु सही तरीके से कैसे भाग लें,ये समझ नहीं प् रहे हैं.अपने सादर प्रेम और शुभकामनाओं सहित.

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आदरणीय मनीष जी तथा सद्गुरु जी, जहां तक मित्रता पर संशय का सवाल है, हम एक बार जरूर कहना चाहेंगे कि एक यूजर के रूप में अन्य मित्र ब्लॉगर के आलेखों को पढ़ना और उन पर टिप्पणी देना अलग बात है और निर्णायक के रूप में आलेखों को पढ़ना और निर्णय देना और बात. यह फर्ज की बात है. निर्णायक के तौर पर निष्पक्ष चुनाव में मित्रता का खयाल रखना न संभव है, न किसी के द्वारा ऐसी उम्मीद की जानी चाहिए. इस प्रतियोगिता में आप ही निर्णायक भी हैं और आप ही प्रतिभागी भी हैं. अत: हमारा आपसे यह निजी अनुरोध होगा कि दोनों स्तरों पर निष्पक्ष सोच रखते हुए निष्पक्ष निर्णय करें तथा निष्पक्ष निर्णय का स्वागत भी करें. अगर मित्रता की सोच के साथ निर्णय करें तो सबसे ज्यादा मुश्किल हमारे लिए होगी क्योंकि सभी यूजर्स हमारे लिए महत्वपूर्ण हैं लेकिन किसी प्रतियोगिता में निर्णायक के तौर पर हम सभी को विजेता नहीं बना सकते. यह पाठक भी समझते हैं और निर्णायक भी. अत: प्रतियोगिता के नियमों एवं शर्तों का पालन करते हुए आपसे निष्पक्ष निर्णय की हम उम्मीद करते हैं. धन्यवाद जागरण जंक्शन परिवार

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अमरेंद्र जी, मनीष सिंह रावत तथा सद्गुरु जी जहां तक ब्लॉगर के चुनाव के लिए विषय देने का सवाल है, हमारी यह प्रतियोगिता ‘श्रेष्ठ ब्लॉगर का चुनाव’ यहां मौजूद ब्लॉगरों द्वारा ही करवाया जाना है. विषय निर्धारित करने का अर्थ है ब्लॉगर्स को एक नियत दायरे में बांधना. हो सकता है किसी विषय पर किसी ब्लॉगर की पकड़ अच्छी हो, किसी की किसी और विषय पर. इस तरह विषय के आधार पर किसी की संपूर्ण लेखनी क्षमता का आंकलन करना संभव नहीं होता. जैसा कि हमने ऊपर भी कहा है, हमारा उद्देश्य श्रेष्ठ ब्लॉगर का चुनाव करना है, न कि किसी विषयवस्तु पर सर्वश्रेष्ठ आलेख या ब्लॉगर का चुनाव. इसमें किसी भी ब्लॉगर की कोई भी विधा, लेखन शैली शामिल की जा सकती है. धन्यवाद जागरण जंक्शन परिवार

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आदरणीय कुमारेंद्र जी आपने अच्छा सवाल किया है. आपके माध्यम से हम जागरण जंक्शन के सभी पाठकों को बताना चाहेंगे कि जागरण जंक्शन मंच पर पहले से मौजूद या प्रतियोगिता की अवधि के दौरान नए रजिस्टर्ड ब्लॉगर्स के नए या पुराने किसी भी पोस्ट को आप अपने चुनाव में शामिल कर सकते हैं. इस मंच पर ब्लॉगर के रजिस्टर होने से प्रतियोगिता की समाप्ति अवधि तक आने वाले किसी भी आलेख को अपने चुनाव में शामिल करने के लिए आप स्वतंत्र हैं. उदाहरण स्वरूप अगर किसी ब्लॉगर ने 2012 या 2011 में रजिस्ट्रेशन के बाद कोई बहुत अच्छा ब्लॉग लिखा है और आप उसे अपने चुनाव में शामिल करना चाहते हैं तो शामिल कर सकते हैं अथवा कोई नया यूजर जंक्शन ब्लॉग पर अभी-अभी रजिस्टर हुआ हो और उसका कोई आलेख आप शामिल करना चाहते हों तो प्रतियोगिता में शामिल मानकों का पालन करते हुए उसे भी शामिल कर सकते हैं. सभी यूजर्स से हम पुन: अनुरोध करते हैं कि कृपया प्रतियोगिता के नियम एवं शर्तें ध्यानपूर्वक पढ़ लें. हमने ब्लॉग आलेखों के चयन के लिए कोई विषय निर्धारित नहीं किया है लेकिन यूजर्स की सुविधा के लिए आलेख कैटगरी की 10 श्रेणियां दी हैं जिनके अंतर्गत आने वाले आलेखों को अपने विवेक से प्रतियोगिता में शामिल कर सकते हैं. धन्यवाद जागरण जंक्शन परिवार

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आदरणीय जागरण जंक्शन परिवार,सादर हरि स्मरण ! “श्रेष्ठता का चुनाव आपके हाथ” आयोजन के अंतर्गत "सर्वश्रेष्ठ 10 ब्लॉगरों" का चयन ब्लॉगरों और पाठकों के द्वारा करने का जो निर्णय आपने लिया है और उसे एक रोचक आयोजन का स्वरुप प्रदान किया है,उसके लिए आप को बधाई.सबसे अच्छी बात है की भारत समेत पूरे विश्व के ब्लॉगर इसमें हिस्सा लेंगे.इस आयोजन में शामिल होना सरल है,परन्तु अपनी पसंद के 10 सर्वश्रेष्ठ ब्लॉगरों का चयन करना बहुत कठिन काम है,क्योंकि आप के मंच पर अनेको सर्वश्रेष्ठ ब्लॉगर हैं.इस आयोजन से ब्लॉगरों के बीच आपस में ही प्रतिस्पर्धा होगी और ब्लॉगरों के अनेक ग्रुप बन जायेंगे.ब्लॉगरों के बीच आपसी मित्रता भी इससे प्रभावित होगी,क्योंकि जिसे अपने ग्रुप में हम शामिल नहीं करेंगे,उसे दुःख तो होगा ही.आपने इस आयोजन के अभियान का आरंभ कर दिया है,इसका अंजाम भी अच्छा हो.अंत में आप लोगों से निवेदन है कि securiti code को कृपया पूर्व की भांति सरल कर दें,क्योंकि किसी भी ब्लाग पर कमेंट पोस्ट करना अब बहुत कठिन हो गया है.अपनी शुभकामनाओं सहित.

के द्वारा: sadguruji sadguruji

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                   माँ का दर्द ओ मेरे अंगना की नन्ही गौरिया , देना चाहती थी तुमको एक उडान, धरती से उन्मुक्त आकाश तक , तुम्हारे मुलायम पंखों को , देना चाहती थी बादलों की गति , तुम्हारी छटा को , क्षितिज में देना चाहती थी , इन्द्रधनुषी आकार स्वप्न था मेरा , फुनगियों पर चढ़ कर तुम , सूरज को देती आवाज किन्तु आह !!! जहरीली हवाओं ने तुम्हारी तासीर बदल दी गुलेल ले के , सड़क खड़ी हो गयी तुम्हारे पर कतरने से किसी को रोक नहीं पायी फुनगियों के कांटें , चुभ गए तुम्हारे शरीर में ओ मेरी नन्ही गौरिया , मै चिंतित हूँ तुम्हारे भविष्य के लिए , इस देश की हर नन्ही गौरिया के लिए ...... किन्तु , तुम्हे उड़ना होगा मेरी बिटिया , कटीली फुनगियों पर चढ़ कर , आवाज देना होगा क्षितिज को विषमताओं की हवा में , सुनहरे पंख फैला कर पर्वत की शिखा को छूना होगा अपनी ' नौ -शक्तियों ' को समेटे विश्व -अरण्य को मुखरित करना होगा ओ मेरी गौरिया ----ऐसा जरुर होना है मै प्रतीक्षा करुँगी ....प्रतीक्षा करुँगी !!!!!!!

के द्वारा: DR.NIRUPAMA DR.NIRUPAMA

के द्वारा: aryaji aryaji

आप का लेख बहुत अच्छा है और सत्य के करीब है.आपके लेख की कुछ लाइन मुझे बहुत पसंद आई हैं,जैसे-"इस पर आज विशेष ध्यान देने की जरूरत है “बेटियां जगजननी मां अम्बे का रूप हैं”। ‘मां अम्बे का रूप’ क्योंकि बेटियां ही प्रक़ृति की वह रचना हैं जिसने ‘मां’ के रूप में आज भी सृष्टि के विकास क्रम को जारी रखा है।"बेटियों को लक्ष्मी का रूप कहा जाता है,लेकिन मुझे लगता है कि "मां" का रूप सत्य के सबसे नजदीक और प्राकृतिक है.अपने लेख में आप ने लड़कियों से होने वाली छेड़छाड़ पर बहुत अच्छी बात कही है-"हर लड़की हर किसी की बेटी और बहन नहीं होती लेकिन ‘किसी की बेटी होती है’ यह तो सभी जानते हैं। तो यह क्यों भूल जाते हैं?"डॉटरस डे पर एक अच्छा लेख पढने को मिला.मुझे सबसे ज्यादा दुःख इस बात पर होता है कि औरतें हीं औरतों कि दुश्मन ज्यादा होती हैं.ज्यादातर माताएं लड़का-लड़की में भेदभाव तो करतीं ही हैं,वो बेटी की बात पर जल्दी विश्वास नहीं करतीं है,जबकि उसकी बात ध्यान से सुनना चाहिए.एक छोटी बेटी ने मां से शिकायत किया कि मां मै ट्यूशन नहीं पढूंगी,सर मुझे छेड़तें हैं.यह सुनकर मां ने बेटी को ही थप्पड़ मार दिया-"ये नहीं पढने का बहाना ढूंढ़ती है."बाद में बच्ची की बात सही निकली.इसी तरह से एक बच्ची अपने सगे चाचा की शिकायत मां-बाप से करती थी कि चाचा मुझे छेड़तें हैं.मां-बाप बच्ची को ही डाँटते थे.एक दिन उस सगे चाचा ने ही मौका पाकर बच्ची को अपनी हवस का शिकार बना लिया.बच्चियों के लिए सबसे बड़े दुश्मन अक्सर पडोसी व् रिश्तेदार बन जातें हैं.ज्यादा अच्छा है कि जहाँ जाने की जरुरत हो,वहां पर बच्ची के साथ स्वयं जाएँ.सबसे महत्वपूर्ण बात यह है की बच्ची यदि कोई छेडछाड की शिकायत करे तो उसपर तुरंत ध्यान दें.अंत में पुन:सार्थक लेख के लिए बधाई.

के द्वारा: सद्गुरुजी सद्गुरुजी

आज कल मै एक बात पढ़कर काफी हैरान हो जाता हूँ "यह घटनाएँ ...................आजकल आम हो गयीं हैं " बलात्कार आदि असामाजिक घटनाएँ यह भी एक सोची समझी रणनीति और दुष्प्रचार दीखता है ताकि अच्छे लोग और प्रबुद्ध लोग हतोत्साहित हो कर बैठ जाएँ और समाज गर्त में पहुँच जाये हाँ इन घटनाओं पर लगाम लगनी ही चाहिए हमे मीडिया बंधुओं से एक अपील करनी होगी की सनसनीखेज समाचारों के होने वाले दुश्प्रभाओं को समय रहते समझे ताकि और लोग दिग्भ्रमित न हो की समाज में सिर्फ गलत ही काम हो रहे है गलत कार्यों की निंदा भी हो और अच्छे कार्यों की सराहना हो ताकि अच्छे कार्य करने वालों की भी हिम्मत बढे सकारात्मक सोच को भी नयी दिशा मिले और समस्याओं की ही नहीं समाधानों की भी चर्चा हो

के द्वारा: pankajranjan pankajranjan

के द्वारा: DR. SHIKHA KAUSHIK DR. SHIKHA KAUSHIK

सूनी कलाई राखी पर ज़हन मेँ पहले जैसी मासूमियत नहीँ मिलती राखी के धागे मेँ पहले सी मुहब्बत नहीँ मिलती तरक्की की दौड मेँ हम दो हमारे एक हो गये कहीँ भाई नहीँ मिलता कहीँ बहन नहीँ मिलती संस्कारोँ की न जाने कैसी नीँव रखी है न कृष्ण जैसा सखा है न राधा सी सखी है हाथ भरा हुआ है सारा टैटू से महबूब के कलाई मेँ मगर एक भी राखी नहीँ मिलती बागबाँ के ही हाथोँ मसली जाती है कली वो शुक्रगुजार हो माँ बाप का बहन जिसे मिली कोख मेँ आते ही दफन हो जाती हैँ बहनेँ ऐसे भी चमन हैँ जहाँ कली नहीँ खिलती देखी जहाँ बहनोँ के संग छेडखानी है कानून कहता है ये मासूमोँ की नादानी है तरक्की हुई बहनेँ बाहर आयी हिजाब से जिन्दा जलायी जाने लगी हैँ तेजाब से हर औरत से माँ बहन सा बर्ताव तुम करो माँ बाप से अब ये नसीहत नहीँ मिलती दीपक पाँडे नैनीताल http://deepakbijnory.jagranjunction.com/2013/08/17/सूनी-कलाई-राखी-पर/

के द्वारा: deepakbijnory deepakbijnory

राखी केवल भाई-बहन के संबंधों का पर्व नहीं बल्कि यह मानवता का पर्व है। भारत के स्वाधीनता आन्दोलन के दौरान जन-जागरण के लिए इस पर्व की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका रही थी। इसमें कोई संदेह नहीं कि रिश्तों से ऊपर उठकर रक्षाबंधन की भावना ने हर समय और जरूरत पर अपना रूप बदला है। जरूरत होने पर देश की सीमा पर हर स्त्री ने सैनिकों को राखी बांध कर उन्हें भाई बनाया। राखी देश की रक्षा, पर्यावरण की रक्षा, हितों की रक्षा आदि के लिए भी बांधी जाने लगी है।  इस दृष्टि से देखें तो अब यह हमारा राष्ट्रीय पर्व बन गया है।                                                   - डा.चन्द्रशेखर रावल, एसोसिएट प्रोफ़ेसर बागला महाविद्यालय, हाथरस ।

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बड़े भाग्य शाली होते हैं वे बच्चे जिनको अपने माँ और पिता की छत्र छाया का सुख मिलता है ! सुखी होते हैं वे लोग जो अपने बूढ़े माँ बाप का बोझ उठाते हैं और चहरे पर हमेशा एक कुदरती मुस्कान कायम रखते हैं ! लेकिन मैं इतना भाग्यशाली नहीं रहा ! केवल ८ साल का था जब मेरे पिता जी हमें सदा के लिय भगवान के भरोशे छोड़ कर खुद भगवान को प्यारे हो गए थे ! हल्की सी याद है की वे अपने सरकारी काम में इतने उलझे रहते थे की सुबह ही कब चले जाते थे और रात को कब घर आते थे, हमें पता ही नहीं चलता था ! लेकिन शायद जिन्दगी में दो चार ही ऐसे चांस मुझे मिले होंगे जब पिता जी का सामना हुआ होगा और मैंने उन्हें जी भर कर देखा होगा ! मेरे घर के दूसरे मंजिल पर भगवान् राम लक्षमण, माँ जानकी और हनुमान जी की फोटो टंगी रहती थी और हर आने जाने वाले के सर को झुका देती थी ! शायद वे राम के पुजारी रहे होंगे ! कभी कभी बड़ी मीठी आवाज में वे रामायण के चौपाय गाया करते थे ! शाम को वे बांसुरी बजाते थे और बांसुरी का मधुर स्वर नदी घाटियों में गूंजने लगता था ! बहुत बातें माँ बताया करती थी ! बस इतना जानता हूँ की मेरे पापा के बाद मेरी माँ ही हमारे तीन भाइयों और एक बहिन की माँ और पिता जी दोनों थे ! फादर'स दिन पर मैं अपने पिता जी को चाहे वे कहीं भी हों अपना प्यार भरा चरण स्पर्श भेजता हूँ !

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मैं तमन्ना जी के विचारों से पूर्णतया सहमत हूँ . मैंने अपने ६७ वर्ष के जीवन में यही जाना है यही समझा है की "पित्री देवो भवः , मत्री देवो भवः " इन दोनों के ऋण से कोई भी दुनिया का उरिन नहीं हो सकता . मैं आज खुद ही दादा बन चूका हूँ मेरे पिताजी तो १९९२ में ही भगवन को प्यारे हो गए अब उनकी यादे केवल साथ है और कुछ और है तो उनका आशीर्वाद जिसके सहारे हमरे जीवन की नईया भली भांति पार लग रही है . मेरी राय में पिता को केवल फादर डे पर ही याद करना महज एक औपचारिकता है जिसे नकारना चाहिए पिता का आदर हर वक्त हर कसन करना चाहिए उनके मार्ग दर्शित किये रस्ते पर चलना चाहिए आज के युवा वाही नहीं करते यही उनके दुखों का कारन है

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एक मां ने बेटे के प्रेम में श्मशान को बनाया घर दुनिया में सबसे कठिन काम होता है बेटे की अर्थी को कन्धा देना| हर मां- बाप की यही इच्छा होती है कि अंतिम समय में वह अपने बेटे के कन्धों पर जाए| लेकिन राजस्थान के सीकर में एक मां के साथ वह हुआ जिसे सुनकर आपके भी पैरों के नीचे से जमीन खिसक जायेगी| सीकर. शिवधाम धर्माणा श्मशान घाट। शवयात्रा आते ही एक पेड़ के नीचे बैठी 50 साल की महिला झट से उठकर लोगों की सेवा में जुट जाती है। कभी लोगों को पानी पिलाने लगती है। तो कभी अंतिम क्रिया के लिए लकड़ियां लाने में जुट जाती है, तो कभी चिता पर कांपते हाथों से लकड़ियां रखती है। लोग हैरत में। किसी को लगता है शायद मृतक के परिवार की कोई रिश्तेदार होगी। तभी दूसरी शवयात्रा आती है तो यह महिला उधर चली जाती है। वहां भी इसी प्रकार की सेवा। पता किया तो चौंकाने वाली जानकारी मिली। इस बुजुर्ग महिला का नाम है राजू कंवर। पौने चार साल से यही उसकी दिनचर्या है। पूछने पर पता चला कि एक हादसे में काल का शिकार हुए 22 साल के जवान इकलौते बेटे की चिता को खुद मुखाग्नि देने के बाद वह आज तक घर नहीं गई। वैसे भी पति तो पहले ही प्रभु चरणों में चले गये थे अब किराए के एक कमरे के सिवा उसके पास था ही क्या। उसे भी छोड़ आई। तब से ये श्मशान ही उसका घर है। इस माँ को नमन ..._/\_जय श्री राम _/\_

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निश्चित रूप से एक सकारात्मक मुहीम की सही समय पर और तात्कालिक परिस्थितियो में संजय दत्त जैसे लोगो का आपराधिक वारदातों में किसी संलिप्तता के लिए दंदितकिया ही जाना चाहिए लेकिन सजा का मूल उद्देश्य अपराधियो को सुधारने का प्रयास होना चाहिए नहीं तो कमसेकम ऐसी परिस्थितिया तो बनानी चाहिए जिसमे एक कैदी को खुद को अनुशासित एवं अपने गुनाहों तहे दिल से काबुल करने एवं उनका पूरी निष्ठां से प्रायश्चित करना चाहिए और चूकि संजय दत्त ने अगेर क सेलिब्रिटी और लोकप्रियता लोगो का प्यार और समर्थन मिलाने की सबसे बड़ी वजह संजय दत्त द्वारा गुजारी गयी जेल यत्र एवं वह पर समर्पित रूप अपने नायक को सच्चे दिल से प्रायश्चित करता देख आम जनता तो कबका माफ़ कर चुकी है महात्मा गाँधी के विचारो को आज के समाज से जड़ने और गांधीवाद का अविस्नार्दीय नमूना मुन्ना भाई एम्.बी.बी.एस.में पेश किया लिसी जनता आज तक नहीं भूली है मेरे समझ से आजादी के बाद गंधिके विचारो की प्रस्न्गोक्ता स्थापित की है होना तो यह चाहिए था की जब संजय दत्त ड्रैग इत्यादि के नशे के चंगुल से श्री सुनील दत्त के प्रयासों से पूरी तरह नशा मुक्त होने पर मद्यनिषेध का ब्रांड अम्बेसडर बनाने का प्रस्ताव शासन द्वारा दिया जाना चाहिए अगर के.बी.सी. में ५ करोड़ इनाम पाने वाले को मंरेगा का ब्रांड अम्बेसडर का प्रस्ताव प् सकता है तो------=-श्री सुनील दत्त साहब के राजनैतिक एवं विचारो के महानता से पीड़ित है हर बड़े बाप का बेत५अ अपने बाप की म्हणता की क़ुरबानी देता आया है.नहीं तो खुद इतने बड़े जनाधार पर खड़े नैतिकता के विलुप्त श्रेदी के होने के चलते ही कुछ कुछ जुगाड़ बजी के स्थान पर संजय को अपने जुर्म का इक़बाल कर खुद प्रायश्चित करो जिसे पूरी निश्त५ह से संज्जू बाबा द्वारा निभाया गया इन परिस्थितियो में हमपने नायक के सजमफी की मुहीम चलानी ही है अगर फूलन देवी सीमा पर से लौट सम्र्पद किये अक्ष्स्ल्वदिओ में जिन्हों ने सम्र्पद किया उन्हें नौकरी के साथ मुआवजा देना अगर क़ानूनी रूप से सही है और संज्जू का मामला इतना गंभीर सन्देश नवयुवको को जा रहा है की अब आज के बच्च्चे नातो कभी अपने गुनाहों कोस्वि८कर करेगे और फिर प्रायश्चित का सवाल कहा पैदा होता blog

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वैलेंटाइन वीक के मौके पर ही प्यार का इज़हार करें, ज़रूरी नहीं. और यह प्यार केवल इश्क हो, यह भी ज़रूरी नहीं. हाँ! इस अवसर को अगर हम उन सबके प्रति कृतज्ञता भाव दर्शाने के लिए मनाएं जो हमसे अनकंडीशनल स्नेह करते हैं और हमारी ज़िन्दगी में कोई अहम् रोल निभा रहे हैं! वो हमारे माता पिता, शिक्षक, प्रेरक, दोस्त या आदर्श हो सकते हैं. या फिर जिन रिश्तों में कडवाहट है, द्वेष है या शिकायत है... क्षमा शक्ति से उनके प्रति पॉजिटिव विचार जागृत करें! किसी रिश्ते को निभाने में यदि हमसे चूक हुई हो और अब तक चाहते हुए भी अपना फ़र्ज़ अदा करने की कोशिश न कर पाएं हो तो यह वक़्त सही है प्यार की ताक़त को समझने का. प्रेम के रिश्ते में आपसी समझ, सम्मान और इमानदारी रखने का प्रण लेते हुए प्यार का इज़हार करें और अपने साथ साथ दुसरे का जीवन भी मधुर बनाये! सही मायने में एक आदर्श वैलेंटाइन बनना चाहें तो पहला इश्क अपने देश व् समाज से निभाएं! यह मेरी निजी सोच है... आपसे तभी बाँट रही हूँ क्योंकि इसे हम अपने जीवन में निभाकर एक सफल, सजग, समृद्ध व् सुखी जीवन व्यतीत कर रहे हैं. प्रेम व् स्नेह भरी शुभ कामनाओं के साथ! स्वीन सैनी, नाइस हाउस, माल रोड, होशीआरपुर

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हाँ मैंने भी प्यार किया है और आज ३०-३५ वर्षों के बिच्चोह के बाद भी अपने पहले प्यार को आज भी दिल से चाहता हूँ .उससे मेरी पहली मुलाकात जबलपुर में हुई ,उसके बाद वो दिल्ली चली गयी दिल्ली में लॉ करने के बाद और कई सालों की लगातार कोशिस के बाद पता चला की वो जज हो गयी है.३०-३५ सालों में एक भी दिन उसकी याद के बिना नहीं बिता . मेरी तम्मना और परमपिता से प्रार्थना है वो जहाँ भी हो खुश रहे आबाद रहे.पैर ये भी सच है की मै अपने पहले प्यार को जिन्दगी के अंतिम छन तक भूला न सकूंगा .परमात्मा से प्रार्थना हे की इस संसार से बिदा होने के पहले उससे एक मुलाकात हो जाए . "तुम तस्सली न दो सिर्फ बैठे रहो ,वक्त मरने का कुछ तो टल जाएगा ,सामने मसीहा के होने ही से मौत का भी इरादा बदल जाएगा .

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उस मेडिकल स्टूडेंट के साथ जो हुआ वो बहुत ही घिनोना व जघन्य अपराध है लेकिन इस मामले में उस लड़की के परिवार उसके माता-पिता के विचार और मत लेकर ही उन अपराधियों को साज़ा दी जानि चाहिए क्योकि इस का हक़ सिर्फ और सिर्फ उस लड़की का और उसके माता पिता का है कोई पीड़ित परिवार के दर्द को महसूस नही कर सकता है आज हम लोगो को एक मुद्दा मिलगया है बाते करने का और अपने कमेंट्स के माध्यम से सुर्खियों में आने का वक़्त के साथ हम ये बात भूल भी जायेंगे पर उस परिवार को जो दर्द और ज़ख्म मिला है वो कभी धुंदला नही पड़ेगा वो एसा दर्द है जिसकी कोई दावा नही है इसलिए उन अपराधियों के साथ क्या किया जाये इसका फेशाला पीड़ित परिवार के हाथो में होना चाहिए ......

के द्वारा: bishusona bishusona

सन दो हजार बारह का साल एक प्रकार से गडे मुर्दे उखाडने का साल गया है। पुराने जमाने के गडे मुर्दे उखाडे गये है और हर कोई चाहे कितना ही दमदार रहा हो सभी पर कोई न कोई आक्षेप लगा ही है। नारायणदत्त तिवाडी जैसे बुजुर्ग लोग भी इस साल के घेरे मे फ़ंसे और जो लोग अपने को साफ़ साबित करते आये है वह सभी किसी न किसी प्रकार से सन्देह के घेरे मे आकर अपनी छवि को धूमिल करने मे सामने आये है। भारत के प्रधान मंत्री तक ने अपने को बिना किसी सोच विचार के उन कानूनो को पास करवाया है जिससे भारत की जनता त्राहि त्राहि करने लगी है,एक मात्र रसोई का विकल्प रसोई गैस तक आज बाजार मे ब्लेक से लेकर खाना पकाने की जुगत मे आ चुकी है,एक सिलेंडर जो मात्र चार सौ रुपये का आजाता था,वह आज मजबूरी मे ब्लेक से लेकर आने मे बारह सौ रुपया तक चुकाना पड रहा है। ऊपर से बिना सिर पैर की बाते नेता भी करते आये है जैसे कोई कहता है कि बत्तिस रुपये मे घर का खर्चा चल जाता है कोई कहता है कि सत्ताइस रुपये मे ही चल जाता है। कहने को कुछ भी कहा जाये लेकिन आम आदमी के लिये यह सन दो हजार बारह का साल एक आफ़त बनकर आया था और इसकी दी गयी आफ़ते आने वाले दो दशको तक तो याद की जाती रहेंगी।

के द्वारा: astrobhadauria astrobhadauria

मन कहता है कोहरा ना हो जीवन में ................तन कहता है है कोहरा ही हो जीवन में ..................धूप से खेल खेल कर रोज दिन बिताते ......................आज कुहासा क्यों मिल आया है जीवन में ..................जिन्दगी कुछ सिकुड़ती , दुबकती हर पल ...................ना जाने कौन छीन ले और हो ही न कल ..................या कैसा है समय आलोक सभी के जीवन में .................बेटी माँ मांग रही है मौत भारत के जीवन में ..........................केवल रैली और धरना प्रदर्शन करके हम सब को बचने की कोशिश नही करना चाहिए .......पुरे देश को फंसी और मृत्यु दंड के लिए आन्दोलन चलाना चाहिए ....................कुछ लोग कहते है की यह जानवर जैसी क्रिया है ...........पर मैं आपको बताता हूँ की पृथ्वी पर कोई ऐसा जानवर नही है जो मादा के साथ बिना बिना सहमति के शरीर संसर्ग कर सकता हो .....हम तो जानवर कहलाने लायक भी नही रह गए ..................क्या आपको पूरा विश्वास है की आपके इस मौन से एक दिन आपका घर रुदन की चपेट में नही आएगा ..............................यही है कोहरा का सही अर्थ .................रोकिये ये अनर्थ ...............सुप्रभात

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अपने मान बाप और बड़े भाई का कहना मानना चाहिए और बहुत ज़रूरी न हो तो देर रात घर से बाहर नहीं रहना चाहिए और अगर ज़रूरी है तो बहुत सावधान रहना चाहिए क्योंकि थोड़ी से असावधानी जिन्दगी बर्बाद कर देती है बिस्वास किसी पर भी नहीं करना चाहिए कोई भी दरिंदा हो सकता है इसलिए ज़रूरी है की अपने दिमाग को खोलकर रखें जैसे की कोई बातो बातो में आपको यार कहता है तो आपके दिमाग की घंटी बज जानी चाहिए बिना मतलब मॉडर्न बन्ने का कोई फायदा नहीं है. क्योंकि अगर कोई हव्शी दरिंदा जब किसी को शिकार बनता है तो उसके बाद जो भी सजा उसे दी जाय जिसको उसने अपना निशाना बनाया है उसकी पहले वाली जिन्दगी नहीं मिल पायेगी.

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क्या कहता है देश वेश में कौन है आया .............माँ को लूटा बेटी को लूटा टूटा रिश्ता का साया .............सिसक रही वो लड़की जो भारत में रहती है .......................क्या पाया बलात्कार सत्कार नही उसने पाया ..............धिक्कार रही जननी अपनी कोख आज क्यों ...................क्या पशु ले रहे जन्म पुरुष बस नाम है पाया ...............कैसे हस पाएंगी बेटी खुद तेरे आँगन में भारत .................रुक कर देखो लक्ष्मी जी रही लेकर काला साया ........................मेरे देश के पुरुषो कम से कम उस रावन और कंस से ही प्रेरणा ले लो जिसे हमने राक्षस कहा पर कभी उन्होंने नारी के सतीत्व को चोट नहीं पहुचाई ............पर यह क्या हो रहा कि हमको शर्म आने लगी गई .................क्योकि हर लड़की सड़क पर डर के जाने लगी है ...................सभी लोग मिल कर लडकियों के जीवन के लिए सोचिये और देश में बलात्कार के लिए मृत्यु दंड की सजा का आन्दोलन चलिए ...........अखिल भारतीय अधिकार संगठन

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मेरी समझ से अरविंद केजरीवाल केन्द्रीय मंत्रियों द्वारा हो रहे घोटालों और भ्रष्टाचार को जनता के सामने ला रहे हैं तथा आम जनता को समझाने की कोशिश कर रहे है कि भ्रष्टाचार ही भारत के पतन का मुख्य कारण है। वह कांग्रेस, बीजेपी समेत अन्य राजनीतिक पार्टियों के विरुद्ध आवाज उठाने लगे हैं जिससे यह स्पष्ट है कि वह किसी के साथ मिलकर नहीं बल्कि सच्चाई व ईमानदारी के बल पर अपने साथ साथ आप की भी पहचान बनाना चाहते हैं। वह देश के युवाओ को संदेश दे रहे है कि देश की सारी जिम्मेदारियां अब तुम्हारे कंधो पर है। देश के युवाओ सच्चाई व ईमानदारी को अपनी पहचान बनाकर आगे बढो और देश की सत्ता संभालकर भारत को सफल भारत बनाओ। जहॅा सभी सुख, शान्ति व आन्नद से रहे।

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हिन्दी दिवस पर विशेष : यह क्या हो गया है ! यह हमारी ज़बान को क्या हो गया है कि इस पर से सजी-सँवरी धूप का विश्वाश उठ रहा है इससे सोंधी मिट्टी की आशा टूट रही है इस पर नक्षत्र चढ़ते कदम भरोसा नहीं करते इससे नई निगाहों को आगे राह नहीं दिखती | यह हमारी ज़बान को क्या हो गया है कि इसके रहते एक सफ़ेद मुँहचढ़ी ज़बान देश की अलिजिह्वा तक का रंग सफ़ेद डाइ की तरह बदल रही है वह शब्दों के तैलीय तरण-ताल में नहाकर गाँवों तक आधुनिकता की कुलाँचें मार रही है जगह-जगह भूमण्डलीकरण के कैम्प लगाकर सब की नसों में कोकीन डाल रही है और एक अरब लोगों की चेतना कोम्-आ में पहुँचाकर उसके खून-पसीने की सारी रंगत दुह रही है | यह हमारी ज़बान को क्या हो गया है कि इसके ऊपर एक तेज़ी से फैलनेवाली बहुत महीन असाध्य, परजीवी पर्त उग आई है जो दिनोंदिन और ढीठ होती जा रही है | सिर पर मंडरा रही है आँखों में धूल झोंक रही है कानों में कौड़ी डाल रही है होंठों पर थिरक रही है छाती पर मूँग दल रही है जो हाथों को धोखे से बाँध रही है पैरों पर कुल्हाड़ी चला रही है और जो विषकन्या की तरह हमारे देश के साथ अपघात कर रही है | यह हमारी ज़बान को क्या हो गया है कि केवल पन्द्रह वर्षों का झाँसा देनेवाली जैसे अब घर-बैठा बैठने पर तुल गयी है वह आज भी हमारी जीभ पर षड्यन्त्र का कच्चा जमींकंद पीस रही है हमारी सारी सोच-समझ हलक के गर्त में ढकेल खुद बाहर बेलगाम हो रही है जो हमारे मन की नहीं कहती हमारे मुख को नहीं खोलती हमारे चेहरे की नहीं लगती और जो आकाशबेल की तरह हमारे देश के मानसवृक्ष पर फैलती जा रही है | यह हमारी ज़बान को क्या हो गया है कि इसे सभी राजनगर हर साल एक बार अपनी कमर झुकाकर प्रणाम करते हैं स्तुति का आयोजन करते हैं गले में वचन-मालाएँ लाद देते हैं कुछ दिनों के तर्पण से कितना तृप्त करते हैं फिर पूरे साल यह पिछलग्गू बनी दौड़ी फिरती है राजमहिषी का पद छोड़ चाकरी करती है और जो दूसरी सिरचढ़ी है, जिसकी तूती बोलती है देश की बोलती बंद करने का दहशत फैलाती है | यह हमारी ज़बान को क्या हो गया है जो रूपवान-गुणवती भिखारिन की तरह गली–कूचे में धक्के खा रही है हर कहीं बे-आबरू हो रही है हर मोड़ पर आँसू बहा रही है जिसे देख पालतू कुत्ते भौंकते हैं आवारा दौड़ा-दौड़ाकर नोचते हैं आखिर, यह सब क्या हो गया है यह हमारी ज़बान को क्या हो गया है | – “अतलस्पर्श”, संतलाल करुण

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हिन्दी दिवस पर विशेष : खुला अपहार हे मेरे देश ! तुम्हारे गर्द-गुबार भरे बिखरे-बिखरे बाल धुँधली, निस्तेज, उदास-उदास आँखें झुर्रीदार, पिचके-पिचके गाल तब्दील किए जा रहे हैं इमामों-मठाधीशों के कढे-सवरें बालों तेली के बैल की बड़ी-ढकी आँखों उधार के भरे-उजले यूरोपियन गालों में ऐसा करके तुम्हारा गौरव बढ़ाया जा रहा है वे कहते है | हे मेरे देश ! तुम्हारी टूक-टूक होती घायल छाती बेहिसाब बोझ से झुकी नंगी पीठ भुनाई जा रही हैं नव नगद न तेरह उधार के रास्ते जिससे धन्नासेठों के आसमान चढ़ते पेट भावी भारत–रत्नों की पीठें उतान-वितान हो रहे हैं ऐसा करके तुम्हारी साख बढ़ाई जा रही है वे कहते हैं | हे मेरे देश ! काटकर तुम्हारी ज़बान प्रतिष्ठित कर दी गई है राजमन्दिर में राजपुजारी ज़बरदस्ती पूजा में तुले हैं जबकि राजभवन के पिछवाड़े से लपलपाती एक दूसरी ज़बान तेल लगाकर छोड़ दी गई है समूचे राजनगर को चाटने केलिए ऐसा करके तुम्हें अंतर-राष्ट्रीय ऊँचाई दी जा रही है वे कहते हैं | हे मेरे अपने देश ! वे कुछ भी कहें, पर खुलेआम –- क्या तुम्हारा चेहरा दागी नहीं किया जा रहा ! क्या तुम्हारा यथार्थ अँधेरे में नहीं घसीटा जा रहा ! क्या तुम्हारे विचारों की बोलती बंद नहीं की जा रही ! -- ‘अतलस्पर्श’, से

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हिन्दी दिवस 14 सितम्बर’ 12 पर : तकनीकी माध्यमों में हिंदी अनुप्रयोग की संभावनाएँ वैसे तो स्वतंत्रता-प्राप्ति के 65 वर्षों के उपरान्त आज के अत्याधुनिक तकनीकी माध्यमों में “हिंदी अनुप्रयोग की सामयिक आवश्यकता” की जगह संभावनाओं की तलाश राष्ट्रभाषा के प्रति हमारे दृष्टिकोण का हल्कापन ही प्रकट करता है, पर है यह विषय इतना प्रासंगिक कि राष्ट्रभाषा की घटती व्यावहारिक महत्ता और अंग्रेजी की दिन-पर-दिन बढ़ती सत्ता के तथ्यों को काफी कुछ उजागर करने में हमारी मदद करता है | विभिन्न तकनीकी माध्यमों में हिंदी-अनुप्रयोग की संभावनाओं पर विचार करते समय पहले हमें यह देखना होगा कि इन माध्यमों में कैसी भाषिक चेतना वाले लोगों की (भारतीय अथवा अंग्रेजीदाँ) पूँजी लगती है, कैसी भाषिक चेतना वाले लोगों द्वारा ये संचालित होते हैं और कैसी भाषिक चेतना वाले लोगों के लिए ये माध्यम कार्य करते हैं | दूसरे यह कि भारतीय अर्थ-व्यवस्था, बाजार, शासन-प्रशासन, विज्ञान-प्रौद्योगिकी, कृषि, चिकित्सा, वाणिज्य आदि के क्षेत्रों में दिनोंदिन अंग्रेजी के बढ़ते दबदबे और परिणाम स्वरूप भारतीय जनमानस पर पड़ते उसके मनोवैज्ञानिक प्रभाव के विभिन्न पहलुओं को समझे बिना तकनीकी माध्यमों में हिंदी अनुप्रयोग की संभावनाओं को ठीक-ठीक नहीं समझा जा सकता है | तकनीकी माध्यमों से जुड़े जिस वर्ग-त्रयी का उल्लेख किया गया, उसमें पहला वर्ग पूँजीपतियों का है, जिसका झुकाव अंग्रेजों के शासन-काल से ही अंग्रेजी की ओर है | अपवाद रूप में इस वर्ग के कुछ सच्चे राष्ट्रभक्तों और हिंदी प्रेमियों को छोड़कर बाकियों की अंग्रेजी-मानसिकता के कारण (अन्य अनेक कारण भी हैं) हिन्दी आज तक राष्ट्रभाषा का वास्तविक स्थान नहीं पा सकी | यह वर्ग बोलचाल में हिंदी अथवा अन्य भारतीय भाषाओं का प्रयोग तो करता है, किन्तु लिखने-पढ़ने में इसकी भाषिक क्षमता अंग्रेजी में पाई जाती है, हिंदी में प्राय: नहीं | इस वर्ग की भावी पीढ़ियाँ माँग-पूर्ति के इस व्यावसायिक जगत में हिंदी अथवा अन्य भारतीय भाषा-भाषी जनता की क्रय-शक्ति के चलते बोलचाल में “हिंग्लिस” का प्रयोग तो अभी कुछ दशकों तक करती रहेगीं, किन्तु लिखने-पढ़ने में उनके द्वारा हिंदी के तिरस्कार की प्रबल संभावना है | दूसरा वर्ग, मध्यस्थों का है, जो सीधे तकनीकों से जुड़े होते हैं | इस वर्ग में मीडिया-कर्मी, ज्ञान-विज्ञान, प्रौद्योगिकी, शिक्षा, चिकित्सा, कृषि, सिनेमा आदि क्षेत्रों के तकनीशियन, विशेषज्ञ, भाषाविद, कलाकार, चित्रकार आदि आतें हैं | इनकी वृत्ति ‘सेवा और अर्जन’ पर टिकी होती है | इस वर्ग के अधिकांश लोग मन से न सही, किन्तु रोजी-रोटी के गहराते संकट और बढ़ती आवश्यकताओं के कारण अंग्रेजी से प्रभावित हैं | भारतीयता में अपने पाँव टिकाये रखने के लिए ये लोग द्विभाषिता-बहुभाषिता की क्षमता अपनाकर सक्रिय हैं | उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध तक हमारे देश के अधिकांश क्षेत्रों में अंग्रेजी छठीं कक्षा से पढ़ाई जाती थी, किन्तु आज इनके बच्चे नर्सरी से ही अंग्रेजी माध्यम के पाठ्यक्रमों से शिक्षा पा रहे हैं | ऐसे में इनकी आगामी पीढ़ी से अपवादों को छोड़कर हिंदी अथवा भारतीय भाषाओँ के प्रति आत्मीयता की आशा करना व्यर्थ है | रहा तीसरा वर्ग, जो आम नागरिकों का वर्ग है और जिसमें तरह-तरह के लोग आते हैं – शिक्षित-अशिक्षित, सरकारी-अर्धसरकारी-गैर सरकारी वेतनभोगी, किसान-मजदूर, भिन्न-भिन्न काम-धंधों से जुड़े गाँव और शहर के लोग, उच्च-मध्य-निम्न वर्गीय इत्यादि | यह भाँति-भाँति लोगों का भाँति-भाँति के वातावरण और ज़मीन से जुड़ा वर्ग है और मोबाइल फोन, लैपटॉप, पामटॉप आदि उन की भी पहुँच के दायरे में हैं | सामान्यतया अभी तक यह वर्ग हिंदी अनुप्रयोग के लिए अपने मन-मस्तिष्क का द्वार खोले हुए है, किन्तु इसकी दृष्टि उन्हीं पूँजीपतियों, राजनेताओं, नौकरशाहों, फ़िल्म और खेल जगत के सितारों आदि पर लगी हुई है, जिनकी जीवन-शैली प्राय: पाश्चात्य चकाचौंध और अंग्रेजियत से प्रभावित है | गौर करने लायक तो यह है कि पूर्णतया भारतीय भाषा-भाषी मानस रखते हुए इस वर्ग के लोग भी अपनी संतानों को लेकर अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों की ओर रुख किए हुए हैं और जो किन्हीं कारणों से नहीं किए हुए हैं, वे भी ऐसे स्कूलों के पक्ष में उत्साहित हैं | ग्रामीण क्षेत्र के कृषक-मजदूर या तो उस तरह का विद्यालयीय वातावरण नहीं पाते या फिर उनकी आय अंग्रेजी माध्यम के पब्लिक स्कूलों का खर्च वहन करने में असमर्थ है | किन्तु उनकी समझ में भी यह तथ्य घर करता जा रहा है कि यदि हमें अपने बच्चों का भविष्य सुनहरा बनाना है तो हिंदी माध्यम से काम नहीं चलेगा | इसी प्रकार यदि शासन के आधार पर देखा जाए तो 2 वर्ग सामने आते हैं-– शासक वर्ग और शासित वर्ग | प्राय: शासक वर्ग वरिष्ठ और आदर्श माना जाता है | यही कारण है कि शासित वर्ग शासक वर्ग के पहनावे, रहन-सहन, खान-पान, बोली-भाषा आदि का अनुकरण करना चाहता है | दुर्भाग्य से स्वतंत्रता प्राप्ति के 65 वर्षों के उपरान्त भी शासक वर्ग की भाषिक क्षमता पर अंग्रेजी का नशा (कुछ राज्य सरकारों और अधिकतर उनके निम्न श्रेणी लिपिकीय काम-काज को छोड़कर) चढ़ा हुआ है, जिसे शासित वर्ग ललक भरी निगाह से देखता है और शासक वर्ग की तरह वह भी चाहता है कि अंग्रेजी उसके सर चढ़ कर बोले | यही कारण है कि देश भर में अंग्रेजी माध्यम के पब्लिक स्कूलों की संख्या तेजी से बढ़ रही है| दूसरी ओर ग्रामीण क्षेत्रों में ही नहीं, बड़े-बड़े शहरों में भी हिन्दी माध्यम के प्राथमिक-माध्यमिक विद्यालयों (अधिकतर सरकारी) की देख-रेख, शिक्षा-व्यवस्था, अध्यापकों की उपस्थिति आदि इस तरह अव्यवस्थित होती है कि कोई भी सजग नागरिक अपने बच्चों को या तो वहाँ भेजना नहीं चाहता या विवशता में भेजता है | जहाँ तक उच्च स्तर पर विज्ञान, प्रोद्योगिकी, कृषि, चिकित्सा, वाणिज्य आदि विषयों के माध्यम की बात है, तो अभी तक अंग्रेजी माध्यम में ही श्रेष्ठतर मानी जाती है | साधारण परिवार के हिन्दी भाषी छात्रों की बेहद माँग पर उच्च शिक्षा में हिन्दी माध्यम का क्रियान्वयन अन्तर-राष्ट्रीयता व आधुनिकता के छठें दशक से चालू कृत्रिम-राजनीतिक मिथक के कारण प्रभावशाली नहीं हो पा रहा है | इस देश में जर्मन, फ़्रांसीसी, अरबी जैसी भाषाओँ के अनुप्रयोग की संभावनाओं की तलाश की जाए तो बात समझ आती है, किन्तु 98 प्रतिशत भारतीय भाषा-भाषियों (जिनकी कि एक अत्यन्त लोकप्रिय, सशक्त सम्पर्क भाषा है और वह भाषा हिन्दी ही है) के बीच हिन्दी के अनुप्रयोग की संभावनाएँ तलाशना एक ओछे मज़ाक की तरह हृदय को बेध जाता है, पर इस विडम्बना का सच यहाँ कार्यालयों, संस्थानों, हाट-बाजारों आदि में पूरी तरह व्याप्त है | एक छोटी-सी बानगी एवं बड़ा स्पष्ट उदाहरण कि जब लखनऊ, पटना, जयपुर, दिल्ली-जैसे बड़े शहरों में ही नहीं छोटे-छोटे कसबों में भी हिन्दी में टाइपिंग के लिए भटकना पड़ता है, जबकि अंग्रेजी के टाइपिस्ट आसानी से मिल जाते हैं और इतना ही नहीं, हिन्दी की टाइपिंग अंग्रेजी के मुकाबले काफी मँहगी भी पड़ती है, तब लगता है कि हम हिन्दुस्तान में नहीं, इंग्लैण्ड में जी रहे हैं| याद आतें हैं ऐतिहासिक मानव-रीढ़ के धनी व्यक्तित्व तुर्की के राष्ट्रपति कमालपाशा, जिन्होंने सारे तर्क-वितर्क और राष्ट्रीय बहस के बाद यह निर्णय देने में देर नहीं लगाई कि हमारे देश की राष्ट्रभाषा तुर्की होगी और उसे आज ही आधी रात से लागू किया जाता है, किन्तु हमारे यहाँ पहले तो सदियों से जातीय वर्गवाद के आधार पर निस्सहाय जनता का शोषण किया जाता रहा और अब स्वतंत्रता के बाद से भाषाई वर्गवाद के सहारे बमुश्किल 2 प्रतिशत अंग्रेजीदाँ लोग 98 प्रतिशत भारतीय भाषा-भाषी जनता का शोषण करने पर उतारू हैं | इसलिए सच्चे मन से महात्मा कबीर की इस वाणी पर कान देने की ज़रूरत है कि “मोको कहाँ ढूढे बन्दे, मैं तो तेरे पास में |” वस्तुतः हिन्दी अनुप्रयोग की सारी संभावनाओं का केन्द्रक भारतीय संविधान में निहित है, जहाँ राष्ट्रभाषा-राजभाषा–सम्बन्धी अनुच्छेदों में इस संशोधन की अपेक्षा है कि अब से भारत संघ की राष्ट्रभाषा-राजभाषा हिन्दी होगी (अंग्रेजी को आज से जर्मन, फ्रांसीसी, अरबी आदि की अंतर-राष्ट्रीय विज़न की विदेशी भाषा श्रेणी में रखा जाता है) | राज्यों में उनकी अपनी भाषा जैसे कि तमिलनाडु में तमिल राजभाषा होगी तथा संघ व राज्यों की सम्पर्क भाषा हिन्दी होगी | फिर तकनीकी माध्यम ही नहीं देश भर में रोजी-रोटी से लेकर चोटी तक के सारे-के-सारे माध्यम-अमाध्यम रातोंरात हिन्दी का स्वर अलापने लगेंगे | रही अंतर-राष्ट्रीय सम्पर्क की बात, तो विश्व के अनेक महत्त्वशाली राष्ट्र हैं, उनकी भाषाएँ हैं, हमें उन सब को महत्त्व देना होगा और इसके लिए विद्यालय-विश्वविद्यालय स्तर पर हमारे यहाँ व्यवस्था है और अगर कम है, तो व्यवस्था बढ़ाई जा सकती है | हमारे यहाँ जागरूक शिक्षार्थियों की कमी नहीं है और अगर कमी है, तो जागरूकता भी बढ़ाई जा सकती है | अंतर-राष्ट्रीय स्तर पर रोजी-रोटी कमाने की इच्छा, अधिक अर्जन का दबाव, अनेक भाषाओँ में दिलचस्पी आदि ऐसे तमाम कारण हैं कि हमारे यहाँ अंतर-राष्ट्रीय सम्पर्क के लिए विदेशी भाषाओँ के जानकर नागरिकों की कमी कभी नहीं पड़ेगी | ऐसा होने से इस देश का नागरिक उस भाषा में काम कर सकेगा, जिसमें वह पैदा होता है, पलता-बढ़ता है और मृत्युपर्यंत सचेत-सक्रिय जीना चाहता है | फिर एक अरब से अधिक जनसंख्या वाला यह देश ज्ञान-विज्ञान-परिज्ञान के क्षेत्र में निश्चित ही बड़ी-बड़ी मिसालें कायम करने में सक्षम होगा | और फिर भविष्य में नवीन आविष्कारों-उपलब्धियों के भारतीय भाषाओँ में भी रखे गए तमाम नाम सुनाई देने लगेंगे | किन्तु इस तथ्य को हमारे अंग्रेजीदाँ कूटनीतज्ञ निहित स्वार्थों के कारण समझना नहीं चाहते | वे तो हमारे देश की अधिसंख्य जनता की भाषिक चेतना मारकर उसे निश्चेत और निष्क्रिय जीने को बाध्य करते हैं| जहाँ तक हिन्दी मान्यता की बात है तो वह 10 वीं शताब्दी से लेकर आज तक सर्वाधिक लचीली-सुलभ तथा चतुर्मुखी भाषा है | वह हर दृष्टि से राष्ट्रीय मंच के उपयुक्त है | यहाँ हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि अमेरिका सहित दुनिया के सभी विकसित देश अपनी चेतना को अपनी ही वाणी में रूपाकार देकर उन्नति के शिखर पर पहुँचे हैं | साथ ही यह भी कि चीन, जापान, फ़्रांस, जर्मनी-जैसे विकसित देशों की भाषा कभी भी अंग्रेजी नहीं रही और न ही वे अंग्रेजी के वर्चस्व से भयभीत हुए | उनकी भाषाओँ की अपेक्षा वैज्ञानिक तथा तकनीकी माध्यमों में हिन्दी अनुप्रयोग की तो और अधिक संभावनाएँ हैं | अंतत: वर्तमान और भविष्य दोनों दृष्टियों से “तकनीकी माध्यमों में हिन्दी अनुप्रयोग की संभावनाएँ” एक ऐसा मर्म है, जिसे हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओँ के पद, प्रतिष्ठा, व्यावहारिकता आदि के सन्दर्भ में कुरेदा जाना जितना सामयिक है, उतना ही समय रहते सावधान करने जैसा है | प्राचीन काल में संचार-तंत्र और तकनीकी माध्यम जब इतने सशक्त नहीं थे, तब भाषा की मान्यता का मापदण्ड बोल-चाल, लोकाभिव्यक्ति, साहित्य, शिलालेख, पाण्डुलिपियाँ आदि होती थीं, किन्तु आज आधुनिक संचार-तंत्र एवं तकनीकी माध्यम इतने सशक्त हैं कि उनमें अधिकाधिक अनुप्रयुक्त हुए बिना कोई भाषा मान्यता, लोकाप्रियता तथा राष्ट्रीयता के शिखर पर प्रतिष्ठापित नहीं हो सकती | अन्यथा इस देश की भाषाओँ के समानान्तरीय-द्विमार्गी होने का अभिशप्त खतरा और बढ़ता जाएगा— बोल-चाल में भारतीय भाषाएँ और राज-काज, काम-काज, लेख-बाँच आदि में अंग्रेजी |जिससे राष्ट्र अधभाषी, अधचेता, अर्ध-साक्षर और अर्धांग-अपंग होता जाएगा | दुर्भाग्य ! कि जिस पर मुक़दमा चलेगा या चलाया जाएगा, वह समझ नहीं पायेगा कि हमारे बारे में क्या कहा जा रहा है या क्या बहस हो रही है और जो बहस करेगा या निर्णय सुनाएगा, वह फरियादी के लिए नहीं, अपनी स्वार्थी अंग्रेजीदाँ हठधर्मिता के लिए, एक विकृत राष्ट्रीय कूटनीति के लिए | और इसलिए जब हिन्दी अथवा अन्य भारतीय भाषा-भाषी उपभोक्ता चाहे-अनचाहे अंग्रेजी के प्रभाव से मुक्त नहीं हो पा रहे हैं, उलटे हमारी अभिव्यक्तियाँ अब अंग्रेजी मिश्रित भाषा (हिंगलिश आदि) के अगले पायदानों पर कदम बढ़ा चुकी हैं, तो निश्चित ही तकनीकी माध्यमों में हिन्दी अनुप्रयोग की सारी संभावनाएँ भविष्य में कहीं भ्रूण, कहीं शैशव, कहीं बाल, कहीं यौवन की अवस्था में मृत्यु की घड़ियाँ गिनने को अभिशप्त हैं| इस शताब्दी की शतायु तथा अगली शताब्दियों की दीर्घायु तक कौन कितना बच पाएँगी कहना कठिन है | -- संतलाल करुण

के द्वारा: Santlal Karun Santlal Karun

हिन्दी दिवस पर विशेष : मान-अपमान के साथ जीती आ रही हिन्दी हिन्दी राष्ट्र भाषा है , केन्द्र और कई राज्यों की राजभाषा है , समस्त भारत तथा विदेशों में रह रहे भारतीयों की सम्पर्क भाषा है | इसका साहित्य और लोक-साहित्य अत्यंत समृद्ध है |इसका खड़ीबोली रूप और देवनागरी लिपि मानक हैं | आधुनिक भारतीय भाषाओं में सर्वाधिक लोकप्रिय है | व्यवहार की दृष्टि से बहुत लचीली है | लगभग एक हजार वर्षों का इसका अपना इतिहास है | स्वतंत्रता-संग्राम में हिन्दी ही आंदोलन और सम्पर्क की प्रमुख भाषा रही | गांधी-सुभाष जैसे स्वतंत्रता- सेनानी इसे राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में आत्मिक रूप से पसंद करते थे | खुशरो से भारतेंदु और उनके परवर्ती नामचीनों तक इसके साहित्यकारों की अत्यन्त लंबी तथा गौरवशाली परम्परा है | फिर भी हिन्दी आज़ादी मिलते ही बाएँ हाथ की तरह दोयम दर्जे की, किन्हीं मामलों में त्याज्य, किन्ही मामलों में बड़े काम की बनकर रह गयी है | कहाँ इसकी पीठ पर थपथपी देकर गले में "जयमाल" डाला जाना है, कहाँ इसका "इस्तेमाल" किया जाना है और कहाँ इसका "एनकाउंटर" कर देना है -- यह हमारे देश की शातिर कूटनीति तय करती रही है | किन्तु तब भी मान-अपमान के साथ हिन्दी आज़ादी के बाद से ही नहीं, अंग्रेजों के शासनकाल से ही बड़े जीवट से जीती आ रही है | -- संतलाल करुण

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                    हिन्दी दिवस पर विशेष : मान-अपमान के साथ जीती आ रही हिन्दी हिन्दी राष्ट्र भाषा है , केन्द्र और कई राज्यों की राजभाषा है , समस्त भारत तथा विदेशों में रह रहे भारतीयों की सम्पर्क भाषा है | इसका साहित्य और लोक-साहित्य अत्यंत समृद्ध है |इसका खड़ीबोली रूप और देवनागरी लिपि मानक हैं | आधुनिक भारतीय भाषाओं में सर्वाधिक लोकप्रिय है | व्यवहार की दृष्टि से बहुत लचीली है | लगभग एक हजार वर्षों का इसका अपना इतिहास है | स्वतंत्रता-संग्राम में हिन्दी ही आंदोलन और सम्पर्क की प्रमुख भाषा रही | गांधी-सुभाष जैसे स्वतंत्रता- सेनानी इसे राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में आत्मिक रूप से पसंद करते थे | खुशरो से भारतेंदु और उनके परवर्ती नामचीनों तक इसके साहित्यकारों की अत्यन्त लंबी तथा गौरवशाली परम्परा है | फिर भी हिन्दी आज़ादी मिलते ही बाएँ हाथ की तरह दोयम दर्जे की, किन्हीं मामलों में त्याज्य, किन्ही मामलों में बड़े काम की बनकर रह गयी है | कहाँ इसकी पीठ पर थपथपी देकर गले में "जयमाल" डाला जाना है, कहाँ इसका "इस्तेमाल" किया जाना है और कहाँ इसका "एनकाउंटर" कर देना है -- यह हमारे देश की शातिर कूटनीति तय करती रही है | किन्तु तब भी मान-अपमान के साथ हिन्दी आज़ादी के बाद से ही नहीं, अंग्रेजों के शासनकाल से ही बड़े जीवट से जीती आ रही है | -- संतलाल करुण

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14 सितम्बर – हिंदी का सम्मान या श्रद्धांजलि अंग्रेजी शासनव्यवस्था में शारीरिक और मानसिक हर तरह से हमने जो गुलामी सही है आज भले ही वह दृष्टिगत नहीं हो परन्तु भाषाई गुलामी आज भी यथावत बरकरार है. कुछ समय पूर्व मैंने कैरियर बनाने के ऊपर हिंदी भाषा की एक पत्रिका में एक लेख पढ़ा था जिसका शीर्षक था “अंग्रेजी भाषा, तरक्की की परिभाषा”. यद्यपि वर्तमान परिदृश्य में लेख को लिखने वाला गलत नहीं था फिर भी मैं हिंदी भाषा की पत्रिका में अंग्रेजी की ऐसी तारीफ़ बर्दाश्त नहीं कर सकती थी. अतः मुझसे रहा नहीं गया और मैंने पत्रिका के संपादक के नाम एक पत्र भेजा. मुझे मालूम था कि कोई जवाब नहीं आएगा फिर भी मैं कुछ प्रतिशत ही सही संतुष्ट थी. क्यों? क्योंकि हर साल दशहरा मनाते वक्त सांकेतिक रावण जलाकर भी तो हम खुश होते हैं, उससे कौन सा भ्रष्टाचार और अधर्म मिट जाता है लेकिन फिर भी हम मनाते हैं. वैसे जब आज़ादी की पूर्व संध्या पर नेहरू एक तरफ पावर ऑफ अग्रीमेंट पर हस्ताक्षर कर रहे होंगे तो उस समय भी आजादी के मतवालों की आत्मा अवश्य संकल्पित रही होगी कि समय आने पर देश को भाषाई आजादी भी दिलानी है परन्तु राज बदलते ही वह संकल्पना केवल कल्पनाओं में ही सिमट कर रह गयी क्योंकि नीतियों का निर्धारण करने की शक्ति रखने वाले, उनको अमली जामा पहनाने के लिए जिम्मेदार लोग अंग्रेजी का मतलब जानते थे. उनको पता था कि इस भाषा में इतनी प्रबलता है कि राज करने के लिए इससे बेहतर कोई दूसरी शब्दावली हो ही नहीं सकती. बड़ी से बड़ी गलती करके SORRY बोल दो और बड़े से बड़ा काम करवाकर THANK YOU बोल दो. बाद में सब भूल जाओ. शायद इसीलिए अंग्रेज स्वयं तो चले गए और विरासत में अंग्रेजी को हमारा ध्यान रखने के लिए छोड़ गए. परिणामस्वरूप जब अंग्रेजों की सत्ता बदली और भारतीय राज शुरू हुआ तब भी व्यवस्थाएं नहीं बदलीं जा सकीं जो कुछ जैसा था जैसा चल रहा था सब उसी प्रकार चलता रहा. नयी-नयी सत्ता का स्वाद चखने वाले लोगों में से भी कुछ लोगों ने भी इसीलिए आजाद भारत के जन्म के साथ ही जिस भाषा को सीखा उसे ही अपनी मातृभाषा की तरह सिर्फ मान ही नहीं लिया बल्कि उसे राजनीतिक प्यार, आदर और सम्मान भी दिया और आम आदमी को भी यह मनवा दिया गया कि अब अंग्रेजी ही उसकी सामाजिक और भाषाई पहचान होगी. यहाँ तक कि न्याय भी उसको अंग्रेजी में ही मिला करेगी. हो सकता है वह समय की मांग रही हो या उस समय के नेताओं की जान बूझकर की गयी भूल रही हो या फिर अचानक बड़े परिवर्तन के लिए देश की मानसिकता ही तैयार नहीं रही हो परन्तु धीरे-धीरे वह सब कुछ हमारे अंदर इतना घुल मिल गया कि हम उन्हीं अंग्रेजी व्यवस्थाओं को अपनी व्यवस्थाएं मान बैठे और उसी में अपना भविष्य ढूंढते रहे.. शिक्षा व्यवस्था, चिकित्सा व्यवस्था, क़ानून व्यवस्था, अर्थ व्यवस्था और कृषि व्यवस्था सब कुछ अंग्रेजी तौर-तरीकों, नियमों एवं कानूनों के साथ आज़ादी के बाद जस के तस स्वीकार कर लिया हमने. परिकल्पना रही होगी कि आज़ादी के बाद एक बार पुनः भारत अपना तंत्र बनाएगा और अपने बनाये तंत्र यानि स्व तंत्र पर चल सकेगा साथ ही आजाद भारत के हमारे नेता देश में सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक शिक्षण आदि क्षेत्रों में भारत के मूलभूत चिंतन के आधार पर भारत का पुनर्निर्माण कर विकास का एक अनूठा नमूना पूरे विश्व के सामने पेश कर सकेंगे. उस समय इस दिशा में कुछ प्रयास दिखे भी मसलन तत्कालीन गृह मंत्री सरदार बल्लभ भाई पटेल ने रातों रात वो कर दिखाया जो आज के हमारे नेता सोच भी नहीं सकते क्योंकि उनके लिए तो आजतक कश्मीर मुद्दा ही चुनौती बना हुआ है जिसे शायद कभी हल नहीं कर पाएंगे. इतिहास के पन्नों में मैंने पढ़ा है कि मैकाले ने वर्ष 1835 में ही कहा था- “we must do our best to form a class who may be interpreters between us and the millions whom we given; a class of persons, Indian in blood and colour, but English in taste, in opinions, in words and in intellect” अर्थात, मैकाले मानता था की “भारत में लागू की गयी अंग्रेजी शिक्षा पद्धति से पढकर निकलने बाले विद्यार्थी रूप, रंग, खून व शरीर से भारतीय और विचार, आचरण, मान्यताओं व आत्मा से अंग्रेज होंगे. 1835 में मैकाले ने अपनी शिक्षा नीति की घोषणा की थी जिसे भारत के तत्कालीन गर्वनर जनरल विलियम बैंटिक ने लागू किया था और तभी से अंग्रेजी ने हिंदी को भी गुलामी के जीवन में धकेल दिया. मैकाले ने बहुत ही सूझ-बूझ के बाद यह निर्णय लिया था और उसे पता था कि अंग्रेजी भाषा अपनाकर हम भारतीय अपने गौरव को आसानी से भूल पाएंगे. दाद देनी पड़ेगी उसके दूर दृष्टि की, आज भी जिस तरह से हम अंग्रेजी ज़माने में बने स्मारकों और स्थलों को सहेजे हुए है और उन्हें नुक्सान पहुँचाने का अर्थ है जेल की हवा और अर्थ दंड की सज़ा उसी प्रकार अंग्रेजी नहीं आने का अर्थ है सामाजिक बहिष्कार की सज़ा और साथ ही मानसिक प्रताडना. देश के किसी भी ऊँचे पद पर बैठने के लिए अंग्रेजी का ज्ञान आवश्यक हो गया है. सामान्यतया आज हिंदी या फिर अपनी मातृभाषा में पढ़ा एक बच्चा रोजी-रोटी का जुगाड तो कर सकता है लेकिन किसी उच्च पद पर आसीन नहीं हो सकता है. यद्यपि अक्सर श्री ए.पी.जे. अब्दुल कलाम का कथन कि उनकी पढ़ाई मातृभाषा में हुई थी इसीलिए वे इतने महान वैज्ञानिक बन सके’ कई स्थानों पर दोहराया जाता है पर कितनों को यह सौभाग्य प्राप्त है.. एक उदाहरण आजकल चीन के बारे में दिया जा रहा है कि चीन में भी हर जगह लोग अंग्रेजी बोलना सीख रहे हैं लेकिन यहां पर कोई हमें यह नहीं बताता कि चीन ने समान स्कूल व्यवस्था भी लागू कर ली है और वहां कुछ विशिष्ट स्कूलों में प्रवेश के लिए जद्दो-जहद नहीं करनी पड़ती है यही नहीं चीन में प्रारंभिक शिक्षा मातृभाषा में ही दी जाती है और ऐसा नहीं करने वालों पर बच्चों के साथ मानसिक क्रूरता का अपराध भी लगाया जाता है. शारीरिक गुलामी से निजात दिलाने के लिए तो बहुतों ने बलिदान दिया था पर भाषाई गुलामी का नुक्सान हम समझ ही नहीं पाए, सरकारी तंत्र भी चौदह सितम्बर को कोरम पूरा करने के लिए एक दिवसीय प्रयास करते हैं पर इस दिन हिंदी को श्रद्धांजलि दी जाती है या फिर सम्मान, मेरी समझ से परे है. वंदना बरनवाल

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हिन्दी दिवस 14 सितम्बर’ 12 पर :                                          तकनीकी माध्यमों में हिंदी अनुप्रयोग की संभावनाएँ                      -- संतलाल करुण वैसे तो स्वतंत्रता-प्राप्ति के 65 वर्षों के उपरान्त आज के अत्याधुनिक तकनीकी माध्यमों में “हिंदी अनुप्रयोग की सामयिक आवश्यकता” की जगह संभावनाओं की तलाश राष्ट्रभाषा के प्रति हमारे दृष्टिकोण का हल्कापन ही प्रकट करता है, पर है यह विषय इतना प्रासंगिक कि राष्ट्रभाषा की घटती व्यावहारिक महत्ता और अंग्रेजी की दिन-पर-दिन बढ़ती सत्ता के तथ्यों को काफी कुछ उजागर करने में हमारी मदद करता है | विभिन्न तकनीकी माध्यमों में हिंदी-अनुप्रयोग की संभावनाओं पर विचार करते समय पहले हमें यह देखना होगा कि इन माध्यमों में कैसी भाषिक चेतना वाले लोगों की (भारतीय अथवा अंग्रेजीदाँ) पूँजी लगती है, कैसी भाषिक चेतना वाले लोगों द्वारा ये संचालित होते हैं और कैसी भाषिक चेतना वाले लोगों के लिए ये माध्यम कार्य करते हैं | दूसरे यह कि भारतीय अर्थ-व्यवस्था, बाजार, शासन-प्रशासन, विज्ञान-प्रौद्योगिकी, कृषि, चिकित्सा, वाणिज्य आदि के क्षेत्रों में दिनोंदिन अंग्रेजी के बढ़ते दबदबे और परिणाम स्वरूप भारतीय जनमानस पर पड़ते उसके मनोवैज्ञानिक प्रभाव के विभिन्न पहलुओं को समझे बिना तकनीकी माध्यमों में हिंदी अनुप्रयोग की संभावनाओं को ठीक-ठीक नहीं समझा जा सकता है | तकनीकी माध्यमों से जुड़े जिस वर्ग-त्रयी का उल्लेख किया गया, उसमें पहला वर्ग पूँजीपतियों का है, जिसका झुकाव अंग्रेजों के शासन-काल से ही अंग्रेजी की ओर है | अपवाद रूप में इस वर्ग के कुछ सच्चे राष्ट्रभक्तों और हिंदी प्रेमियों को छोड़कर बाकियों की अंग्रेजी-मानसिकता के कारण (अन्य अनेक कारण भी हैं) हिन्दी आज तक राष्ट्रभाषा का वास्तविक स्थान नहीं पा सकी | यह वर्ग बोलचाल में हिंदी अथवा अन्य भारतीय भाषाओं का प्रयोग तो करता है, किन्तु लिखने-पढ़ने में इसकी भाषिक क्षमता अंग्रेजी में पाई जाती है, हिंदी में प्राय: नहीं | इस वर्ग की भावी पीढ़ियाँ माँग-पूर्ति के इस व्यावसायिक जगत में हिंदी अथवा अन्य भारतीय भाषा-भाषी जनता की क्रय-शक्ति के चलते बोलचाल में “हिंग्लिस” का प्रयोग तो अभी कुछ दशकों तक करती रहेगीं, किन्तु लिखने-पढ़ने में उनके द्वारा हिंदी के तिरस्कार की प्रबल संभावना है | दूसरा वर्ग, मध्यस्थों का है, जो सीधे तकनीकों से जुड़े होते हैं | इस वर्ग में मीडिया-कर्मी, ज्ञान-विज्ञान, प्रौद्योगिकी, शिक्षा, चिकित्सा, कृषि, सिनेमा आदि क्षेत्रों के तकनीशियन, विशेषज्ञ, भाषाविद, कलाकार, चित्रकार आदि आतें हैं | इनकी वृत्ति ‘सेवा और अर्जन’ पर टिकी होती है | इस वर्ग के अधिकांश लोग मन से न सही, किन्तु रोजी-रोटी के गहराते संकट और बढ़ती आवश्यकताओं के कारण अंग्रेजी से प्रभावित हैं | भारतीयता में अपने पाँव टिकाये रखने के लिए ये लोग द्विभाषिता-बहुभाषिता की क्षमता अपनाकर सक्रिय हैं | उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध तक हमारे देश के अधिकांश क्षेत्रों में अंग्रेजी छठीं कक्षा से पढ़ाई जाती थी, किन्तु आज इनके बच्चे नर्सरी से ही अंग्रेजी माध्यम के पाठ्यक्रमों से शिक्षा पा रहे हैं | ऐसे में इनकी आगामी पीढ़ी से अपवादों को छोड़कर हिंदी अथवा भारतीय भाषाओँ के प्रति आत्मीयता की आशा करना व्यर्थ है | रहा तीसरा वर्ग, जो आम नागरिकों का वर्ग है और जिसमें तरह-तरह के लोग आते हैं – शिक्षित-अशिक्षित, सरकारी-अर्धसरकारी-गैर सरकारी वेतनभोगी, किसान-मजदूर, भिन्न-भिन्न काम-धंधों से जुड़े गाँव और शहर के लोग, उच्च-मध्य-निम्न वर्गीय इत्यादि | यह भाँति-भाँति लोगों का भाँति-भाँति के वातावरण और ज़मीन से जुड़ा वर्ग है और मोबाइल फोन, लैपटॉप, पामटॉप आदि उन की भी पहुँच के दायरे में हैं | सामान्यतया अभी तक यह वर्ग हिंदी अनुप्रयोग के लिए अपने मन-मस्तिष्क का द्वार खोले हुए है, किन्तु इसकी दृष्टि उन्हीं पूँजीपतियों, राजनेताओं, नौकरशाहों, फ़िल्म और खेल जगत के सितारों आदि पर लगी हुई है, जिनकी जीवन-शैली प्राय: पाश्चात्य चकाचौंध और अंग्रेजियत से प्रभावित है | गौर करने लायक तो यह है कि पूर्णतया भारतीय भाषा-भाषी मानस रखते हुए इस वर्ग के लोग भी अपनी संतानों को लेकर अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों की ओर रुख किए हुए हैं और जो किन्हीं कारणों से नहीं किए हुए हैं, वे भी ऐसे स्कूलों के पक्ष में उत्साहित हैं | ग्रामीण क्षेत्र के कृषक-मजदूर या तो उस तरह का विद्यालयीय वातावरण नहीं पाते या फिर उनकी आय अंग्रेजी माध्यम के पब्लिक स्कूलों का खर्च वहन करने में असमर्थ है | किन्तु उनकी समझ में भी यह तथ्य घर करता जा रहा है कि यदि हमें अपने बच्चों का भविष्य सुनहरा बनाना है तो हिंदी माध्यम से काम नहीं चलेगा | इसी प्रकार यदि शासन के आधार पर देखा जाए तो 2 वर्ग सामने आते हैं-– शासक वर्ग और शासित वर्ग | प्राय: शासक वर्ग वरिष्ठ और आदर्श माना जाता है | यही कारण है कि शासित वर्ग शासक वर्ग के पहनावे, रहन-सहन, खान-पान, बोली-भाषा आदि का अनुकरण करना चाहता है | दुर्भाग्य से स्वतंत्रता प्राप्ति के 65 वर्षों के उपरान्त भी शासक वर्ग की भाषिक क्षमता पर अंग्रेजी का नशा (कुछ राज्य सरकारों और अधिकतर उनके निम्न श्रेणी लिपिकीय काम-काज को छोड़कर) चढ़ा हुआ है, जिसे शासित वर्ग ललक भरी निगाह से देखता है और शासक वर्ग की तरह वह भी चाहता है कि अंग्रेजी उसके सर चढ़ कर बोले | यही कारण है कि देश भर में अंग्रेजी माध्यम के पब्लिक स्कूलों की संख्या तेजी से बढ़ रही है| दूसरी ओर ग्रामीण क्षेत्रों में ही नहीं, बड़े-बड़े शहरों में भी हिन्दी माध्यम के प्राथमिक-माध्यमिक विद्यालयों (अधिकतर सरकारी) की देख-रेख, शिक्षा-व्यवस्था, अध्यापकों की उपस्थिति आदि इस तरह अव्यवस्थित होती है कि कोई भी सजग नागरिक अपने बच्चों को या तो वहाँ भेजना नहीं चाहता या विवशता में भेजता है | जहाँ तक उच्च स्तर पर विज्ञान, प्रोद्योगिकी, कृषि, चिकित्सा, वाणिज्य आदि विषयों के माध्यम की बात है, तो अभी तक अंग्रेजी माध्यम में ही श्रेष्ठतर मानी जाती है | साधारण परिवार के हिन्दी भाषी छात्रों की बेहद माँग पर उच्च शिक्षा में हिन्दी माध्यम का क्रियान्वयन अन्तर-राष्ट्रीयता व आधुनिकता के छठें दशक से चालू कृत्रिम-राजनीतिक मिथक के कारण प्रभावशाली नहीं हो पा रहा है | इस देश में जर्मन, फ़्रांसीसी, अरबी जैसी भाषाओँ के अनुप्रयोग की संभावनाओं की तलाश की जाए तो बात समझ आती है, किन्तु 98 प्रतिशत भारतीय भाषा-भाषियों (जिनकी कि एक अत्यन्त लोकप्रिय, सशक्त सम्पर्क भाषा है और वह भाषा हिन्दी ही है) के बीच हिन्दी के अनुप्रयोग की संभावनाएँ तलाशना एक ओछे मज़ाक की तरह हृदय को बेध जाता है, पर इस विडम्बना का सच यहाँ कार्यालयों, संस्थानों, हाट-बाजारों आदि में पूरी तरह व्याप्त है | एक छोटी-सी बानगी एवं बड़ा स्पष्ट उदाहरण कि जब लखनऊ, पटना, जयपुर, दिल्ली-जैसे बड़े शहरों में ही नहीं छोटे-छोटे कसबों में भी हिन्दी में टाइपिंग के लिए भटकना पड़ता है, जबकि अंग्रेजी के टाइपिस्ट आसानी से मिल जाते हैं और इतना ही नहीं, हिन्दी की टाइपिंग अंग्रेजी के मुकाबले काफी मँहगी भी पड़ती है, तब लगता है कि हम हिन्दुस्तान में नहीं, इंग्लैण्ड में जी रहे हैं| याद आतें हैं ऐतिहासिक मानव-रीढ़ के धनी व्यक्तित्व तुर्की के राष्ट्रपति कमालपाशा, जिन्होंने सारे तर्क-वितर्क और राष्ट्रीय बहस के बाद यह निर्णय देने में देर नहीं लगाई कि हमारे देश की राष्ट्रभाषा तुर्की होगी और उसे आज ही आधी रात से लागू किया जाता है, किन्तु हमारे यहाँ पहले तो सदियों से जातीय वर्गवाद के आधार पर निस्सहाय जनता का शोषण किया जाता रहा और अब स्वतंत्रता के बाद से भाषाई वर्गवाद के सहारे बमुश्किल 2 प्रतिशत अंग्रेजीदाँ लोग 98 प्रतिशत भारतीय भाषा-भाषी जनता का शोषण करने पर उतारू हैं | इसलिए सच्चे मन से महात्मा कबीर की इस वाणी पर कान देने की ज़रूरत है कि “मोको कहाँ ढूढे बन्दे, मैं तो तेरे पास में |” वस्तुतः हिन्दी अनुप्रयोग की सारी संभावनाओं का केन्द्रक भारतीय संविधान में निहित है, जहाँ राष्ट्रभाषा-राजभाषा–सम्बन्धी अनुच्छेदों में इस संशोधन की अपेक्षा है कि अब से भारत संघ की राष्ट्रभाषा-राजभाषा हिन्दी होगी (अंग्रेजी को आज से जर्मन, फ्रांसीसी, अरबी आदि की अंतर-राष्ट्रीय विज़न की विदेशी भाषा श्रेणी में रखा जाता है) | राज्यों में उनकी अपनी भाषा जैसे कि तमिलनाडु में तमिल राजभाषा होगी तथा संघ व राज्यों की सम्पर्क भाषा हिन्दी होगी | फिर तकनीकी माध्यम ही नहीं देश भर में रोजी-रोटी से लेकर चोटी तक के सारे-के-सारे माध्यम-अमाध्यम रातोंरात हिन्दी का स्वर अलापने लगेंगे | रही अंतर-राष्ट्रीय सम्पर्क की बात, तो विश्व के अनेक महत्त्वशाली राष्ट्र हैं, उनकी भाषाएँ हैं, हमें उन सब को महत्त्व देना होगा और इसके लिए विद्यालय-विश्वविद्यालय स्तर पर हमारे यहाँ व्यवस्था है और अगर कम है, तो व्यवस्था बढ़ाई जा सकती है | हमारे यहाँ जागरूक शिक्षार्थियों की कमी नहीं है और अगर कमी है, तो जागरूकता भी बढ़ाई जा सकती है | अंतर-राष्ट्रीय स्तर पर रोजी-रोटी कमाने की इच्छा, अधिक अर्जन का दबाव, अनेक भाषाओँ में दिलचस्पी आदि ऐसे तमाम कारण हैं कि हमारे यहाँ अंतर-राष्ट्रीय सम्पर्क के लिए विदेशी भाषाओँ के जानकर नागरिकों की कमी कभी नहीं पड़ेगी | ऐसा होने से इस देश का नागरिक उस भाषा में काम कर सकेगा, जिसमें वह पैदा होता है, पलता-बढ़ता है और मृत्युपर्यंत सचेत-सक्रिय जीना चाहता है | फिर एक अरब से अधिक जनसंख्या वाला यह देश ज्ञान-विज्ञान-परिज्ञान के क्षेत्र में निश्चित ही बड़ी-बड़ी मिसालें कायम करने में सक्षम होगा | और फिर भविष्य में नवीन आविष्कारों-उपलब्धियों के भारतीय भाषाओँ में भी रखे गए तमाम नाम सुनाई देने लगेंगे | किन्तु इस तथ्य को हमारे अंग्रेजीदाँ कूटनीतज्ञ निहित स्वार्थों के कारण समझना नहीं चाहते | वे तो हमारे देश की अधिसंख्य जनता की भाषिक चेतना मारकर उसे निश्चेत और निष्क्रिय जीने को बाध्य करते हैं | जहाँ तक हिन्दी मान्यता की बात है तो वह 10 वीं शताब्दी से लेकर आज तक सर्वाधिक लचीली-सुलभ तथा चतुर्मुखी भाषा है | वह हर दृष्टि से राष्ट्रीय मंच के उपयुक्त है | यहाँ हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि अमेरिका सहित दुनिया के सभी विकसित देश अपनी चेतना को अपनी ही वाणी में रूपाकार देकर उन्नति के शिखर पर पहुँचे हैं | साथ ही यह भी कि चीन, जापान, फ़्रांस, जर्मनी-जैसे विकसित देशों की भाषा कभी भी अंग्रेजी नहीं रही और न ही वे अंग्रेजी के वर्चस्व से भयभीत हुए | उनकी भाषाओँ की अपेक्षा वैज्ञानिक तथा तकनीकी माध्यमों में हिन्दी अनुप्रयोग की तो और अधिक संभावनाएँ हैं | अंतत: वर्तमान और भविष्य दोनों दृष्टियों से “तकनीकी माध्यमों में हिन्दी अनुप्रयोग की संभावनाएँ” एक ऐसा मर्म है, जिसे हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओँ के पद, प्रतिष्ठा, व्यावहारिकता आदि के सन्दर्भ में कुरेदा जाना जितना सामयिक है, उतना ही समय रहते सावधान करने जैसा है | प्राचीन काल में संचार-तंत्र और तकनीकी माध्यम जब इतने सशक्त नहीं थे, तब भाषा की मान्यता का मापदण्ड बोल-चाल, लोकाभिव्यक्ति, साहित्य, शिलालेख, पाण्डुलिपियाँ आदि होती थीं, किन्तु आज आधुनिक संचार-तंत्र एवं तकनीकी माध्यम इतने सशक्त हैं कि उनमें अधिकाधिक अनुप्रयुक्त हुए बिना कोई भाषा मान्यता, लोकाप्रियता तथा राष्ट्रीयता के शिखर पर प्रतिष्ठापित नहीं हो सकती | अन्यथा इस देश की भाषाओँ के समानान्तरीय-द्विमार्गी होने का अभिशप्त खतरा और बढ़ता जाएगा— बोल-चाल में भारतीय भाषाएँ और राज-काज, काम-काज, लेख-बाँच आदि में अंग्रेजी |जिससे राष्ट्र अधभाषी, अधचेता, अर्ध-साक्षर और अर्धांग-अपंग होता जाएगा | दुर्भाग्य ! कि जिस पर मुक़दमा चलेगा या चलाया जाएगा, वह समझ नहीं पायेगा कि हमारे बारे में क्या कहा जा रहा है या क्या बहस हो रही है और जो बहस करेगा या निर्णय सुनाएगा, वह फरियादी के लिए नहीं, अपनी स्वार्थी अंग्रेजीदाँ हठधर्मिता के लिए, एक विकृत राष्ट्रीय कूटनीति के लिए | और इसलिए जब हिन्दी अथवा अन्य भारतीय भाषा-भाषी उपभोक्ता चाहे-अनचाहे अंग्रेजी के प्रभाव से मुक्त नहीं हो पा रहे हैं, उलटे हमारी अभिव्यक्तियाँ अब अंग्रेजी मिश्रित भाषा (हिंगलिश आदि) के अगले पायदानों पर कदम बढ़ा चुकी हैं, तो निश्चित ही तकनीकी माध्यमों में हिन्दी अनुप्रयोग की सारी संभावनाएँ भविष्य में कहीं भ्रूण, कहीं शैशव, कहीं बाल, कहीं यौवन की अवस्था में मृत्यु की घड़ियाँ गिनने को अभिशप्त हैं| इस शताब्दी की शतायु तथा अगली शताब्दियों की दीर्घायु तक कौन कितना बच पाएँगी कहना कठिन है |

के द्वारा: Santlal Karun Santlal Karun

14 सितंबर, 1949 को भारतीय संविधान सभा ने देवनागरी लिपि में लिखी गई हिंदी भाषा को अखण्ड भारत की प्रशासनिक भाषा के ओहदे से नवाजा था कहना ठीक नहीं है। इस दिन यह निश्चय किया गया था कि राज की भाषा अंग्रेजी के स्थान पर हिंदी बनाई जाएगी। इस निश्चय को जब लागू करने की बारी आई तो अंग्रेजीदा नेहरु की टोली ने वही किया जो कॉमन लॉ के नाम पर भारत में सामाजिक सुधार की बात कही गई थी लेकिन एक आध मुसलिम व ईसाई के विरोध को देखकर हिंदू कॉमन लॉ छोड़कर सब पर लागू कर किया था। अंग्रेजी जब तक जारी रहेगी जब तक सब राज्यों की विधानसभाएं इस संबंध में प्रस्ताव पास कर नहीं देंगी। जब कि यह शर्त किसी भी अन्य कानून के लागू न की गई थी। न 9 मन तेल होगा न राधा नाचेगी। अतः यह हिंदी दिवस न होकर राजभाषा दिवस ही है तथा राजभाषा विभागों को सरकारी आदेश पूरे करने के लिए यह दिन मनाना पड़ता है जैसे सद्भावना दिवस तथा अंबेडकर पुण्य तिथि मनानी होती है। विदेशी विशेष कर अंग्रेजी के शब्दों का मानकीकृत अनुवाद न होने से तथा उनका प्रचार तंत्र द्वारा प्रयोग न होने से अंग्रेजी के शब्द धीरे-धीरे हिंदी में समा गए हैं जिनके लिए छोटी-छोटी भाषाओं ने अपने शब्द प्रयोग में लिए हैं। राष्ट्र मंडल जैसा प्रचलित व सहज शब्द भी अंग्रेजीदा हिंदी टीवी मीडिया को पसंद नहीं आता तथा कॉमनवेल्थ गेम सी डब्ल्यू जी की रट लगा बैठा। इस तरह अंग्रेजी दा या 50 वर्ष पुराने फारसी अरबी के शब्दों के प्रयोग को सामान्य आदमी के नाम से प्रचारित करने का षड्यंत्र सरकारी तथा सांप्रदायिक वहाबी शक्तियां कर रही हैं। सरकार की स्थिति तो यह है कि यह नियम कश्मीर तथा तमिलनाडू में इन उपबंधों के साथ लागू न होंगे कहकर राजभाषा हिंदी का स्थान आज भी अंग्रेजी को दिया हुआ है। शासन तथा समाज में प्रभावशाली वर्ग आज भी अंग्रेजी को अंतर्राष्ट्रीयता के नाम से प्रचारित कर देशवासियों को गुमराह करता है तथा हिंदी की बात पर प्रदेशों की भाषा को लाने की बात कहकर संविधान तथा संसद के संकल्प की धज्जियां उड़ाता है। समाज में इन स्थितियों को देखते हुए तथा बढ़ते अंतर्राष्ट्रीय बहुदेशीय कंपनी प्रभाव के कारण कुकरमुत्तों की तरह "इंगलिश मीडियम स्कूल" खुल गए हैं जहां से न तो सही अंग्रेजी सीखने को मिलती है और न ही विद्यार्थी हिंदी का पर्याप्त ज्ञान ले पा रहे हैं। इस क्रियोलीकरण खेल में तकनीक पर हिंदी का बहुत देर से आना और भी रंग चोखा कर देता है। कंप्यूटर हो या मोबाइल, टेबलट या लैपटॉप हिंदी के विषय में कंपनियां की वितृष्णा साफ दिखाई देती है। आज तक माइक्रोसॉफ्ट ने हिंदी का मूल कीबोर्ड तक नहीं निकाला है जबकि विश्व की 56 भाषाओं में विंडोज एक्स पी के आने से पहले से यह उपलब्ध कराया गया है विंडोज 7 में पहली बार हिंदी के फोंट स्वतः यूनीकोड के पूर्व सक्षम बनाए गए थे। लाइनक्स में भी स्थिति कोई विशेष बेहतर नहीं है इंडियन में क्ष त्र ज्ञ सीधे टाइप नहीं होते इन दिनों आईबस में यह सुविधा दी गई है। भारत सरकार टाइप प्रशिक्षण रेमिंगटन टाइपराइटर आधारित देती है तथा इनस्क्रिप्ट को यूनीकोड में मान्य की बोर्ड बनाती है। चलन में सर्वाधिक प्रयोग गूगल तथा माइक्रोसॉफ्ट इंडिक टूल जो a से अ b से ब बनाते हैं का हो रहा है तथा कृतिदेव देव चाणक्य आज भी डॉक फाइलों के लिए चल रहे हैं जो यूनिकोड फोंट नहीं हैं। इसी प्रकार संसद में विधि विभाग में हिंदी अनुवादकों के विभिन्न स्तरों के पद खाली हैं तथा उच्च स्तरीय अनुवाद तथा मानकीकरण की व्यवस्था सरकार ने भी नहीं की है। इससे राज्यों तथा केंद्र सरकार के विभिन्न कार्यालयों में एक अंग्रेजी शब्द के विभिन्न रूप प्रचलन में आ गए हैं। हिंदी के उच्च स्तरीय साहित्य के तो हाल इस दशक में इतने बुरे हो गए हैं कि नए लेखकों के नाम पर 15 वर्ष पुराने लेखक को याद दिलाया जाता है। इसी तरह प्रकाशक भी आपूर्ति की पुस्तकें छाप कर या विदेशी चर्चित पुस्तकें हिंदी में अनुवाद कर अपने कर्त्तव्य की इतिश्री समझ लेता है। जहां पर हिंदी दिखाई देती है वहां पर सांस्कृतिक तत्व के स्थान पर स्थानीय मान्यताओं को हिंदू धर्म कहकर इस्लाम व ईसाईयत का प्रचार करने वाले कॉपी पेस्ट कर मुफ्त की साइटों पर हिंदी के नाम से भयंकर कचरा एकत्र कर चुके हैं जो खोज में सबसे पहले सामने आता है तथा आम जन की हिंदी के प्रति वितृष्णा को बढ़ाता है। हिंदी का प्रयोग जिस रूप में बढ़ा है वह हिंदी सिनेमा कहा जाता है जहां ध्यान रहे कि सर्वाधिक उच्च स्तरीय पत्रिकाएं व पुरस्कार अंग्रेजी वालों के दिए जाते हैं तथा अभिनेता-अभिनेत्रियां भी अंग्रेजी में साक्षात्कार देते व चमक दमक की तस्वीरें खिंचवाते दिखाई देते हैं। इस तरह दोयम स्तर की हिंदी का प्रचार आज हो रहा है तथा सरकार व तथाकथित हिंदी प्रेमी इसे उपलब्धि बनाते नजर आते हैं। भारत सरकार की हिंदी के प्रति यह नीति न तो अंग्रेजी को राजभाषा से कभी हटाएगी न हिंदी के सर्वांगीण विकास का सार्थक प्रयास होगा। सरकार से लाभान्वित एनजीओ इस कार्य में सरकार की सहायता करेंगे तथा क्षत्रप नेतृत्व राष्ट्रीयता का समावेश तथा व्यापक संपर्क भाषा को इस तरह विवादित कर देगा कि स्थानीय सत्ता स्तर पर भी यह निम्न कोटि की रहेगी। यदि हिंदी का विकास होगा तो वह किसी अन्य देश में होगा जहां संस्कृत की भी रक्षा होगी। यह विश्व की श्रेष्ठ भाषिक अभिव्यक्तियां हैं जो मनुष्य के भाव को बदलने में सक्षम हैं।

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यह क्या हो गया है ! यह हमारी ज़बान को क्या हो गया है कि इस पर से सजी-सँवरी धूप का विश्वाश उठ रहा है इससे सोंधी मिट्टी की आशा टूट रही है इस पर नक्षत्र चढ़ते कदम भरोसा नहीं करते इससे नई निगाहों को आगे राह नहीं दिखती | यह हमारी ज़बान को क्या हो गया है कि इसके रहते एक सफ़ेद मुँहचढ़ी ज़बान देश की अलिजिह्वा तक का रंग सफ़ेद डाइ की तरह बदल रही है वह शब्दों के तैलीय तरण-ताल में नहाकर गाँवों तक आधुनिकता की कुलाँचें मार रही है जगह-जगह भूमण्डलीकरण के कैम्प लगाकर सब की नसों में कोकीन डाल रही है और एक अरब लोगों की चेतना कोम्-आ में पहुँचाकर उसके खून-पसीने की सारी रंगत दुह रही है | यह हमारी ज़बान को क्या हो गया है कि इसके ऊपर एक तेज़ी से फैलनेवाली बहुत महीन असाध्य, परजीवी पर्त उग आई है जो दिनोंदिन और ढीठ होती जा रही है | सिर पर मंडरा रही है आँखों में धूल झोंक रही है कानों में कौड़ी डाल रही है होंठों पर थिरक रही है छाती पर मूँग दल रही है जो हाथों को धोखे से बाँध रही है पैरों पर कुल्हाड़ी चला रही है और जो विषकन्या की तरह हमारे देश के साथ अपघात कर रही है | यह हमारी ज़बान को क्या हो गया है कि केवल पन्द्रह वर्षों का झाँसा देनेवाली जैसे अब घर-बैठा बैठने पर तुल गयी है वह आज भी हमारी जीभ पर षड्यन्त्र का कच्चा जमींकंद पीस रही है हमारी सारी सोच-समझ हलक के गर्त में ढकेल खुद बाहर बेलगाम हो रही है जो हमारे मन की नहीं कहती हमारे मुख को नहीं खोलती हमारे चेहरे की नहीं लगती और जो आकाशबेल की तरह हमारे देश के मानसवृक्ष पर फैलती जा रही है | यह हमारी ज़बान को क्या हो गया है कि इसे सभी राजनगर हर साल एक बार अपनी कमर झुकाकर प्रणाम करते हैं स्तुति का आयोजन करते हैं गले में वचन-मालाएँ लाद देते हैं कुछ दिनों के तर्पण से कितना तृप्त करते हैं फिर पूरे साल यह पिछलग्गू बनी दौड़ी फिरती है राजमहिषी का पद छोड़ चाकरी करती है और जो दूसरी सिरचढ़ी है, जिसकी तूती बोलती है देश की बोलती बंद करने का दहशत फैलाती है | यह हमारी ज़बान को क्या हो गया है जो रूपवान-गुणवती भिखारिन की तरह गली–कूचे में धक्के खा रही है हर कहीं बे-आबरू हो रही है हर मोड़ पर आँसू बहा रही है जिसे देख पालतू कुत्ते भौंकते हैं आवारा दौड़ा-दौड़ाकर नोचते हैं आखिर, यह सब क्या हो गया है यह हमारी ज़बान को क्या हो गया है | – “अतलस्पर्श”, संतलाल करुण

के द्वारा: Santlal Karun Santlal Karun

यह क्या हो गया है ! यह हमारी ज़बान को क्या हो गया है कि इस पर से सजी-सँवरी धूप का विश्वाश उठ रहा है इससे सोंधी मिट्टी की आशा टूट रही है इस पर नक्षत्र चढ़ते कदम भरोसा नहीं करते इससे नई निगाहों को आगे राह नहीं दिखती | यह हमारी ज़बान को क्या हो गया है कि इसके रहते एक सफ़ेद मुँहचढ़ी ज़बान देश की अलिजिह्वा तक का रंग सफ़ेद डाइ की तरह बदल रही है वह शब्दों के तैलीय तरण-ताल में नहाकर गाँवों तक आधुनिकता की कुलाँचें मार रही है जगह-जगह भूमण्डलीकरण के कैम्प लगाकर सब की नसों में कोकीन डाल रही है और एक अरब लोगों की चेतना कोम्-आ में पहुँचाकर उसके खून-पसीने की सारी रंगत दुह रही है | यह हमारी ज़बान को क्या हो गया है कि इसके ऊपर एक तेज़ी से फैलनेवाली बहुत महीन असाध्य, परजीवी पर्त उग आई है जो दिनोंदिन और ढीठ होती जा रही है | सिर पर मंडरा रही है आँखों में धूल झोंक रही है कानों में कौड़ी डाल रही है होंठों पर थिरक रही है छाती पर मूँग दल रही है जो हाथों को धोखे से बाँध रही है पैरों पर कुल्हाड़ी चला रही है और जो विषकन्या की तरह हमारे देश के साथ अपघात कर रही है | यह हमारी ज़बान को क्या हो गया है कि केवल पन्द्रह वर्षों का झाँसा देनेवाली जैसे अब घर-बैठा बैठने पर तुल गयी है वह आज भी हमारी जीभ पर षड्यन्त्र का कच्चा जमींकंद पीस रही है हमारी सारी सोच-समझ हलक के गर्त में ढकेल खुद बाहर बेलगाम हो रही है जो हमारे मन की नहीं कहती हमारे मुख को नहीं खोलती हमारे चेहरे की नहीं लगती और जो आकाशबेल की तरह हमारे देश के मानसवृक्ष पर फैलती जा रही है | यह हमारी ज़बान को क्या हो गया है कि इसे सभी राजनगर हर साल एक बार अपनी कमर झुकाकर प्रणाम करते हैं स्तुति का आयोजन करते हैं गले में वचन-मालाएँ लाद देते हैं कुछ दिनों के तर्पण से कितना तृप्त करते हैं फिर पूरे साल यह पिछलग्गू बनी दौड़ी फिरती है राजमहिषी का पद छोड़ चाकरी करती है और जो दूसरी सिरचढ़ी है, जिसकी तूती बोलती है देश की बोलती बंद करने का दहशत फैलाती है | यह हमारी ज़बान को क्या हो गया है जो रूपवान-गुणवती भिखारिन की तरह गली–कूचे में धक्के खा रही है हर कहीं बे-आबरू हो रही है हर मोड़ पर आँसू बहा रही है जिसे देख पालतू कुत्ते भौंकते हैं आवारा दौड़ा-दौड़ाकर नोचते हैं आखिर, यह सब क्या हो गया है यह हमारी ज़बान को क्या हो गया है | – “अतलस्पर्श”, संतलाल करुण

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हम भारतीय संस्कृति व् सभ्यता में विश्वास करते हैं परन्तू दिल्ही के पब्लिक स्कूलों, माध्यमिक स्कूलों में केवल हिंदी व् संस्कृत भारतीय भाषाए ही नहीं समाप्त नहीं हो रही, बल्कि बच्चो को अपनी संस्कृति का ज्ञान भी नहीं हो पा रहा है. राष्ट्र भाषाओ में हिंदी उन संस्कृतिक मूल्यों की प्रवाहिका है जो देश के व्यक्ति , परिवार, समाज और राष्ट्र को मजबूत बनाती है साथ ही ज्ञान और विज्ञानं से परिचित कराती है! उत्कृष्ट साहित्य, रामायण, महाभारत, नीति शास्त्रों को आधार बनाकर हिंदी में अनेक ग्रन्थ लिखे गए है, बावजूद इसके मात्र हिंदी दिवस पर ही, हिंदी के बारे में बातचीत की जाती है उसके बाद सभी अपनी राष्ट्रभाषा हिंदी को भूल जाते है! ओमप्रकाश प्रजापति इ-४/३२३ नन्द नगरी दिल्ली-९३ मो 09910749424

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आज के बदलते परिवेश में जहाँ हर कुछ बदल गया है. हमारी परम्पराएँ बदली हैं ,सोच बदल गए हैं. शिक्षा जिस पर हर बच्चे का अधिकार है और शिक्षक जिसे भगवान से भी बढ़कर माना जाता है, परन्तु न तो आज के शिक्षकों में वह बात रही न ही आज के छात्र ही वैसे रहे, आज शिक्षक को न ही वह आदर प्राप्त है जैसा पहले के शिक्षकों को प्राप्त था इसका कारन भी है कि धीरे -धीरे गुरु शिष्य परंपरा खत्म होने की कगार पर है, आज शिक्षा का बाजारीकरण और शिक्षा केवल धन कमाने का जरिया बनकर रह गया है, शिक्षक जिस पर आने वाले भविष्य को सँवारने की जिम्मेवारी होती है, वह पैसों के लालच में अपनी जिम्मेवारी को भूल बैठा है ,शिक्षक जो देश का समाज का निर्माता होता है, जो चाह ले तो चंद्रगुप्त जैसे शिष्य को विश्वविजयी बना सकता है और नन्द वंश का नाश कर सकता है, हाँ परन्तु शिक्षक भी चाणक्य जैसा होना चाहिए, परन्तु आज के आर्थिक युग में न कोई शिक्षक चाणक्य बन सकता है और न ही चंद्रगुप्त जैसा शिष्य गढ़ सकता है. दुःख होता है जानकर कि शिक्षक जो भविष्य का निर्माता है , उसके द्वारा मानसिक शारीरिक शोषण को अंजाम दिया जाता है, हमारा नैतिक स्तर कितना गिर चूका है जो मानवता के लिए अभिशाप है.

के द्वारा: kajal kajal

( शिक्षक दिवस के अवसर पर गुरू की बात कहां आ गयी) जी हाँ, गुरू भगवान के समकक्ष आदर्णीय हैं और होने भी चाहिये। किन्तु आज के समय गुरू भगवान के समान ही आदृश्य हो गये हैं। गुरु दर्शन तो दें कि हम लोग उनकी आरती उतार सकें। अपने पूरे विद्यार्थी जीवन में शिक्षकों से तो साक्षात्कार हुआ किन्तु गुरू के दर्शन न हो सके। कदाचित मै ही आभागा था। शिक्षण कार्य करने वाले कर्मचारियों और गुरूओं के बीच स्पष्ट भेद करना होगा तभी गुरू शब्द की गरिमा सुरक्षित रहेगी। ट्यूशन के लिये विवश करने के लिये विद्यालय में ठीक से कक्षा में पढ़ाया जाना तो एक पाप है और कोई अपने ही विद्यालय के अध्यापक के यहां ट्यूशन न करके यदि कहीं और से पढ़ कर परीक्षा देता है तो उसे गृह परीक्षा में ही फेल कर दिया जाता है,उसका जीवन तबाह कर दिया जाता है ये पाप तो हत्या से कम नहीं है। शिक्षक हों या जन साधारण ,आप किसी को किसी का पैर छूने का प्रशिक्षण तो दे सकते हैं किन्तु आदरभाव स्वयं उनके क्रियाकलापों पर ही निर्भर होता है। आज शिक्षकों को यथोचित सम्मान नहीं मिलने का कारण स्वयं कुछ शिक्षक ही हैं। क्षमा करें, मेरा अनुभव बहुत बुरा है। रोते हुए बच्चे किसी के हृदय को द्रवित कर देते हैं,किन्तु कुछ कसाई इन बच्चों को रूलानें में संकोच नहीं करते। कुछ बच्चे आत्महत्या तक कर लेते हैं और कुछ जीवन भर के लिये अवसादग्रस्त। क्षमा करें जिन्हे मेरी बातें बुरी लगी हो किन्तु मेरा अनुभव एक या दो शिक्षकों के साथ का नहीं है या मात्र एक शहर या एक विद्यालय का भी नहीं।मैने कहा ना शायद मै ही अभागा था। मां का दुलार और पिता द्वारा पूर्व में ही मेरे भीतर भरे गये साहस ने ही मुझे सम्बल दिया और जीवित रखा वर्ना यारों ने तो कोई कसर न छोड़ी थी।

के द्वारा: Ajay Singh Ajay Singh

अब केवल पुस्तकों में ही गुरु की महिमा और बखान अछे लगते है..................... आज का स्टुडेंट अपने आप को गुरु से सबसे उचा मानता है,,........गुरु का ज्ञान उसके लिए कोरे कागज़ के समान है........ आज का स्टुडेंट कल के गुजरे हुए स्टुडेंट से अपनी तुलना कल ले स्टुडेंट से नहीं कर सकता .... पुराने समय के स्टुडेंट गुरुओं का सम्मान करते थे आदर करते थे गुरु की की कही हुई हर बात को पत्थर की लकीर समझते थे गुरुओं से नजर से नजर मिलाने की हिम्मत न पड़ती थी.. और गुजरे हुए jmane के माता - पिता भी गुरुओं का सम्मान करते थे......... आज का समय बहुत बदल गया है....आज का समय ऐसा है की आज गुरु के ज्ञान को स्टुडेंट अपने ज्ञान के आगे कुछ भी नहीं समझते......आज गुरुओं पर स्टुडेंट्स और उनके माता - पिता का अधिकार हो गया गुरुओं का कोई भी सम्मान नहीं रह गया........बस आज कल गुरुओं का सम्मान और महिमा किताबों में केवल होती है.......... आज के स्टुडेंट्स और माता - पिता गुरुओं को नौकर समझते है..............जहा गुरु का सम्मान नहीं वह ज्ञान कहा............. कहा जाता है की बिना गुरु के ज्ञान न मिली है ............ये बात १०००% सही है............इसे कोई मिथ्या साबित कर ही नहीं सकता...........आज के स्टुडेंट गुरुओं का अनादर करने में जरा भी नहीं डरते .........यहाँ तक की मारने को भी तैयार हो जाते है..... मैंने कई बार अक्सर ऐसा होते देखा है.............. अब ज्यादा क्या कहूँ bus इतना कहूँगा......... गुरु के बिना कभी ज्ञान नहीं मिल सकता. हमारे पुरानो और वेदों में भी गुरु को इश्वर से भी ऊँचा स्थान दिया गया है. माता - पिता केवल जन्म देते है लेकिन गुरु भविष्य का संचालक और मार्गदर्शक और पथ प्रदर्शक होता है. वह शिष्य को समाज में रहने के लिए शिक्षित करता है.... गुरु सभी चीजों का ज्ञान कराता....... गुरु ज्ञान के माध्यम से ही शिष्य को भवसागर पर कराता है................. बस इतना ही.ज्यादा क्या कहू.............

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अस्सम की हिंसा पर सर्कार बोलने से बच रही है क्यों की ये समस्या भी सरकार के द्वारा उत्पन्न की गयी है अवैध बंगलादेशी घुस्पथिये वहा के जनसंक्या अनुपात को बदल रहे हैं इन घुस्पथियो को रासन कार्ड और पहचान पत्र वहा की सरकार के संरक्षण में उपलब्ध हुए , ये घुस्पथिये आज अस्सम की विधान सभा के सदस्य तक बन गए और तो और जान कारी में आया की १-२ लोग लोकसभा भी पहुँच चुके हैं अब सरकार और ये अवैध जनप्रतिनिधि उन अवैध घुसपैठियों को आगे बढावा डे रहे है , साकार वहा के मूलनिवासियो( बोडो हिन्दू जनजाति ) की नहीं सुन रही और ये बंगलादेशी इन पर आये दिन अत्त्याचार कररहे हैं इनके घरो खेतो को जबरन कब्जाया जा रहा है और समाचार पत्र भी ये खुल कर नहीं कह रहे की ये साम्प्रदयिक नहीं अपितु रास्ट्रीय और अरास्त्रिया की लड़ाई है और सरकार अपने संवैधानिक कर्त्तव्य को भूला कर इन अवैध बंगलादेशियो को निकाल बहार करने की जगह पर इनको बचाव शिवरों में पोषित कर रही है ये मानवता नहीं ये देश के साथ गद्दारी है और मुस्लिम तुस्टीकरण की आड़ में वोट की राजनीति है अगर अईसे ही चलता रहा तो अस्सम हमेसा क लिए देश से अल्लग हो जायेगा तब ये राजनीतिज्ञ क्या पकिस्तान में जाकर राजनीति करेंगे आज रस्त्रभाक्तो को जागने की आवश्यकता है .

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जब-जब १५ अगस्त को लाल किले की प्राचीर से तिरंगा फहराया जाता है तब-तब स्वातंत्र्य के लिए न्यौछावर हर शहीद सबको याद आने लगता है प्रधानमंत्री जी पहले देश की कठिनाईयों, विपदाओं पर कुछ देर गंभीर होते हैं फिर भावी योजना पर प्रकाश डाल वर्षभर की उपलब्धियों का बखान करते हैं राष्ट्रशक्ति को निर्बल करने वाले आंतरिक व बाह्य तत्वों पर तीव्र प्रहार करते हैं 'जय हिंद' का घोष कर मिलकर 'राष्ट्रगान' गाकर फिर अपनी राह पकड़ लेते हैं इधर दिल्ली के प्रमुख नागरिक, राजदूत, कूटनीतिज्ञों का सरकारी भोज होता है उधर हमारा भी 'आजादी का एक लड्डू, पाकर मन को ख़ुशी से भर आता है चलो आज 'हम स्वतंत्र है और रहेंगे' यह भाव एक बार सबके मन तो आता है जो मन में 'राष्ट्र और राष्ट्रीयता' की हलकी-सी हलचल उत्पन्न कर जाता है आओ सभी फहरा कर तिरंगा मिलकर गायें ये गीता न्यारा "इस वास्ते पंद्रह अगस्त है हमें प्यारा आजाद हुआ आज के दिन देश हमारा" स्वतंत्रता दिवस की मंगलकामनाओं सहित जय हिंद, जय भारत

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यदि आप सोचते हैं आप आजाद हैं तो यह आपकी भ्रांत धारणा है.......देश को विभिन्न षड्यंत्रों से आज भी गुलाम रखा गया है पहले हम ईस्ट इंडिया कंपनी के गुलाम थे आज 5000 से अधिक विदेशी कंपनियों अवं विदेशी नीतियों की गुलाम हैं.......कहने को अधिक समय नहीं है.........ऐतिहासिक व् निर्णायक जंग जारी है रामलीला मैदान में............हमें प्रत्येक राष्ट्रवादी शक्ति की आवश्यकता है.......... यदि मैं गलत हूँ तो मेरा विरोध कीजिये किन्तु मौन न रहें..........नपुंसक न बने........... उठो जागो क्यूँ सो रहे हो, राष्ट्र का अपमान कैसे सह रहे हो! भीख कि आजादी ले ली, शहीदों का क्यूँ अपमान किया, क्यों देशद्रोही बन गए, अपना ईमान कैसे बेच दिया, पेट नहीं भरा उन पैसों से, राष्ट्र को क्यूँ बेचने चले........! आगे पढने के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें.........http://pritish1.jagranjunction.com/2012/08/08/utho-jago-kyun-so-rahe-ho/ ऐतिहासिक निर्णायक आन्दोलन………समय अब भी है जागो…….दिल्ली चलो……….! जय हिंद जय भारत जय भारत स्वाभिमान…………. वन्दे मातरम……..!

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हमारे देश में ६ का मतलब छक्का से लगाया जाता है और क्रिकेट के छक्का के अलावा भी इस देश में छक्का उसको कहते है जो न तो नर में है और ना नारी में यानि हिंजड़ा और इस बार क्या कहने हमारे प्रधान मंत्री .....नाम तो मै ले नही सकता .............काश इस समय मोनिया जी फ़ोन पर होती तो उनसे पूछ तो लेता कि किस को प्रधान मंत्री कहना है ....खैर कोई बात नही .............प्रजा तंत्र में तो रजा तो कोई भी बन सकता है ..अब चाहे राहुल को समझ लीजिये या प्रियंका को , चाहे बढेरा को या फिर सोनिया जी को क्या फर्क पड़ता है .........................यार आप लोग भी न बात क्या करना चाहता हूँ और बार बार मेरा ध्यान इधर उधर मोड़ देते हो .........बात करना चाहता हूँ कि राष्ट्र पति भवन में शपथ ग्रहण में क्या क्या खाया गया तो आप है कि बस आसाम के दर्द एम् पिघले जा रहे है ..............अरे मरने के लिए ही तो हम सब पैदा हुए है ...............अब चाहे जल कर मरे या भूख मरी से ...मर तो गए ना ...जिन्दा तो स्वर्ग नही चले गए ????????????अब भाई मुझे अपनी बात पूरी कर लेने दीजिये ................हां तो छक्का का मतलब .........वही वही जो बस हाथ पीटते है और म्हणत आप करते है ...चाहे शादी करे या शादी के बाद बाद बन्ने के आदी बने पर यह सब हाथ पीटते हुए आ जाते है तो इस बार तो स्वतंत्रता दिवस में दो दो छक्का लगा है ...........और राष्ट्रीय ध्वज कौन फहराएगा ????????????//अरे अपने देश के ..................एक छक्का से लगता है मन नही भरा जो अब दो का आनंद ले रहे है ...................खैर देश में छक्के ही तो है वरना अन्ना क्यों डरते भला छक्को से कौन लड़ पाया है ............शायद अन्ना को लगा होगा कि देश सामान्य आदमी चला रहे है ...................छक्के से भीष्म पितामह तक को अपनी जान गवानी पड़ी थी ................जी जी मालिक काफूर ................बिलकुल अल्लौद्दीन खिलजी का मंत्री .....................हिंजड़ा था .......कौन सी लड़ाई कोई उस से जीत पाया ??????????????/// काश अन्ना जान पते कि देश एक छक्के के नही दो छक्के के चंगुल में है और राम देव जी तो दो दो छक्के का आनंद भी १५ अगस्त को लेंगे .................भाई राम देव जी को बता दीजिये कि इन्ही अप्राकृतिक लोगो की वजह से एड्स ज्यादा फ़ैल रहा हा जरा दूरी बना कर रहेंगे वरना इनका क्या ये तो बर्बाद है ही और हमारे राम जी को भी .................काश इस बार देश अपने डबल छक्के से ...पर एक से भले तो दो होते है ..............और दो क्यों एक और एक तो ग्यारह होते है ..............अब यह मै आप पर छोड़ता हूँ कि दो छक्के मिल कर कितने होते है .................ग्यारह तो होते ही है पर जरा सोच कर देखिये .........५४२ ...........हो सकता है ...आखिर इस देश में क्या नही हो सकता है .............जब यह भगवन जन्म ले सकता है तो राक्षस को जगह तो देनी ही पड़ेगी ...वरना भगवन धरती पर कैसे आयेंगे ............पर इस बार तो राक्षस छक्के है .................एक नही दो दो ...................कही आप ने भीष्म पितामह जैसी कसम तो नही खायी है ना .......काश इन छक्को से देश में कोई वीर मर न जाये .................पर मरेगा क्या अब तो देश ही मरो का हो गया ....................नही तो अन्ना रणछोर क्यों हो जाते बेचारे कम से कम कृष्ण जन्माष्टमी तो मना रहे होंगे .............पर आप कही मत जियेगा बस आज से ठीक छठे ( मतलब यह भी छक्का ) आप के सामने होंगे देश की स्वतंत्रता के पूरे छाछठ साल हा हा हा जी जी दो दो छक्के .......आखिर छक्को को भी जीने का हक़ है .........देश के नेता विधायक , सांसद बनने का हक़ है ..........तो फिर इनको छक्का नही नही मानिये छक्का कहिये ................क्यों छक्का जी आपको देश का जन प्रतिनिधि बन कर कैसा लग रहा है ??????? छोड़ियेगा नही इस देश को जब तक आपकी तरह यह नपुंसक न बन जाये ..................वो छक्का ही क्या जो अपनी तरह ही देश हो न बना दे ..............और इस बार तो आप दो छक्के साथ आये है ....तो लूटिये छक कर और लुटाइए छक कर जब तक हर तरह छक्का ही जाता न दिखाइए देने लगे ..............आखिर उस खेल क्या मजा जिसमे छक्का न हो ................और हमारे देश में तो छक्के के विश्व रिकार्ड है .............स्वतंत्रता दिवस पर आप सबकी को एक साथ दो छक्के की बधाई ................डॉ आलोक चान्टिया

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हमें सही अर्थो में आज़ादी नहीं मिली है आज़ादी के ६५ वर्ष बाद भी देश में गरीबी, बेरोजगारी,अशिक्षा जैसी समस्याएं मुहं बाएं खड़ी है यही नहीं बाल-मजदूरी, बंधुआ-मजदूरी, घटिया स्वास्थ्य सेवायें,कुपोषण,दिन-प्रतिदिन बढ़ते भ्रष्टाचार और न जाने कितनी और समस्याओं से दो-चार होना पड़ता है l आज़ादी के दिवानो ने यह सोचा भी नहीं होगा कि एक दिन देश में परिवारवाद इतना हावी हो जाएगा कि एक ही परिवार का शासन होगा, भ्रष्टाचारी गुलछर्रे उडायगे आम आदमी महंगाई कि चक्की में पिसेगा l सही अर्थों में मौकापरस्त और मक्कार किस्म के राजनीतिज्ञ,अफसर ही जश्ने-आज़ादी मनाते है आम आदमी को तो दो वक़्त कि रोटी का जुगाड़ करने में ही लगा रहता है !

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राखी का त्यौहार आ ही गया ,इस त्यौहार को मनाने के लिए या कहिये की मुनाफा कमाने के लिए समाज के सभी बर्गों ने कमर कास ली है। हिन्दुस्थान में राखी की परम्परा काफी पुरानी है . बदले दौर में जब सभी मूल्यों का हास हो रहा हो तो भला राखी का त्यौहार इससे अछुता कैसे रह सकता है। मुझे अभी भी याद है जब मैं छोटा था और राखी के दिन ना जाने कहाँ से साल भर ना दिखने बाली तथाकथित मुहबोली बहनें अब्तरित हो जातीं थी एक मिठाई का पीस और राखी देकर मेरे माँ बाबु से जबरदस्ती मनमाने रुपये बसूल कर ले जाती थीं। खैर जैसे जैसे समझ बड़ी बाकि लोगों से राखी बंधबाना बंद कर दी। जब तक घर पर रहा राखी बहनों से बंध्बता रहा पैसों का इंतजाम पापा करते थे मिठाई बहनें लाती थीं।अब दूर रहकर राखी बहनें पोस्ट से भेज देती हैं कभी कभी मिठाई के लिए कुछ रुपये भी साथ रख देती हैं।यदि अबकाश होता है तो ज़रा अच्छे से मना लेते है। पोस्ट ऑफिस जाकर पैसों को भेजने की ब्यबस्त्ता करके ही अपने कर्तब्यों की इत्श्री कर लेते हैं। राखी को छोड़कर पूरे साल मुझे याद भी रहता है की मेरी बहनें कैसी है या उनको भी मेरी कुछ खबर रखने की इच्छा रहती है ,कहना मुश्किल है . ये हालत कैसे बने या इसका जिम्मेदार कौन है काफी मगज मारी करने पर भी कोई एक राय बनती नहीं दीखती . पर्व और त्यौहारों के देश कहे जाने वाले अपने देश में कई ऐसे त्यौहार हैं लेकिन इन सभी में राखी एक ऐसा पर्व है जो भाई-बहन के पवित्र रिश्ते को और अधिक मजबूत और सौहार्दपूर्ण बनाए रखने का एक बेहतरीन जरिया सिद्ध हुआ है। राखी को बहनें अपने भाई की कलाई पर राखी बांधते हुए उसकी लंबे और खुशहाल जीवन की प्रार्थना करती हैं वहीं भाई ताउम्र अपनी बहन की रक्षा करने और हर दुख में उसकी सहायता करने का वचन देते हैं। पारिवारिक रिश्तों का स्वरूप भी अब बदलता जा रहा है भाई-बहन को ही ले लीजिए, दोनों में झगड़ा ही अधिक होता है और वे एक-दूसरे की तकलीफों को समझते कम हैं हैं।आज वे अपनी भावनाओं का प्रदर्शन करते ज्यादा मिलते है लेकिन जब भाई को अपनी बहन की या बहन को अपनी भाई की जरूरत होती है तो वह मौजूद रहें ऐसी सम्भाबना कम होती जा रही है. सामाजिक व्यवस्था और पारिवारिक जरूरतों के कारण आज बहुत से भाई अपनी बहन के साथ ज्यादा समय नहीं बिता पाते ऐसे में रक्षाबंधन का दिन उन्हें फिर से एक बाद निकट लाने में बहुत बड़ी भूमिका निभाता है। लेकिन बढ़तीं महंगाई , रिश्तों के खोखलेपन और समय की कमी की बजह से बहुत कम भाई ही अपनी बहन के पास राखी बंध्बाने जा पाते हों . सभी रिश्तों की तरह भाई बहन का रिश्ता भी पहले जैसा नहीं रहा लेकिन राखी का परब हम सबको सोचने के लिए मजबूर तो करता ही है की सिर्फ उपहार और पैसों से किसी भी रिश्तें में जान नहीं डाली जा सकती। राखी के परब के माध्यम से भाई बहनों को एक दुसरे की जरूरतों को समझना होगा और एक दुसरे की परिशिथ्त्यों को समझते हुए उनकी भाबनाओं की क़द्र करके राखी की महत्ता को पहचानना होगा। अंत में मैं अपनी बात इन शब्दों से ख़त्म करना चाहूगां . मनाएं हम तरीकें से तो रोशन ये चमन होगा सारी दुनियां से प्यारा और न्यारा ये बतन होगा धरा अपनी ,गगन अपना, जो बासी बो भी अपने हैं हकीकत में बे बदलेंगें ,दिलों में जो भी सपने हैं राखी का त्यौहार आ ही गया ,इस त्यौहार को मनाने के लिए या कहिये की मुनाफा कमाने के लिए समाज के सभी बर्गों ने कमर कास ली है। हिन्दुस्थान में राखी की परम्परा काफी पुरानी है . बदले दौर में जब सभी मूल्यों का हास हो रहा हो तो भला राखी का त्यौहार इससे अछुता कैसे रह सकता है। मुझे अभी भी याद है जब मैं छोटा था और राखी के दिन ना जाने कहाँ से साल भर ना दिखने बाली तथाकथित मुहबोली बहनें अब्तरित हो जातीं थी एक मिठाई का पीस और राखी देकर मेरे माँ बाबु से जबरदस्ती मनमाने रुपये बसूल कर ले जाती थीं। खैर जैसे जैसे समझ बड़ी बाकि लोगों से राखी बंधबाना बंद कर दी। जब तक घर पर रहा राखी बहनों से बंध्बता रहा पैसों का इंतजाम पापा करते थे मिठाई बहनें लाती थीं।अब दूर रहकर राखी बहनें पोस्ट से भेज देती हैं कभी कभी मिठाई के लिए कुछ रुपये भी साथ रख देती हैं।यदि अबकाश होता है तो ज़रा अच्छे से मना लेते है। पोस्ट ऑफिस जाकर पैसों को भेजने की ब्यबस्त्ता करके ही अपने कर्तब्यों की इत्श्री कर लेते हैं। राखी को छोड़कर पूरे साल मुझे याद भी रहता है की मेरी बहनें कैसी है या उनको भी मेरी कुछ खबर रखने की इच्छा रहती है ,कहना मुश्किल है . ये हालत कैसे बने या इसका जिम्मेदार कौन है काफी मगज मारी करने पर भी कोई एक राय बनती नहीं दीखती . पर्व और त्यौहारों के देश कहे जाने वाले अपने देश में कई ऐसे त्यौहार हैं लेकिन इन सभी में राखी एक ऐसा पर्व है जो भाई-बहन के पवित्र रिश्ते को और अधिक मजबूत और सौहार्दपूर्ण बनाए रखने का एक बेहतरीन जरिया सिद्ध हुआ है। राखी को बहनें अपने भाई की कलाई पर राखी बांधते हुए उसकी लंबे और खुशहाल जीवन की प्रार्थना करती हैं वहीं भाई ताउम्र अपनी बहन की रक्षा करने और हर दुख में उसकी सहायता करने का वचन देते हैं। पारिवारिक रिश्तों का स्वरूप भी अब बदलता जा रहा है भाई-बहन को ही ले लीजिए, दोनों में झगड़ा ही अधिक होता है और वे एक-दूसरे की तकलीफों को समझते कम हैं हैं।आज वे अपनी भावनाओं का प्रदर्शन करते ज्यादा मिलते है लेकिन जब भाई को अपनी बहन की या बहन को अपनी भाई की जरूरत होती है तो वह मौजूद रहें ऐसी सम्भाबना कम होती जा रही है. सामाजिक व्यवस्था और पारिवारिक जरूरतों के कारण आज बहुत से भाई अपनी बहन के साथ ज्यादा समय नहीं बिता पाते ऐसे में रक्षाबंधन का दिन उन्हें फिर से एक बाद निकट लाने में बहुत बड़ी भूमिका निभाता है। लेकिन बढ़तीं महंगाई , रिश्तों के खोखलेपन और समय की कमी की बजह से बहुत कम भाई ही अपनी बहन के पास राखी बंध्बाने जा पाते हों . सभी रिश्तों की तरह भाई बहन का रिश्ता भी पहले जैसा नहीं रहा लेकिन राखी का परब हम सबको सोचने के लिए मजबूर तो करता ही है की सिर्फ उपहार और पैसों से किसी भी रिश्तें में जान नहीं डाली जा सकती। राखी के परब के माध्यम से भाई बहनों को एक दुसरे की जरूरतों को समझना होगा और एक दुसरे की परिशिथ्त्यों को समझते हुए उनकी भाबनाओं की क़द्र करके राखी की महत्ता को पहचानना होगा। अंत में मैं अपनी बात इन शब्दों से ख़त्म करना चाहूगां . मनाएं हम तरीकें से तो रोशन ये चमन होगा सारी दुनियां से प्यारा और न्यारा ये बतन होगा धरा अपनी ,गगन अपना, जो बासी बो भी अपने हैं हकीकत में बे बदलेंगें ,दिलों में जो भी सपने हैं

के द्वारा: Madan Mohan saxena Madan Mohan saxena

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मेरे पिता मेरे जीवन में एक मार्ग दर्शक ,एक मित्र ,एक शिक्षक और प्रशिक्षक सिद्ध हुए .उनके सनिध्ये में मेने आज के स्वार्थी,और तेज़ रफ़्तार दौर में जीने की कला को सीखने का प्रयास किया . उनकी एक एक बात और नसीहत आज मेरा मार्गदर्शन करती है. उनको इस संसार से गए हुए कई वर्ष बीत चुके है लेकिन उनकी यादें और काम मुझे ही नहीं हमारे नगर के अधिकांश लोगों की जुबान पे रहते हैं. उनके धर्निर्पेक्ष विचार और समाज सेवा को हम सभी याद करते हैं, मुझे मेरे अब्बा जी की कमी पग पग पैर महसूस होती रहती है. काश ईश्वर उन्हें और कुछ वर्ष जीवित रखता तो हम और बहुत कुछ सीखते और उन्हें भी अब अच्चा लगता . लेकिन बाद के वर्षों में वो भी भ्रष्टाचार से बहुत चिंतित रहते थे. उनका कहना था की जिस वास्तु यानी पैसों को कोई महँ व्यक्ति महत्त्व नहीं देता था अब लोग उसके इतने दीवाने हैं की अपना ईमान भी बेच देते हें.उन्हें बहुत अफ़सोस होता था. आज उनकी एक एक बात ओर विचार मुझे बहुत याद आते हैं.. डॉ. ज़ुल्फ़िकार शिक्षक अ.मु.वि. अलीगढ

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पिता की एहमियत क्या होती है. इस बात का अनुभव मुझे अब हो रहा है ,जब मेरे मित्र रुपी पिता जी इस संसार में नहीं हें. वास्तव में उन्ही के मार्ग दर्शन और पूर्ण सहयोग से आज में कुछ सोच समझ और समाज को परखने की सलाहियत रखता हूँ. उन्होंने मुझे रातों को जगा जगा केर बोलने की कला सिखाई .अचानक मुझे भरी सभा में बुला केर बोलने के लिए प्रेरित किया. अज जब में बोलता हूँ तब लोग मेरी प्रशंसा करते हैं, तब में ही समझता हूँ की इस के पीछे मेरे पिताजी का ही हाथ है. इनकी एक एक बात एक एक डांट अज मुझे रास्ता दिखाती है समय और समाज को समझने में मेरा मार्ग दर्शन करती है. अज में गर्व से कह सकता हूँ की मेरे पिता एक सच्चे समाजसेवी और धर्मनिरपेक्ष व्यक्ति थे ..डॉ. ज़ुल्फ़िकार शिक्षक अ .मु. वि. अलीगढ

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महोदय, मेरें पापा मेरे हीरो है क्योकि पापा अर्थात पिता जी, धरती पर भगवान के रुप में एक ऐसा इन्सान जों हमें जीवन देने के साथ-2 जिन्दगी में एक कामयाब इन्सान बनाता है। पापा ही बच्चे कों जीवन की हर एक कठिनाई सें बाहर निकालतें है। पिता जी कोई षब्द नही जिसें परिभाशित किया जा सकें, कोई कवि की कल्पना नही, कोई कलाकार की मनमोहक मूरत नही। जिसकों समझा जा सकें। यह तो निरन्तर बहने वाली वह निष्च्छल प््रोम की मनमोहक सुगन्ध है जिसे जीवन के हर एक पल में महसूस किया जाता है। यह तो वह रिष्ता है जों एक बच्चें कों अच्छे संस्कार देंता है उसे समाज के साथ कदम मिलाकर चलना सिखाता है। यह वही प््रोम है जों बच्चे कें मांगनें पर मुंह का निवाला भी बच्चे को खिला देंता है। मेंरे पापा मेंरे हीरों है क्योकि वह मेंरे हर सुख-दुख में मेरा साथ देते है। मेंरे लिए सदैव उन्नति के अवसरों की तलाष में रहते है। मेरें एक सुख के लिए अपना सर्वस्य न्यौछावर तक करनें को तैयार रहते है। हीरो का अर्थ होता है। अभिनेता अर्थात जो अभिनय करें। वास्तव में मेरें पापा मेरी जीवन रुपी फिल्म में तरह - तरह की भूमिकाओं का अभिनय करतें है। कभी वह मुझे नीतिगत बाते समझाकर एक गुरु की भूमिका निभाते है। तो कभी दोस्त बनकर मेरी समस्याओं का हल निकालते है। तो कभी कैरियर कंसलटेन्ट बन कर जीवन में मुझे अपने पैरों पर खड़ा करवाने के लिए सदैव तत्पर रहते है। तभी तो वह मेरें लिए एक रोजगार की तलाष में प््रातिदिन रोजगारपरक सूचनाएं देते है। कभी कभी तो वह समाचार पत्रों में प््राकाषित सूचनाये पढ़कर तुरन्त अपने कार्यालय सें फोन पर मुझे जानकारी देते है। इसें कुछ और नही केवल निष्च्छल प््रोम कहते है। एक पिता अपने बच्चे कें जीवन में अहमं भूमिका का निर्वाहन करता है। एक पिता ही तो है जो जीवन के एक लम्बे समय तक काफी दूर तक तुम्हारा पथ प््रार्दषक बनता है। तुम्हारे लिए अपनें सुखों तक को कुर्बान कर देता है। मुझे याद है कि मेरे पिता जी जब मुझें बैकिंग परीक्षाएं दिलवानें के लिए दूर दराज पड़ें परीक्षा केन्द्रों पर लें जाया करते थें तो जनरल बोगी में वह स्वंय घन्टों के हिसाब से खड़ा होकर मुझंे सीट पर बैठाते थें। मेरे लाख कहने पर भी वह खड़े ही रहते थें क्योकि वह मुझें कभी भी नही चाहते थे कि मेंरा बच्चा खड़ा होकर यात्रा करें । मै उन मायूस एवं उम्मीद सें भरी निगाहों का कभी भी वर्णन नही कर सकता जब वह परीक्षा केन्द्र सें मेरें बाहर आने कें इन्तजार में राह निहारतें, खानें का बैग पकड़ें जालीदार दरवाजों से अन्दर की ओर लाखों बच्चों की भीड़ में मुझें पहचाननें की कोषिष करतें और मिलनें पर सदैव बड़ी उम्मीद कें साथ पूछतें कि पेपर अच्छा हुआ ना। उनके निष्च्छल प््रोम पर मैं अपना जीवन भी न्यौछावर कर दूं तों कम होगा। वों मेरें लिए भगवान है। एक आदर्ष है। एक वास्तविक हीरों है। सधन्यवाद् गौरव सक्सेना 354- करमगंज कालपी सरकूलर रोड़, इटावा (उ0प््रा0) सम्पर्कः 9897513678

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पिताजी के चरणों में सादर प्रणाम करके इस सीर्सक पे कुछ सब्द मैं भी कहना चाऊंगा कि पिता के बिना दुनिया उसी प्रकार अधूरी है जिस प्रकार माँ के बिना . दोनों लोगो का स्नेह अगर बच्चे को मिलता है तो ही वोह जिंदगी में सफल हो पता है . पिता को सबको देखकर चलना परता है कि परिवारका हर व्यक्ति संतुस्ट है .और अगर उन्हें सख्त कदम उठाना परता है तो वोह उठाते है ताकि हम सही रास्ते पे चले .पिता वोह जो पुरे परिवार का पालन पोषण करता है . हर तकलीफ में सबसे आगे खरा होता है . कहते है कि अगर इस्वर को देखना हो तो अपने माँ.बाप के रूप में देखना चैये जो हमारी हर बुराई पर हुम्हे दाटते और हर achaai पे sarahate है . हर ख़ुशी में उनसे ज्यादा कोई खुश नहीं होता जितना दुःख में उन्हें दुःख होता है .पिता वोह है जो अपने दुःख को छुपा के भी हमेशा पुरे परिवार को खुश करने कि कोशिश करता रहता है .जितना कहू उतना कम है पिता के बारे में . बिना पिता सोचना भी बहुत मुस्किल है . क्योकि पिता घर का एक मजबूत स्तम्भ है जिसके बिना घर टिक ही नहीं सकता है . और हर विपदा में आगे खरे हो कर पुरे परिवार रक्षा करते है.

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पिता एक ऐसा शब्द जिसके साथ रहने पर शेर के बच्चे सुरक्षित रहते है , भालू के बच्चे दुसरे नर भालू से बेखौफ होकर खेलते है | न तो शेरनी को यह चिंता रहती है कि उसके बच्चो का क्या होगा जब तक दूसरा बलशाली शेर आकर नर पिता को परास्त न कर दे और न ही मादा भालू को भोजन ढूंढ़ते समय बच्चो के मार दिए जाने का भय रहता है क्यों कि नर पिता बच्चो के पास है | मई यह भी जनता हूँ कि जब मादा पैन्गुइन अंडे देती है तो बर्फ से जमे प्रदेश में उस बहार आये अंडे को गर्मी उस अंडे का जैविक पिता ही देता है और एक दो दिन नही पूरे ३ महीने , तब खी जाकर बच्चा बहार दुनिया में कदम रख पाता है यानि अगर हम बच्चे के जन्म और पालन का सारा श्रेय माँ को ही दे दे तो यह एक तरफ़ा फैसला होगा और हम पीर सही ढंग से पिता के दायित्व को रख नही पाएंगे | यह बात और है कि अन्य सभी जीव जन्तुओ में जैविक परिवार की भूमिका ही होती है और उसके बाद माता पिता से अलग बच्चा आना जीवन जीने के लिए स्वतंत्र होता है जैसी कुछ परछाई हमें पश्चिम सभ्यता में देखने को मिलता है | लेकिन मानव की बात आते ही एक शब्द जो सबसे ज्यादा उसके जीवन को १०००० साल से प्रबह्वित करता रहा है , वो है संस्कृति - जिसके सहारे मानव ने न सिर्फ अपने को प्रकृति से सुरक्षित किया बल्कि आज पूरी दुनिया का रावन( एक राजा जिसने सभी कुछ अपने कब्जे में करने की कोशिश जीवन पर्यंत की ) ज्यादा बन बैठा है | और इसी संस्कृत का परिणाम यह रहा की अन्य जन्तुओ में पाए जाने वाले जैविक परिवार और नर पिता की भूमिका को सांस्कृतिक परिवार और सांस्कृतिक पिता की भूमिका बढ़ाने का मिला और इसी लिए मानव ने विवाह , परिवार , नातेदारी को स्थापित किया जो आज भी जारी है | मानव संस्कृति में जिस मानव समूह को सबसे नीचे स्तर पर रखा गया वह है जनजाति ( एक ऐसा समूह जो अभी आधुनिकता सेदूर, प्रकृति के सहारे , और अपनी विशिष्ट संस्कृति के कारण अलग है और भारत में इनको सर्कार द्वारा आरक्षण देकर संरक्षित किया जा रहा है )| भारत में आज इनकी संख्या ७०० के आस पास है और इनमे भी इत का महत्त्व देखा जा सकता है | मध्य प्रदेश के देवास और मंसूर जिलो में रहने वाली बछेड़ जनजाति में पहली बड़ी लड़की को वैश्यावृति ही करनी पड़ती है और वह खेलवाड़ी कहलाती है पर अगर वह गर्भवती हो जाती है तो जनजाति के ही किसी पुरुष को उसका प्रतीकात्मक पिता घोषित कर दिया जाता है और वह ही उस बच्चे का पिता मान लिया जाता है | यही नही उत्तराखंड के देहरादून में रहने वाली जौनसार बावर जनजाति में बहुपति विबाह है और जब लड़की पाने मइके में आती है तो धयन्ती कहलाती है और उस समय वह किसी के साथ यौन सम्बन्ध बना सकती है और ऐसी स्थिति में अगर बच्चा ठहर गया तो विवाहित व्यक्ति ही उसका पिता कहलाता है | इस जनजाति में एक तीर धनुष सेरेमनी होती है और जो व्यक्ति गर्भवती स्त्री को महुआ सी टहनी से बना तीर धनुष दे देता है वही उस बच्चे का जैविक पिता कहलाता है और जब तक कोई दूसरा इस सेरेमनी को नही करता तब तक उस स्त्री से पैदा होने वाले बच्चे उसी पहले व्यक्ति के मने जायेंगे जो यह बताता है कि पिता का होने जनजाति में कितना जरुरी है | यह एक गंभीर मुद्दा है कि ७०० से ज्यादा जनजाति भारत में होते हुए भी ना तो कोई बच्चा अवैध कहलाता है और ना ही अनाथालय है | यानि जनजाति पिता कि भूमिका को लेकर ज्यादा संवेदन शील है पर इससे उलट आधुनिकता की दौड़ में शहरों में रहने वाले यौन संबंधो में आगे निअलते दिखाई देते है पर पिता के रूप में आने ज्यादा तर कतराते दिखाई दे रहे है और इस लिए सड़क के किनारे भ्रूणों की बहरी संख्या नालो में पड़ी खाई पड़ने लगी है |और अगर देर हो गई तो औरत के पास यही विकल्प है की बच्चा पैदा करके सड़क और झाड़ी में फ़ेक दे और उस के कारण अनाथालय में बच्चो की संख्या बढती ही जा रही है पर इन सब में यह बात तो साफ़ है की समाज में यौन संबंधो में तो खुलापन आ गया पर बच्चे के पिता की भूमिका को समाज नही नकार सका है और ना ही सम्बन्ध बनाने वाले लड़का लड़की इस से अपने को बचा पाए है और पिता के निर्धारण की शुन्यता ने गर्भपात और अनाथालय को संस्कृति के एक नए पायेदान के रूप में स्थापित किया है जो पिता के स्थान और महता को अभी दर्शाता है | हिंदी में एक कहावत है बाढे पूत पिता के धर्मा..................यां पिता के कृत्य ही बच्चे के भाग्य का निर्धारण करते है | उद्दालक और श्वेतकेतु ( इन्ही के प्रयास से विवाह के बाद औरत पति के घर स्थाई रूप से रहने लगी वरना इस से पहले सिर्फ बच्चा पैदा करने के लिए किसी उरुष के पास भेजी जाती थी और बच्चा पिअदा करके वापस चली जाती थी |) का प्रकरण हो | या पिता के आदेश पर परशुराम द्वारा पानी माँ के ऊँगली काटने का प्रकरण हो |या फिर भगवन राम के द्वारा पिता की आज्ञा से वन गमन हो | पिता की भूमिका हर जगह दिखाई देती है | भले ही न्याय और कानून ने पिताके नाम के साथ माँ के नाम को भी मानयता दे दी हो पर कोई भी सबसे पहला प्रश्न यही पूछता है कि तुम किसके लड़के या लड़की हो या फिर तुम्हारे पिता का नाम क्या है ? अभी भी भारत में पिता कि ही जाती उपनाम लगता है | आज कल स्पर्म बैंक खुल गए है पर आप अपने स्पर्म दान कर सकते है , बेच सकते है लेकिन आप यह नही जान सकते कि आपका स्पर्म किस महिला से बच्चा पैदा करने में उपयोग किया गया है ?? इसका भी सीधा मतलब यही है कि पिता को लेकर विवाद ना हो और बच्चा उसकी का माना जाये जिस पुरुष के साथ उस महिला का विवाह हुआ यानि किसी ना किसी रूप में हम भी पिता के महत्व को समझते हुए जनजाति का ही फ़ॉर्मूला अपना रहेहै | माँ से ज्यादा उचा स्थान पिता को दिया गया है | चाहे वह हिमालय के रूप में हो या फिर आकाश के रूप में | और ऐसे में फादर डे मानना मेरे लिए ऐसे ही है जैसे किसी पेड़ पर लटका वो कच्चा फल जो बिना पेड़ के वो रस और परिपक्वता नही पा सकता जो उसे मिलने चाहिए वैसे तो लोग और तरीको से भी पका लेते है | पिता के लिए यही कहा जा सकता है बच्चे का सर्जन करने के लिए एक बार में सिर्फ एक अंडा सामने आता है यानि हर अंडा माँ बनने का गुण समाहित किये है पर एक अंडे से निषेचन के लिए एक बार में करीब २ करोड़ शुक्राणु बाहर आते है और उसमे से किसी एक में पिता बनने का गुण होता है और जो अंडे के साथ मिल कर बच्चे का सर्जन करता है और इसी लिए पिता करोडो में एक वह पुरुष है जिसने अनुवांशिक रूप से भी और सांस्कृतिक रूप से भी अपनी महता सिद्ध की है तो ऐसे इत को क्या ना हम सब शत शत नमन करे ...............आप दीर्घायु हो पिता जी .....................डॉ आलोक चान्टिया , अखिल भारतीय अधिकार संगठन

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माता दिवस अमर रहे... मित्रों आज का दिन माँ के ममता , प्यार को याद करने का प्रतीक दिवस है, मैं अपनी एक कविता माँ के स्नेह को समर्पित करते हुए आप सभी के सामने प्रस्तुत करता हूँ.. इसके पहले मैं एक आग्रह भी करना चाहता हूँ की आप सभी सिर्फ एक दिन मात्र माँ को याद ना करें क्यूँ की माँ कोई भूलने वाली चीज़ नहीं है.. वो तो जीवन के हर पल हर सांस में बसी होती है. "विश्वास रखो माँ" मेरे मासूम चेहरे से कोई, नज़रें हटाते क्यूँ नही ? मेरे बढ़ते हुये किताबों पर, नज़रे डताते क्यूँ नहीं ? किस्से मासूमियत के, आप ही लोग बताते हो ! फिर क्यूँ भविष्य की चिंता, में हमें सताते हो ? मेरे कदमों की लडखडाहट से, घबराते क्यूँ हो ? क्या मैं पहले कभी, चलते समय गिरा नही हूँ ? विश्वास रखो माँ, मेरे कदम लडखडाये कोई बात नहीं ! तेरे विश्वास, तेरे अरमान और मेरे सपने, कभी नहीं लडखडायेंगे ! मुकेश गिरि गोस्वामी हृदयगाथा : मन की बातें

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तन समर्पित मन समर्पित ,जीवन का हर छन समर्पित सोचता हु ऐ माँ तुझे और क्या दूँ ... छीर सिन्धु के तेरे अमृत ने, पोषित किया मेरा ये जीवन तेरे आँचल से महंगा कोइ वस्त्र नहीं, ढक ले जो सारा तन तेरे ममता के सागर सा ,प्यार नहीं पाया कभी ये मन त्याग रत्न के भंडारे में तेरे ,मै हु बस एक भिखारी सोचता हु ऐ माँ तुझे मै क्या दूँ ... पकड़ के मेरी नन्ही उंगली ,तुमने ही चलना सिखाया करके पैरो की मालिश, चलने के काबिल बनाया .. . काला टीका लगा के सर पर, दुनिया की नजरो से बचाया कष्ट सहे कितने पर ,गोंद से अपने ना कभी हटाया अब दुनिया के दस्तूर बदल गए ,पर कोई बदल ना तुमको पाया चुका ना पाउ कभी भी,ऐसा है एहसान तुम्हारा सोचता हु फिर भी, ऐ माँ तुम्हे मै क्या दू ..

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माँ ये शब्द ही अपने आप में सम्पूर्ण और महान हैं. कहते भी हैं की एक नारी तभी संपूर्ण होती हैं जब वो माँ बनती हैं माँ जिसके बिना हर कोई अधुरा हैं बच्चा जब पैदा होता है जब वो आखें भी नहीं खोलता हैं तब से लेकर जिंदगी की आखिरी साँस तक एक माँ ही होती हैं जो उन्हें समझती है जब बच्चे बाहर जातें है तो माँ की याद उन्हें सबसे ज्यादा आती है कुकी माँ ही सबसे करीब होती है अपने बच्चो के जब भी हम अकेले या किसी परेशानी में होते हैं तो हम सिर्फ और सिर्फ माँ को याद करते ह हर रिश्ता वक्त के साथ बदल जाते हैं पर माँ का रिश्ता कभी नाहे बाल सकता ,आज में माँ से इतना ही कहूँगी की माँ आप हमेशा मेरे साथ रहना आपका साथ हमेशा मुझे साहस देता हैं जब कभी मुझे डर लगेगा तो मुझे पता ह आप हमेशा मुक्कुरातें हुए मेरे सर पर हाथ रख के मुझे हिम्मत देंगी मैं आपसे बोहोत प्यार करती हु माँ

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  मॉ का स्थान कोई कभी नहीं ले सकता है क्योंकि मॉ तो मॉ होती है हर एक रिस्ते को यहॉ पर नये रूप में बनाया जा सकता है लेकिन मॉ ही एक ऐसा रिस्ता है जिसे एक बार पाने के बाद बदला नहीं जा सकता है। मॉ से ही दूनियॉ को हम अपनी आखों से देख पाते हैं वहीं आज के समाज में कुछ ऐसी सन्ताने देखने को मिलती है जो बडे होने पर अपने माता पिता से ही कन्नी काट लेते हैं और और उनसे अपना पीछा छुडाने के लिये कही अन्य स्थान पर जाकर रहने लगते हैं लेकिन यहॉ माता पिता से तात्पर्य केवल इतना ही है कि बच्चे के अन्य जगह पर चले जाने के बाद पिता तो बच्चों के तरफ देखना भी पसन्द नहीं करते हैं लेकिन मॉ कि ममता उस समय भी कम नहीं होती है और उस समय भी जब उनके उम्मीदों की बनी झोपडी में बरसात होने पर पानी टपकने लगता है तो भी मॉ को उम्मीद रहती है कि उनका बच्चा आयेगा और उनके दूख के समय में उनका लाडला जिसको खुश रखने के लिए उन लोगों ने कोई कमी नहीं किया और अपने तरफ से जान निकाल कर रख्र दिया। आज मेरा केवल ये कहना है कि मॉ तो मॉ होती है और उनकी भी खुशीओं और भावनाओं का हमें ध्यान रखना चाहिए। प्रवीण यादवʺयशʺ

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जो हर कदम पर मुस्कुराती रही जो हर गम गले से लगाती रही अपना हर गम मुझसे छुपाती रही खुद जागकर भी मुझे सुलाती रही मुसीबतों का सामना करती रही जो जिन्दगी की सीढ़ी चड्ती रही जो सुखो और गमो से लडती रही जो मुझे खुश देखकर आगे बडती रही जो जो इस दुनिया में मुझे लायी जिसने सिखाई मुझे आचाई जिसने मेरी हर चोट सहलाई जिसकी हर बात में छिपी है भलाई जिसने दिया मुझे मेरा मन जिसने सिखाई मुझे मेरी जुबान न जाने कितने और थे उसके अरमान पर छोड़ा नहीं उसने अपना ईमान पुछू मुझसे वो मेरी क्या है जीवन का अमृत या मीठी दवा है पीपल की छाव या ठंडी हवा है दामन में जिसके उम्मीद का कारवा है मेरे लिए धरती आसमा है वो कोई और नहीं मेरी माँ है

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माँ एक ऐसा शब्द जिसके लिए मानव यह श्रेय नही ले सकता कि उसने इस शब्द को संस्कृति बना कर दुनिया के सामने रखा क्योकि यही एक ऐसा सम्बन्ध है जो प्रकृति प्रदात है और ऐसा कोई भी प्राणी इस प्रथ्वी पर नही है जो यह रिश्ता न निभाता हो और इस रिश्ते का मर्म न जनता हो | चाहे शेर के चंगुल में फंसे आने बच्चे को देख हिरनी का प्रतिरोध हो या फिट एक कुतिया द्वारा उसके बच्चो को छूने भर से किसी भी पर आक्रमण करने चेष्टा , चिडिया द्वारा पाने बच्चो के लिए घोसला बनाना हो या फिर चील से उनकी रक्षा काप्रश्न हो पर इन सब स्थितियो में माँ खुद के जीवन का मोह छोड़ अपने बच्चे के लिए जीना चाहती है | माँ शब्द उतना ही प्राकृतिक है जितना इस धरा के अन्य प्राक्रतिक अवयव | मुझे आज तक नही मालूम कि किसी महिला ने यह चाह हो कि अपनी सुन्दरता के लिए वह जीवन भर कभी माँ होने का सुख ही न प्राप्त करे | जिस सुन्दरता के चलते औरत हमेशा से प्रश्न चिन्ह बनायीं जाती रही है उसी शारीरिक सुन्दरता से ऊपर वह नासर्गिक सुन्दरता को ओढ़ माँ बन्ने का गौरव हासिल करना चाहती है | माँ उन पलो में सबसे अद्वितीय होती है जब वह अमृत वर्षा करके अपने बच्चे का पालन करती है | मेरे जीवन में माँ का एहसास कुछ ऐसा है कि उनको शब्दों में कैसे लिखू पर जैसे जैसे मै पानी पढाई के पायेदान पर चढ़ता गया औरत औरत के जीवन को वैज्ञानिक आधार पर समझा तो माँ के लिए सर झुकता ही चला गया | मै काफी समय बाद जान पाया कि समाज को बच्चे का सुख देने वाली माँ के गर्भाशय को अगर समुचित समय न दिया जाये तो वह अपने स्थान पर पूर्व की तरह नही हो पाता है और उसी बीच अगर वह फिर माँ बन गई तो वही गर्भाशय कभी पूर्ववत हो ही नही पाता और बहार रह जाने के कारण एक माँ को गर्भाशय या सर्विकल कैंसर हो जाता है | हमारे देश में जल्दी जल्दी बच्चे पैदा करने और बेटी से ज्यादा लड़का देने की लालसा में हर साल करीब ९०००० हज़ार महिलाये मर जाती है और ये त्याग किसी इतिहास में नही लिखा जाता \सिर्फ अपनों की ख़ुशी के लिए माँ बनते बनते एक महिला दुनिया छोड़ देती है और हम सब मूक कोई संवेदना नही दिखाते | मुझे काफी देर से अपनी माँ की समस्या का पता चला और भारतीय संस्कृति में माँ के गर्भाशय , जननांग ,से पैदा तो हुआ जा सकता है , माँ के वक्ष से ढूध तो पिया जा सकता है पर उसके शरीर के बारे में चर्चा नही की जा सकती और कर रहे है तो आप के लोगो के साथ उठने बैठने पर संदेह किया जाने लगेगा ऐसे भारत में मुझे लगा कि अगर माँ से बढ़ कर कुछ नही तो मै उनसे बात करूँगा और मैंने की| मेरी माँ को भी अच्छा नही लगा कि मै अपने मुह से ऐसी बात कर रहा हूँ जबकि वह उच्च शिक्षित महिला है पर जब मैंने उनको समझाया तो उनका उत्तर अवाक् करने वाला था | उन्होंने कहा कि मैंने सुना है कि इस आपरेशन में जान जाने का डर रहता है और मै जैसी हूँ थी हूँ कम से कम जब तक जिन्दा हूँ तुम लोगो के साथ तो हूँ और मुझे इस से ज्यादा कुछ नही चाहिए और उन्होंने आपरेशन नही कराया | अब उन्हें चलने में काफी परेशानी होती है पर आज भी उनको पूरी चिंता रहती है कि सबने खाना खा लिया कि नही और सब ठीक है कि नही जबकि उन्ही बच्चो के लिए खद के गले अस्वस्थता लगा ली | अब ऐसी माँ के लिए क्या खु और कैसे खु कि मुझे उनकी किस बात ने प्रभावित किया ? शायद उनका हर त्याग मेरे लिए किसी महापुरुष से कम नही और पूरी पृथ्वी पर उनके बराबर का त्यागी और महापुरुष कोई अत ही नही इससे अपनी माँ की तुलना कर डालू| माँ तुम केवल श्रध्दा हो , पिय्श श्रोत सी भा करो अवनी और अम्बर तल में ........डॉ आलोक चान्टिया , अखिल भारतीय अधिकार संगठन

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मां, कितना मीठा, कितना अपना, कितना गहरा और कितना खूबसूरत शब्द है। समूची पृथ्वी पर बस यही एक पावन रिश्ता है जिसमें कोई कपट नहीं होता। कोई प्रदूषण नहीं होता। इस एक रिश्ते में निहित है छलछलाता ममता का सागर। शीतल और सुगंधित बयार का कोमल अहसास। इस रिश्‍ते की गुदगुदाती गोद में ऐसी अव्यक्त अनुभूति छुपी है जैसे हरी, ठंडी व कोमल दूब की बगिया में सोए हों माँ के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए एक दिवस नहीं एक सदी भ‍ी कम है। किसी ने कहा है ना कि सारे सागर की स्याही बना ली जाए और सारी धरती को कागज मान कर लिखा जाए तब भी मां की महिमा नहीं लिखी जा सकती। इसीलिए हर बच्चा कहता है मेरी मां सबसे अच्छी है। जबकि मां, इसकी- उसकी नहीं हर किसी की अच्छी ही होती है, क्योंकि वह मां होती है। मातृ दिवस पर हर मां को उसके अनूठे अनमोल मातृ-बोध की बधाई।

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मेरी माँ ने बचपन से मुझे बहुत प्यार दिया है में किस बात को सबसे ज्यादा अच्छा कहूँ मेरे लिए तो हर काम मेरी माँ से शुरू और मेरी माँ पे ख़तम होता है में अपनी माँ से बहुत प्यार करता हु आई लव माँई मोम जब बचपन में मुझे कोई तकलीफ होती थी तो वो पूरी रात जागती रहती थी की कहीं मुझे किसी चीज़ की ज़रुरत न पड़ जाये में क्या हम में से कोई भी अपने माँ बाप का क़र्ज़ जिंदगी भर नहीं उतार सकते हमे चाहिए की हम सबको अपने माँ बाप को बहुत प्यार देना चाहिए उन्हें हमेशा खुश रखना चाहिए मेरी माँ बहुत अछि हैं में उनसे बहुत प्यार करता हु माँ आज में आपसे वादा करता हूँ की ज़िंदगी में कभी आपको कोई दुःख नहीं दूंगा आपको हर वो ख़ुशी दूंगा जो आपने बचपन से आज तक मुझे दी है आपकी हर तकलीफ को अपना समझूंगा

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चंद चार पल भले हो सोचने को मगर माँ तेरी याद आती है. इन व्यस्त लम्हों के तंग जीवन में जब घनघोर तन्हाई सी छाती है तब माँ मुझको तेरी याद बहुत आती है. चाहे भौतिक सुख वैभव की सम्पन्नता हो, कुछ कर गुजरने की दृढ़ता हो. पर कभी कभी घोर रिक्तता सी मन में छाती है. तब माँ मुझको तेरी बहुत याद आती है. दुनिया में माँ का कोई विकल्प नहीं, माँ की सेवा से सच्चा संकल्प नहीं. वह माँ ही तो है जो हर पल को जीने का एहसास दिलाती है. माँ मुझको तेरी याद बहुत तडपाती है. कष्ट अगर तुझको हो तो मुझको कोई आभाष नहीं होता. कष्ट अगर मुझ पर आये तो तू बैचेन हो जाती है. माँ मुझको तेरी याद बहुत आती है. माँ तू विद्या, और धर्म है तू, मेरे ह्रदय का मर्म है तू. प्रेम,करुणा और दया की मूरत है तू बच्चे अच्छे हो या बुरे सब पर समरसता बरसाती है. माँ मुझको तेरी बहुत याद आती है. जब जीवन पथ में कोई साथ न था. मन में किंचित विश्वास न था. आँखों में सपने टूटे थे, फिर से उठने का साहस न था वह तेरी स्नेहिल करुणा थी जिसने फिर से विश्वास जगाया था. विषम क्षणों मै भी तूने लड़ते रहना सिखलाया था. अब चाहे तू दूर भले ही सही मुझसे पर एक मीठे से स्पर्श का एहसास हर पल दिलाती है. तब माँ मुझको तेरी याद बहुत रुलाती है. पता नहीं क्या मै तेरा ऋण कभी चुका सकूंगा. तेरे वैभव को गिरि-शिखरों से भी ऊँचा उठा सकूंगा. एक बैचेनी सी मन में गहराती है. माँ तेरी याद मुझको बहुत तडपाती है. माँ तू मेरे अंतस की शक्ति है . तेरे चरणों में मेरी अविचल भक्ति है. तेरी ममता ही मुझमे भावुकता लाती है. माँ मुझको तेरी याद बहुत सताती है. दे ऐसा आशीष मुझे माँ, स्वयं काल से भिड जाऊ अटूट लक्ष्य की प्राप्ति हेतु, लड़ते लड़ते आगे जाऊ. इतना आगे इतना आगे जिसका कोई छोर न हो. जहाँ पूर्ण दिव्यता हो, बाधाओं की डोर ना हो. तेरी दिव्य प्रेरणा ही मुझमे शक्ति संचार कराती है. पर माँ मुझको तेरी याद हर पल आती है. तेरा वैभव अमर रहे माँ, हम दिन चार रहे ना रहें. कृष्ण भारद्वाज

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सम्पादक मंडल के ध्यानार्थ भाषा तो भावाभिव्यक्ति का एक माध्यम मात्र है. भाषा यदि थोड़ी विचलित होती है, तो क्षम्य है. किन्तु भाव जो प्रकट में तो उच्च स्तरीय लगता है किन्तु उसका अश्लील भाव अपना दूर गामी परिणाम छोड़ता है. उसका ध्यान रखें. विद्वता प्रदर्शन भाषा से नहीं बल्कि उस रचना में समाहित भाव से प्रकट होता है. लिखने के उद्देश्य से परिलक्षित होता है. तथा उस रचना के छद्म मंचन से होता है. आप ने पाठको से राय पूछी, मैंने भी अपनी राय दे दी. आप नहीं पूछते राय नहीं देता. तो यदि आप राय पूछते है तो फिर अपनी गलती के उजागर होने से चिढते क्यों है? ठीक उसी प्रकार यदि कोई ब्लॉगर किसी से अपनी राय पूछता है तो सच्चाई सुनने एवं उसे आत्म सात करने की भी शक्ति रखे. या फिर राय ही न पूछे. आप ब्लागर्स को यह स्पष्ट निर्देश दें क़ि यह एक ऐसा मंच है जहां हर एक को अपने भावो को रखने की भरपूर स्वतन्त्रता दी गयी है. इतना अवश्य है क़ि ओछी हरक़त एवं घिनौने भावो को जिसे आज हर एक व्यक्ति समझने में समर्थ है, इस मंच पर न रखें. अपनी लोक प्रियता बढाने एवं येन केन प्रकारेण पुरस्कृत होने की होड़ में यह न भूलें क़ि आप से कही करोड़ गुना बेहतर लिखने वाले एवं विद्वान इसी मंच पर पड़े हुए है. दूसरी बात यह क़ि इस मंच को कूटनीतिक षडयंत्र एवं आज की गिरी हुई भारत की ओछी राजनैतिक दिशा जैसी राह का शिकार न बनाएं. यह भारत का संसद नहीं है जहां बहुमत से किसी भी बेवकूफ एवं अनपढ़ को भी मंत्री मंडल सौंप दिया जाता है. बहुमत विद्वता का नहीं बल्कि एक समुदाय विशेष का प्रतिनिधित्व करता है. आस मान में तारे बहुत होते है. बहुमत उनका ही होता है. किन्तु एक सूरज के उदय होते ही सब शर्म से मुंह पर अंधाकार की कालिख पोत लेते है.

के द्वारा: प्रकाश चन्द्र पाठक प्रकाश चन्द्र पाठक

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महोदय प्राय यह देखा गया है की समय के आभाव में हम चाह कर भी कई अच्छे लेख पर टिपण्णी या उसका सब्द्पान करने से वंचित रह जाते है , मेरा यह सुझाव है की आप कमेंट्स के शब्दों की संख्या को फिक्स कर दें, और यदि कोई अपने कमेंट्स देता है तो जिस लेख या लेखक पर कमेन्ट पर किया गया है , उसका एक Auto Reply generate हो जाये , ताकि हम और रचनात्मक सहयोग कर सके , महत्वपूर्ण और श्रेय पाने वाले आलेखों पर टिपण्णी कर सकें , मेरे जीवन में मेरे साहित्य क्षेत्र में कुछ बड़ा करने का जो सहयोग आपका है वो किसी प्रथम प्यार की तरह है , आपने मेरे लेखनी में मौका देकर एक नवप्राण मुझमे फूंक दिया है , में जिन्दगी भर इस सहयोग को भुलाने वाला नहीं हूँ पर कई बार जब मेरे रचना बिना सराहना के रह जाती थी तो कंही न कंही टीस होती थी , और इक बात हो सके तो समाचार पत्र जागरण junction के sthan को thoda chamkaye , और jagah bathaye

के द्वारा: चन्दन राय चन्दन राय

करीब पांच वर्ष पहले की बात है। मैं दैनिक जागरण के हरिद्वार कार्यालय में था। हरिद्वार कार्यालय में बाजार से विज्ञापन वसूलने का बड़ा ही अनूठा एवं लोकप्रिय चलन था। दरअसल, वहां अक्सर दैनिक जागरण के सौजन्य से कोई ना कोई अच्छे इवेंट हुआ करते थे। इसमें मुख्य रूप से क्रिकेट व पतंगबाजी थी। चूंकि दैनिक जागरण के एक निदेशक श्री देवेश गुप्ता जी की क्रिकेट में बहुत रुचि थी, इसलिए क्रिकेट को ज्यादा ही प्राथमिकता मिलती थी। वहां होने वाले इवेंट के कई फायदे थे, जिनमें एक तो अखबार की लोकप्रियता बढ़ती थी, दूसरी नगर व आसपास का युवा वर्ग अखबार से भारी संख्या में जुड़ता था और तीसरा कार्यक्रमों में बुलाए जाने वाले अतिथियों से अच्छी-खासी विज्ञापन की वसूली भी हो जाया करती थी। विज्ञापन विभाग से मिलकर मैं खुद इस तरह का प्लान करता था जिसकी काफी तारीफ हुआ करती थी। दरअसल, करते यह थे कि कार्यक्रमों में आने वाले प्रमुख सेलीब्रेटी से थोड़ा-थोड़ा एमाउंट लेकर किसी भी एक कलर पेज पर बाटम में विज्ञापन छापते थे और बाकी बचे उसी पेज पर संबंधित इवेंट का बड़े ही रोचक तरीके से कवरेज छापा जाता था। इस प्रकार वह इवेंट भी कवर हो जाता था और जो फोटो लगते थे, वह उन्हीं लोगों के सर्वाधिक होते थे, जिनके बाटम में लगे विज्ञापन में होते थे। खैर, इसी क्रम में एक बार 1 अप्रैल (मूर्ख दिवस) आ गया। संपादकीय विभाग से संबद्ध होने के बावजूद विज्ञापन वसूलने की यह तकनीकि मुझे भी भा चुकी थी। इसीलिए 1 अप्रैल (मूर्ख दिवस) अचानक मेरे दिमाग में आया कि क्यों न इस फूल डे पर हंसते-खिलखिलाते हुए विज्ञापन की वसूली भी कर ली जाए। फिर मैंने अपने संपादकीय विभाग और विज्ञापन विभाग के कुछ साथियों से मशविरा कर इस संबंध में गोपनीय प्लान कर ली। इसके तहत बिल्कुल फर्जी तरीके से शहर के चार प्रमुख लोगों को अपने हरिद्वार कार्यालय के एक उपक्रेन्द्र का 'उद्घाटन' कराने के लिए बतौर उद्घाटनकर्ता फोन करके आमंत्रित किया गया। उक्त चारों लोगों के लिए अलग-अलग टाइम फिक्स हुआ। निर्धारित समय पर उक्त लोग आते गए और कार्यालय का उद्घाटन करने के नाम पर मूर्ख बनते गए। मूर्ख बनने का मतलब ये कि कार्यालय के गेट पर एक काले रंग का फीता बांधा गया था और थाली में कैंची रखकर एक रिपोर्टर उद्घाटनकर्ता महोदय से फीता काटने का आनुरोध करता था। लेकिन जब उद्घाटनकर्ता महोदय फीता काटने की शुरूआत करते थे तो कैंची चलती ही नहीं थी। फिर क्या, जमकर ठहाका। ठीक यही प्रक्रिया सबके साथ अपनाई गई। यानी वे लोग मूर्ख बनते रहे। शहर के उक्त संभ्रांत लोगों को मूर्ख बनाने के बाद हम लोग उन्हें ससम्मान दफ्तर में बैठाकर दिल से स्वागत करते हुए उन्हें चाय-पानी पिलाते थे। जब वे लोग जाने लगते थे तो मैं धीरे से कह दिया करता था कि कुछ रुपये का एक छोटा-सा विज्ञापन छापेंगे और अप्रैल फूल का कवरेज करेंगे। इस पर वे लोग तुरंत तैयार हो हो गए। इस प्रकार अप्रैल फूल का जमकर आनंद लिया गया और कंपनी को रेवेन्यू भी मिला। विज्ञापन के अलावा उस पेज पर एक मुख्य आइटम मैंने लिखा था जिसका हेडिंग था-'फूल ही नहीं फ्लावर भी हैं हम'। मेरे इस प्लान की शहर में काफी चर्चा रही और कई महीने तक शहर के उन गणमान्य लोगों ने मेरे प्लानिंग की तारीफ की, जो सुनकर मुझे भी अच्छा लगता रहा। वह क्षण भूलता ही नहीं है।

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बात उस समय की है जब मैं हाई स्‍कूल का छात्र था और पहली अप्रैल के दिन गांव में था। सोची समझी रणनीति के तहत उस दिन सुबह ही अपने गांव के नाई को बुलवाया और कहा कि गांव के सभी पंडितों से कह दीजिए कि मेरे घर आज दोपहर के भोजन पर आमंत्रित हैं। नाई ने वैसा ही किया और सभी पंडित लोग समयानुसार मेरे घर के बाहर इकट्ठे हुए। बहुत देर तक जब उनसे खाने के लिए नहीं कहा गया तो वो आपस में ही कहने लगे कि अभी तक अंदर से कोई नहीं आया बुलाने के लिए। मेरे पिताजी अंदर से आए और पंडितों से कहने लगे कि आज मूर्ख दिवस है। आप सभी लोग आज मूर्ख बन गए। इस पर उन लोगों ने कहा कि अरे ऐसा होता है कहीं मूर्ख दिवस। मैं तो भूखा मर गया। मैंने तो घर में बता के आया हूं कि मेरा खाना मत बनाना मैं निमंत्रण में जा रहा हूं। आज जब मैं अपने गांव जाता हूं तो उन दिनों की याद कर खूब हंसी आती है।

के द्वारा: Bhupendra Singh, Jagran Bhupendra Singh, Jagran

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एक बार एक वाक्या मेरे साथ भी हुआ एसा हुआ की शाम के समय मेरे दोस्त का फ़ोन आया की हमारे किसी दोस्त की शादी की सल्ग्र्हा है वंहा सात बजे तक पोहोच जाना मैंने कहा उसका फ़ोन मेरे पास नहीं आया उसने कहा तयारी करने में व्यस्त है तो उसने सिर्फ मुझे ही फ़ोन करके कहा है की सबको कह दूँ तो सबको फ़ोन मैंने ही फ़ोन किया है मैंने कहा ठीक है फिर मैंने कई दोस्तों को फ़ोन किया तो सबने कहा हाँ वो ठीक कह रहा है तो मैं तैयार हो के शाम को उपहार लेके वंहा गया तो पता चला वंहा तो कुछ भी कार्यक्रम नहीं है और भी दो तीन दोस्त वंहा आये उन्हें भी नहीं पता था हमने फिर उसको फ़ोन किया जिसने हम सब को फ़ोन किया था तो उसने हम सब को बोला अप्रैल फूल बनाया भोत मजा आया तो इस प्रकार हम सब बेवकूफ बन गए.

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दूसरेब्लागरोंजैसेनिशाजी,टिम्सीजी,दिनेशआसितकजी,अबोधबालकजी,अल्काजी,राजकमलजी,सूर्यबालीजी,अलीनजी,सुमितजी आदि सभी वरिष्ठ व श्रेष्ठ ब्लागरों के लेखों,कविताओं,विश्लेषणों व प्रतिक्रियाओं को पढकर मुझे भी लगता है कि मै भी कुछ लिखूँ किन्तु पता नहीं क्यों कीबोर्ड छूते ही विचार मन में घूमते रह जाते हैं परन्तु बाहर अभिव्यक्त नहीं कर पाता। अभी कल ही इसी मंच पर वैलेन्टाइनडे पर एक लेख पढा,पढकर मुझे भी कुछ लिखने की इच्छा हुई क्योंकि लेख में इतने सुन्दर ढंग से प्रेम का विश्लेषण किया गया है कि पढने के बाद से अब तक मेरे दिमाग में सिर्फ यही गूँज रहा है कि लोगों को वैलेन्टाइनडे मनाने की आवश्यकता ही क्यों महसूस होती है,प्रेम तो शाश्वत होता है,प्रेम शब्दरहित होता है,प्रेम तो प्रकृति के कण-कण में समाहित है,प्रेम तो उपहार के रूप में हमें प्रकृति से स्वयं ही मिला हुआ है तो फिर इसके इजहार की आवश्यकता शायद तभी पडेगी जब प्रेम (किसी भी रूप में,किसी भी मात्रा में) कलुषित होगा।प्रेम वह मूलभवना है जो स्वयं प्रकाशित है,स्वयं –ष्टव्य है और सतत प्रवाहशील वह अविरल धारा है जो क्षण प्रतिक्षण प्र—ति के सामीप्य से महसूस की जा सकती है। इस भवना से पशु पक्षी भी ओतप्रोत हैं(किन्तु सर्वाधिक विकसित प्राणी की संज्ञा के बावजूद भी मानव को ओतप्रोत होने में अभी समय लगेगा? ) और शायद इसीलिए प्रेम की भाषा वह भी समझते हैं।कल-कल करती नदियों से,पक्षियों की चहचहाट से,हवा की सरसराहट से,सबको आश्रय देती वसुधा से, सूर्य की रोशनी से,चाँद की शीतलता सहित प्र—ति के हर रूप से प्रेम के भावनामय संदेश को हर पल हर दिन महसूस किया जा सकता है।इसीलिए एैसी सर्वव्याप्त मूलभावना को न तो समय के किसी बन्धन में बाँधने की आवश्यकता है और न ही कोई औचित्य और न ही यह किसी विशेष दिन का मोहताज है। जरूरुत है सिर्फ एैसे कार्य करने की जिनसे शुभतारूपी प्रेम के सर्वत्र प्रसार में कोई अवरोध न उत्पन्न हो। अत: हमें वैलेन्टाइनडे नहीं बलिक वैलेन्टाइनमोमेन्ट हर पल मनाना चाहिए कदाचित तभी हम अपने लोक और परलोक दोनो सुधार सकेगें। साथियों मेरे पास आज आए एक एस0एम0एस0 के अनुसार आज 'प्रामिसडे'है, इसको पढते ही मेरे मन में विचार आया कि क्यों न अपने आप से एक वादा करें कि कुछ भी हो अगर हर वक्त नही ंतो कम से कम यथासम्भव अधिकतम सीमातक सत्य ओर प्रेम की राह में लाख दुश्वारियाँ होने के बावजूद चलने का प्रयत्न तो करें। मेरा मानना है कि अगर हम अपने वादे पर खरे उतरे तो वह दिन दूर नहीं होगा जब रामराज्य की कल्पना साकार होती हुई महसूस होने लगेगी और तभी शायद 'हैपी प्रामिजडे' की सार्थकता सही अथोर्ं में सिद्ध होगी। अत: आप सभी सुधीजनों को भी 'हैपी प्रामिजडे'।

के द्वारा: jagobhaijago jagobhaijago

प्य़ार तो फैशन जैसा हो गया जितना बदलो उतने मजेदार,14 फरवरी फैशन शो की तारिख।कुछ तो ईस शो पे क्रोस ड्रेस का भी सहारा लेने से नही चुकते।आखिर काँहा खो     गया है भारतिय प्यार, जिसे पृथ्वीराज ने संयोगिता से की थी। पैसो के थाल मे सजाई गई प्यार के नाम पे अय्याशी और फरेब का खेल या फैशन क्या नाम दू । साल के साथ प्रेमी या प्रेमीका बदल जाते जैसे कैलेन्डर के फोटो।जब से ईस शो मे विवाहित महिला पुरूष  आ गये है तब से और हद पार हो गया है। बेहद जीभचटोर और बेशर्म  होते है ये लोग  हर महिने   टेस्ट बदलना चाहते है ।चूहे के माफिक नये ड्रेस को भी कुत्तर कुत्तर के पुराना कर फिर नये की तलास मे लग जाते है ।मेरी  माने तो वह दिन दूर नही हर वेलेनटाईन नये प्यार की सुरूआत और   पुराने प्यार का अंत का दिन होगा।

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Wo meri best thi. Main use poore dil se love karta tha aur wo bhi mujhse pyar karti thi.Meri anu Aaliya li Love story 3 saal se chal rahi thi. Inter passout hone k bad main Dehradun aa gaya aur wo Kanpur reh gai but hum dono ek doosre se contact me the using phone and facebook. Humari batein daily hoti thi. Dil bekarar rehte the milne k liye but doori kafi thi hum dono k cities k beech. Main Engineering kar raha tha aur chahta tha ki Aaliya ko bhi apne pas bulau. Wo mujhse ek class peechhe thi so maine use dehradun banana ka man bana liya tha.Aaliya mere liye sabkuchh thi, humari Love Story me Koi rukawat nahi thi. Beintaha muhabbat thi aur dheere dheere hamari love story marriage tak pahuch gai. But Kuchh baton ne mere liye “Love” ki definition hi badal di. Hua u ki engineering me admission k bad mera dil padhai se hatne laga,mujhe ehsas hone laga ki mera interest business hai. Isliye main ab utne dil se padhai bhi nahi karta tha isliye marks aur performance bhi low ho gaye.but main business ko le kar serious tha. Doosre sal ka result bahut bura raha aur main do subjects me pass nahi ho paya.college walo ne ghar pe report bhej di ki main absent rehta hu class me. Aaliya ne mujhse poocha to maine kaha ki mera dil nahi lagta padhai me. Usne bahut samjhaya but next year me phir se wohi condition thi. Idhar maine business marketing k about knowledge lena shuru kar diya but kisi ko bhi btaya nahi iske about. 1 saal khatm hone pe jab holidays me main ghar gaya to aaliya ajeeb tarike se behave kar rahi thi mere sath. Mujhe laga ki mjhse gussa hai to maine use manane ki koshish ki but ab wo pehle jaise mere pas nahi rehti thi. Door door si raha karti thi.main apne love relationship ko le kar kafi pareshan rehne laga. Phir maine aaliya se ek din movie dekhne chalne ko kaha but usne inkar kar diya. Mujhe kafi dukh hua. But main apne business project me laga raha aur maine socha ki ek bar business chal jae,phie aaliya aur gharwale dono maan jaenge. Main apne kam me laga raha. Do din bad maine aaliya ko phone kiya to uska phone busy mil raha tha lagatar. Main uske ghar gaya aut bahar se dekha ki aaliya andar kisi se phone pe bat kar rhi thi.wo kafi khush thi. Maine darwaza knock kiya to andar se ek bachha nikal kar aaya aur bola ki aaliya didi ghar pe nahi hain. Mujhe kafi hairat hui,maine next din aaliya se pochha to usne koi jawab nahi dia. Do din bad mere phone pe message aaya ki “aaliya ka peechha chhor do”. Maine phone karke poochha to udhar se mujhe warning mili k aaliya use chahti hai isliye main aaliya ko chhor du. Mujhe laga ki koi majak kar raha hai. Main aaliya k pass gaya aur usse kaha ki koi majak kar raha hai mere sath phone pe. But wo kuchh nahi boli, main jab kareeb gaya aur poochha ki kya bat hai then usne mujhe dhakka diya aur mujh pe chillane lagi aur kaha “tum meri life se chale jao Rajeev,main kisi aur se pyar karti hu,mujhe tum jaise aawara aur nakaam ladke ki jaroorat nahi” Mujhe yakin nahi ho raha tha.mere dil jor jor se dhadakne laga maine usse poocha ki mera qusoor kya hai aaliya,but usne mujhe bahar nikal kar darwaza band kar diya. Main ro raha tha. Toot gaya tha main. Sadness k teer dil ko cheer rahe the.Main chup chap ghar chala aaya. Udhar aaliya rahul nam k ladke k sath love relationship me bandh gayi. Main dehradun me tha,ek din mummy ka phone aaya aur wo bata rahi thi ki aaliya bhi dehradun aa rahi hai. Kisi bade businessman k seminar ko attend karne aa rahi hai wo. Do din bad main Hotel Grand me ek apni car se utar raha tha tabhi meri nazar ek couple pe pari jise guards hotel k andar aane se mana kar rahe the kyuki unke pas invitation card nahi tha. Main najdeek gaya aur poochha ki kya problem hai to mujhe ek aawaz sunai di “sir,hamne invitation card kho diya hai but hum kafi door se aaye hain is seminar ko attend karne,please humein andar aane dijiye”. Maine sar utha k dekha to meri aankhein aur badi ho gayi. Wo ladki koi aur nahi balki meri Aaliya thi.Main kuchh sochh hi raha tha ki uski aawaz aai “sir,apka chehra mere ek bachpan k friend se kafi milta hain,uska nam DEEPAK tha” Main muskurane laga aur maine sirf itna kaha –“aapke bachpan ka wo friend ab Mr. DEEPAK DHAKA ban chukka hai aur wo aapka friend hi nahi kuchh aur bhi tha” Ab wohi DEEPAK Mr DEEPAK DHAKA Ban Chuka tha,jiske liye log door door se milne aate the. jis k kadmo k niche sari dunia the.... Maine apne dil li Suni but mere dil ne meri nahi suni but finaaly mere dil ko pachhtana hi pada..Aaliya apne kiye per o rahi thi aur main seminar attemd karne hotel me chala gaya.

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महोदय, बड़े दुःख की बात है कि बालकों का निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 दिनांक 1-4-2010 से पूरे देश में लागू है किन्तु उत्तर प्रदेश में कम्प्यूटर शिक्षा हेतु यह आज तक नहीं लागू है जबकि कम्प्यूटर विषय कक्षा 6 से 8 तक के विद्यार्थियों के लिए अनिवार्य है।उत्तर प्रदेश ही नहीं बल्कि पूरे देश में कम्प्यूटर शिक्षा पूरी तरह अरबों, खरबोें रूपये के भ्रष्टाचार, अराजकता, कम्प्यूटर शिक्षकों के शोषण तथा सरकारी लूट को समर्पित है। बालकों का निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 की धारा 38 के अनुसार उत्तर प्रदेश निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार नियमावली 2011 बनायी गयी जिसकी धारा 18 ;1द्ध के ;खद्ध में यह स्पष्ट उल्लेख है कि विद्यालय किसी व्यक्ति अथवा व्यक्तियों के समूह या संगठन के लाभ या किन्हीं अन्य व्यक्तियों के लाभ हेतु संचालित नहीं है। फिर भी कम्पनियों को लाभ पहुॅंचाने के उद्देश्य से सरकारों द्वारा कम्पनियों को कक्षा 6,7 व 8 की कम्प्यूटर शिक्षा ठेके पर दे दी गयी। अनुबन्ध के अनुरूप This Agreement shall be governed by the law of India बालकों का निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 लागू होते ही स्वतः ही शून्य होकर समाप्त हो जाता है। उत्तर प्रदेश निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार नियमावली 2011 धारा 23;3द्ध के बिन्दु 18 जो शिक्षक जिस विद्यालय में शिक्षण कार्य कर रहा है उस शिक्षक पर वही वेतन, भत्ते एवं सेवा शर्ते लागू होंगी और ऐसी सेवा नियमावली से शासित होंगी जैसा कि उस विद्यालय के अन्य शिक्षकों पर लागू होती है। बड़े दुःख की बात है कि उत्तर प्रदेश में कानून एवं लोकतंत्र का राज खत्म करके कम्पनियों को लाभ पहुॅंचाने के उद्देश्य से प्रदेश में बालकों का निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 की धाराओं का पालन नहीं किया जा रहा है तथा छात्रों और कम्प्यूटर अध्यापकों का शोषण करके सरकार के पैसे की लूट की जा रही है। आज सभी राजनैतिक पार्टियॉ छात्रों को टेबलेट, लैपटॉप, रोजगार व शिक्षा देने की बात कर रहीं है।यहॉं यह भी विचारणीय है कि छात्रों को टेबलेट, लैपटॉप के बारे में शिक्षा कौन देगा जब कि निरन्तर कम्प्यूटर शिक्षक बेरोजगार होता जा रहा है? युवकों की बेरोजगारी कैसे दूर होगी? अब प्रश्न यह उठता है कि सरकार बनाने वाली पार्टियॉं इस मुद्दे को कितनी गम्भीरता से लेती हैं? प्रश्न यह भी उठता है कि लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ के रूप मंे प्रेस और मीडिया इस मुद्दे को कितनी गम्भीरता से लेते है? क्यों कि कम्प्यूटर शिक्षकों ने पत्र और साक्ष्यों के माध्यम से इस तरफ प्रमुख राजनैतिक पार्टियों, प्रेस एवं मीडिया का ध्यान आकर्षित करने का प्रयास किया है। हम आशा करते है कि इस मुद्दे पर आप अपनी राय देंगे।

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आरक्षण का आधार बदले सरकार :: आरक्षण से किसी को भी कोई एतराज नही है. लेकिन यदि सरकार आरक्षण के आधार को बदल दे तो इससे ओऊर भी लोगो का फायदा हो जाएगा.. यदि आरक्षण का आधार गरीबी या निर्धनता हो जाए तो देश के बहुत से जरूरतमंद परिवार के लोग लाभान्वित हो जायेंगे. साथ ही आरक्षण नाम से लोगों में फैली भ्रान्ति भी दूर हो जायेगी. सरकार का उद्देश्य भी पूरा हो जाएगा गरीब ओउर निरधन लोगों का विकास करके.गरीबी हटाओ का दीर्घकालीन राजनीतिक नारा भी सफलता की सीधी चढने लगेगा. कोई छोटा होगा न कोई बड़ा. जात-पांत, ऊंच-नीच, धर्म , सम्प्रदाय के विवादों से भी देश मुक्ती पा जायेगा . क्या इस व्यापक सोच पर सरकार व् सभी राजनीतिक दल एवं नीति निर्धारक जनहित व् देशहित में अपने सभी स्वार्थी मापदंड़ो से ऊपर उठकर विचार करने का प्रयास करेंगे ? इससे सरकार का हर नया बिल भी शुद्ध हो जाएगा ओउर देश का हर दिल भी. क्योकि किसी को कोई एतराज ही नही होगा. ....शकुंतला महेश नेनावा, १८२, इन्द्रपुरी कोलोनी , इंदौर. (म.प्र)

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यह तो बड़ा पुनीत कार्य होगा, तथा आपसी भावनात्मकता के सापेक्ष एक उत्कृष्ट उदाहरण भी । शायद ही कोई जागरण मित्र इस कार्य में योगदान से वंचित रहना चाहेगा । सबसे बड़ी बाधा दिल्ली एनसीआर से सुदूर वास करने वाले मित्रों के लिये है, जिनके लिये नोयडा जाकर रक्तदान कर पाना आसान नहीं होगा । मुझे लगता है कि लगभग हर बड़े ब्लड-बैंक के सम्पर्क में कुछ ऐसे प्रोफ़ेशनल ब्लड डोनर अवश्य होते होंगे, जो पैसों के बदले एक निश्चित अवधि के पश्चात रक्त-दान किया करते हैं । जागरण जंक्शन इसमें साहचर्य की भूमिका निभा सकता है, यद्यपि सम्पर्क का फ़ोन नम्बर तो दिया ही गया है । वहां प्रोफ़ेशनल डोनर्स के लिये भुगतेय राशि के बराबर की राशि कोर बैंकिंग शाखाओं के माध्यम से किसी निर्दिष्ट बैंक एकाउन्ट में भारत के किसी भी कोने से पैसे ज़मा कराकर इस पुनीत कार्य में हर ब्लागर अपना योगदान कर सकता है । मैं सहर्ष तैयार हूं, यदि ऐसा योगदान स्वीकार्य हो । प्रत्येक ब्लागर यदि एक यूनिट हेतु भी योगदान करे, तो शायद काफ़ी बड़ी सहायता हो जाएगी । धन्यवाद !

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हम भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ रहें हैं. एक सही पहल है. हर तरफ से आवाज उठ रही है. हम मानतें हैं सरकार दोषी है, ब्यवस्था लाचार और अपंग है. लेकिन क्या हम इसके दोषी नहीं हैं? हमारा दोष क्या कम है ? आत्मविश्लेषण की आवश्यकता है. क्या इस आन्दोलन या शायद प्रदर्शन में भागलेने वाला हर शख्स दूध का धुला है ? हर आदमी की छवि बिलकुल आइने की तरह साफ़ है ? चलिए भूलतें हैं कल को , आज से यह प्रण करें की " न रिश्वत लेंगें और न देंगें", " न सिफारिश सुनेंगें और न करेंगें ". " अपने पद या रिश्तेदारों, दोस्तों के पद का जानें अनजानें अपनें स्वार्थ या लाभ के लिए उपयोग नहीं करेंगें ". और अगर हम ऐसा करतें हैं तो शायद हमें किसी भी बिल की आवश्यकता नहीं है . जय हिंद जय भारत !

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भ्रटाचार के खिलाफ आज देश खड़ा दिख रहा है ,इसके पीछे मात्र अन्ना हजारे ही नहीं है तथा न ही भारत एक परिपक्व लोकतंत्र कहा जा सकता है ,जिसमे अवाम को अपने अधिकारों तथा कर्तव्यों का पूर्ण ज्ञान हो !इसके पीछे है एक दबी हुई कुंठा ,दबा हुआ आक्रोश ,कुछ न कर पाने की लाचारी ! लोग त्रस्त हैं महगाई से ,घूसखोरी से ,बेरोज़गारी से ,अव्यवस्था से !कोई अवाम की आवाज़ नहीं सुन रहा,लोग बेचैन हैं,आक्रोशित हैं,!यही दबा हुआ लावा अन्ना के आव्हान पर ज्वालामुखी बन फूट पड़ा है !अन्ना तो निमित मात्र हैं ,अवाम को रहनुमा चाहिए था !भीड़ सदैव अनुसरण करती है ,इतिहास गवाह है ,गांधी /नेल्सन मंडेला / जयप्रकाश नारायण /हो ची मींच /मार्टिन लूथर किंग जू० /को जन समर्थन ने मुकाम दिया !आग जब सीनों में धधकती है तो चिंगारी ही बहुत है विस्फोट के लिए !आराजकता/ भ्रस्टाचार /गरीबी /बेहाली के विरुद्ध अन्ना की आवाज़ अन्ना को जननायक बना दे कोई आश्चर्य नहीं ! लोकतंत्र में सत्याग्रह /अनशन के द्वारा अपनी मांग को रखना सर्वथा संवैधानिक है !और एक दम सही रास्ता है !बगैर किसी सम्पति को नुकसान पहुंचाए शांतिमार्ग से अपनी आवाज़ के लिए अनशन करना नितांत लोकतान्त्रिक तरीका है ! लोकतंत्र में संसद सर्वोपरि अथवा सर्वोच्य न्यायलय,यह बहस का विषय हो सकता है !बहस स्वस्थ लोकतंत्र की निशानी है,मजबूत लोकपाल एक सार्थक बहस से बनाया जा सकता है !बशर्ते भ्रस्टाचार को ख़त्म करने की इच्छा शक्ति हो !लोकतंत्र में कानून बनाना और अमल में लाना कोई नई बात नहीं !फिर डर कैसा ?बस चोर की ढाडी में तिनका जैसे हालात पैदा न हों !

के द्वारा: rajuahuja rajuahuja

महानुभाव ; उत्तम विषय पर उचित आशंकित/आकांक्षित प्रश्नों की प्रस्तुति हेतु साधुवाद ! १. जी हाँ ; अन्नाजी का विशिष्ठ व्यक्तित्व और हमारी केवल विशिष्ठ जनों की बातों पर ही ध्यान देने की प्रवृत्ति के के कारण ही यह आन्दोलन आज इस उंचाई तक पंहुच सका है ! अन्नाजी की सहज एवं सरल किन्तु ओजस्वी एवं प्रभावशाली वक्तव्य शैली का निश्चय ही बहुत बड़ा योगदान है ! भले ही अन्नाजी को इस आन्दोलन के नेतृत्व का न्योता देने वाली सिविल सोसाइटी की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण हो ! ये तो केवल पहली मांग है जो ना केवल अन्नाजी की वरन हम सबकी है ! अन्नाजी और सिविल सोसाइटी की यह और आगे आने वाली मांगें विगत २१ साल पूर्व मुझसे अदना व्यक्ति द्वारा लिखी गईं और विगत १ वर्ष से 'जाज ' पर प्रतिक्रियाओं के स्वागत को प्रतीक्षित हैं ! अतः निश्चय ही अन्नाजी का व्यक्तित्व महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है ! २.जी नहीं ! १% भी जागरूकता नहीं बढ़ी ! हम भेडचाल के अनुसरण कर्ता थे हैं और कम से कम अगले ५० वर्ष भारत के लोकतंत्र को जागरूकता की प्रतीक्षा ही रहेगी ! ३.मांगें मनवाने के लिए अनशन और सत्याग्रह से अच्छा और कुछ विकल्प हो ही नहीं सकता ! किन्तु इसके लिए नेतृत्व का गांधीजी/ अन्नाजी जैसा प्रभावशाली होना अति आवश्यक है ! अन्यथा कईयों नित्यानंद बड़े बड़े पुनीत कारजों के की वेदी पर आहूत होते ही मीडिया द्वारा भी याद नहीं किये जाते ! यदि ऐसे बलिदान से मशाल भी सुलग सके तो बलिदान सफल है किन्तु ..... ४. लोकतंत्र की संप्रभुता का हनन लोकपाल से हो सकता है तो लोकप्रतिनिधियों से तो हो ही रहा है ! कम से कम लोकपाल पर महाभियोग सा प्रावधान तो होगा !लोकप्रतिनिधियों को तो चुने जाते ही निरंकुशता का अधिकार मिल जाता है ! किन्तु फिर भी इस पर पुनर्विचार जरूरी है क्योंकि मैंने बहुत निकट से लोकायुक्त की बदले की भावना वाली कार्यवाही के दुष्परिणाम देखे हैं ! ५. वैसे तो इस आन्दोलन के अप्रायोजित होने से बहुत निकट से परिचित हूँ क्योंकि इसकी भूमिका विगत वर्ष भोपाल में क्रांतिकारी जैन मुनिश्री तरुण सागर जी के भोपाल चातुर्मास के समय किरण बेदी जी के आगमन पर बनी थी ! किन्तु यदि थोड़ी देर के लिए मान भी लें की सरकार द्वारा प्रायोजित है तो भी अब सरकार के हाथ से बागडोर बहुत दूर हो चुकी है ! वैसे सरकार ने समिति के सदस्यों को आन्दोलन से पूर्व गिरफ्तार कर बहुत ही बड़ा योगदान दिया है ! बाबा ने भी ऐसा सहयोग स्वीकार लिया होता तो आज दो बड़ी मांगों के दो दो बड़े संचालक हमारे साथ होते ! जय हिंद !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

के द्वारा: Charchit Chittransh Charchit Chittransh

अन्ना का आंदोलन – वास्तविकता या भ्रम ? आदरणीय जंक्शन महोदय, डरिये नहीं, खुलकर सच्चाई का बखान करिये। सच्चाई बखान करने में आगे रहिये। शहादत से खुद का नुकसान होता है पर समाज का भला होता है। इसे हम, आप सभी समझते हैं। 1. क्या ये आंदोलन अन्ना हजारे के व्यक्तित्व के करिश्मे के कारण एक विशाल जनांदोलन बन गया है? उ.जी, हां। व्यक्तित्व का अभिप्राय ईमानदारी से लगाया जाना चाहिए। जो भी ईमानदार है, उससे टकराना मूंह के खाने के बराबर है। ईमानदार इँसान की जान ली जा सकती है परन्तु उससे ईमानदारी नहीं छीनी जा सकती है। 2. क्या आज भारत एक परिपक्व और जागरुक लोकतंत्र में तब्दील हो चुका है जिस कारण इस आंदोलन को भारी जनसमर्थन मिल रहा है? उ.जी, नहीं।भारत एक परिपक्व और जागरुक लोकतंत्र में तब्दील हो चुका है। एकदम गलत है। लोकतंत्र परिपक्व और जागरुक होता तो ईमानदार आदमी चुनाव में जीतता पर व्यावहारिक तौर पर ऐसा नहीं है। महंगाई से दबी जनता भ्रष्टाचार को वजह मान रही है, जो सही भी है। भ्रष्टाचार के चलते ही उग्रवाद या अन्य वादों ने जन्म लिया है...। 3. मांगें मनवाने के लिए अनशन और सत्याग्रह का तरीका किस सीमा तक जायज है? उ.अनशन और सत्याग्रह से आन्दोलनकारी का आत्म शकि्त में इजाफा होता है। इसकी सीमा निधारित करना न्याय संगत नहीं है। 4. क्या मजबूत लोकपाल वाकई संसदीय लोकतंत्र की संप्रभुता का हनन करने वाला सिद्ध हो सकता है? उ.सांच को आंच क्या, मजबूत लोक पाल से संसदीय लोकतंत्र की संप्रभुता का हनन नहीं होगा। महाभियोग जैसे नियम से लोकपाल पर नियंत्रण रखा जा सकता है। 5. कहीं ये आंदोलन सरकार द्वारा अपने विरुद्ध लगाए जा रहे भ्रष्टाचार के आरोपों से जनता का ध्यान हटाने के लिए एक प्रायोजित आंदोलन तो नहीं? उ.आपके शक में कोई दम नहीं है। सरकार जनता का प्रतिनिधित्व करती है और जहां की अधिकांश जनता भ्रष्ट हो चुकी हो, उससे सरकार ऐसी उम्मीद नहीं करेगी...। प्रमोद कुमार चौबे ओबरा सोनभद्र 09415362474

के द्वारा: pramod pr